वही मेरठ जहाँ के कई पत्रकार लखनऊ के दरबार में दरबारी है उसी मेरठ के एक वरिष्ठ पत्रकार राजेश अवस्थी का इस तरह से जाना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है, बल्कि उस निर्मम व्यवस्था का आईना है जिसने दशकों तक पत्रकारों से सच लिखवाया, लेकिन उनके अपने जीवन की सुरक्षा कभी सुनिश्चित नहीं की। यह घटना सिर्फ़ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि भारतीय पत्रकारिता के भीतर पसरी असुरक्षा, उपेक्षा और संवेदनहीनता की भयावह तस्वीर है।
सोचिए, कोई व्यक्ति अपना जीवन बड़े अख़बारों के लिए खपा दे। थानों की धूल फांके, रात-रात भर डेस्क पर काम करे, सत्ता से सवाल पूछे, समाज की आवाज़ बने और 35 वर्षों की सेवा के बाद भी अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में इतना अकेला और असहाय रह जाए कि परिवार की बुनियादी जरूरतें तक पूरी न कर सके। इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है? यह केवल आर्थिक संकट नहीं है यह धीरे-धीरे टूटते हुए देश के कई पत्रकारों का मौन दर्द है वो दर्द, जिसे न मीडिया संस्थानों ने सुना, न सरकारों ने, न उस समाज ने जो हर सुबह पत्रकारों की लिखी खबरों से अपना दिन शुरू करता है।
सत्ता चाहे किसी भी सियासी दल की रही हो, पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान हमेशा भाषणों तक सीमित रहे। नेताओं को ऐसे पत्रकार पसंद आते हैं जो उनकी आलोचना नहीं प्रशंसा करें, उनके कारनामों को उजागर नहीं बल्कि उनकी छवि चमकाएँ। बदले में उन्हें पद, पुरस्कार, समितियाँ और सुविधाएँ मिल जाती हैं। लेकिन जो पत्रकार सचमुच जनता के सवाल उठाते हैं, सत्ता की आंखों में आंख डालकर सच लिखते हैं, वे धीरे-धीरे हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं। उम्र बढ़ने के साथ वे संस्थानों के लिए “अनुपयोगी” घोषित कर दिए जाते हैं।
विडंबना देखिए, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पेशे में काम करने वाले लोग खुद सबसे असुरक्षित जीवन जी रहे हैं। नौकरी का भरोसा नहीं, बीमारी में सहारा नहीं, बुढ़ापे में सम्मान नहीं और मृत्यु के बाद परिवार के लिए कोई व्यवस्था नहीं। जिन संस्थानों को पत्रकारों ने अपनी मेहनत और ईमानदारी से खड़ा किया, वही संस्थान अक्सर उनके सबसे कठिन समय में गायब मिलते हैं।
राजेश अवस्थी केवल एक नाम नहीं थे। वे उस पीढ़ी का चेहरा थे जिसने बिना संसाधनों के पत्रकारिता की असली लड़ाई लड़ी। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस की चमक नहीं, गांव-कस्बों की पीड़ा लिखी। उन्होंने सत्ता की भाषा नहीं, समाज की धड़कन समझी। लेकिन जब उनकी अपनी जिंदगी अंधेरे में डूबने लगी, तब पूरा तंत्र उन्हें अकेला छोड़ गया।
आज सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलियाँ लिख देना आसान है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इस देश में पत्रकारों के लिए सम्मानजनक जीवन की कोई व्यवस्था है? क्या दशकों तक काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकारों को पेंशन, स्वास्थ्य सुरक्षा और आर्थिक सहारा मिलना उनका अधिकार नहीं होना चाहिए?
राजेश अवस्थी की स्मृति को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब उनके परिवार को तत्काल मदद मिले, मीडिया संस्थान अपनी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करें और सरकारें पत्रकारों के लिए मजबूत सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था बनाएं। वरना हर कुछ समय बाद कोई और पत्रकार इसी चुप्पी, अवसाद और बेबसी में खो जाएगा और हम फिर कुछ दुखभरे शब्द लिखकर आगे बढ़ जाएंगे।
यह सिर्फ़ एक पत्रकार की मौत नहीं है। यह उस समाज पर लगा आरोप है जो सच लिखने वालों को तालियाँ तो देता है, लेकिन जीने का सहारा नहीं।



