आगरा उत्तर प्रदेश कारोबार

जीएसटी मूल भावना समाप्त करने की लाईन पर चल पड़ी है सरकार

आगरा। गुड एवं सिम्पिल टैक्स यानि जीएसटी को स्वरुप में अब प्रदर्शित होने लगा है कि यह प्रणाली अब गुड एवं सिम्पिल टैक्स न होकर बल्कि एक ऐसी प्रणाली का स्वरुप लेती जा रही है जिसमें अब देश में जिससे अब व्यापार करना बहुत मुश्किल होगा।

केन्द्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड द्वारा जारी अधिसूचना संख्या 94/20290-केन्द्रीय कर दिनांक 22 दिसम्बर 2020 का अध्ययन अभी कर विशेषज्ञ कर रहे हैं। लेकिन सरसरी निगाहों से अध्ययन करने पर स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि अब देश में व्यापार करना अर्थात अपनी ईमानदारी और देश के प्रति समर्पण भाव पर प्रश्न खड़ा करने जैसा है।

प्रारम्भ में ऐसा लग रहा था कि इस प्रणाली के आ जाने से व्यापार और विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगेगी लेकिन जिस प्रकार से नियमों में सख्ती लाते जा रहे हैं, उससे लगने लगा है कि सरकार की यह नीति बनती जा रही है कि करदाता को प्रोत्साहित करने के स्थान पर शोषण और उत्पीड़न का डंडा कसते जाओ। यह सर्वविदित है जैसे-जैसे नियम कड़े और अव्यावहारिक होंगे वहीं भ्रष्टाचार जन्म लेता है। जैसा कि 1947 के बाद होता आया है। उक्त अधिसूचना के बिन्दु 3 में नियम 9 में उपनियम 1 में जीएसटी के पंजीयन के आवेदन का निस्तारण का समय सीमा 3 दिन हुआ करती थी जबकि अब संशोधन हो जाने से 7 दिन हो गयी।

इसी प्रकार नियम 9 के उपनियम (ख) में जो अधिकार असिस्टेंट कमिश्नर स्तर के अधिकारियों को प्रदान किये गये हैं जैसा कि अधिसूचना में लिखा है ‘‘नियम 25 के अधीन दी गई रीति से, उक्त व्यक्ति की उपस्थिति में कारोबार के स्थान का प्रत्यक्ष सत्यापन कराये जाने के पश्चात तथा जैसा उचित समझे ऐसे कागजातों का सत्यापन किए जाने के पश्चात, आवेदन को प्रस्तुत किये जाने की तारीख से तीस दिनों के भीतर रजिस्ट्रीकरण प्रदान किया जाएगा’’

इस प्रकार के संशोधन किये जाने से पूर्ववत बिक्रीकर अधिनियम, वैट अधिनियम के मुकाबले जीएसटी में कोई अंतर नहीं रह गया। अब यह नहीं कहा जा सकता कि जीएसटी में समस्त कार्य ‘आॅनलाईन’ हो रहे हैं अतः भ्रष्टाचार कम होगा क्योंकि अधिकारी और करदाता में आपस में भेंट नहीं हो पाएगी, यानि ‘फेसलैस’ नहीं होगा। अब यह निश्चित है कि प्रत्येक पंजीयन आवेदन में अधिकारी संतुष्ट नहीं होगा और वह कारोबार स्थल की का प्रत्यक्ष सत्यापन के पश्चात ही रजिस्ट्रीकरण प्रदान किया जाएगा। अतः सरकार की ‘फेसलैस’ नीति पर कुठाराघात किया गया है।

अधिसूचना के बिन्दु 5 के उपबिन्दु (ख) में जीएसटीआर-1 (धारा-37) पर जोर दिया गया है जिसमें कहा गया है कि ‘‘करने पर यह पता चलता हो कि ऐसी महत्वपूर्ण अंतर या विसंगतियां है जो अधिनियम के उपबंधों या इसके अन्तर्गत बनाए गये नियमांे के उल्लघंन को दर्शाता है, जिससे उक्त व्यक्ति का रजिस्ट्रीकरण रद्द किया जा सकता हो, तो उसके रजिस्ट्रीकरण को निलंबित कर दिया जाएगा और ऐसे व्यक्ति को, उक्त अंतर और विसंगतियों को दर्शाते हुए, सामान्य पोर्टल पर, इलैक्ट्राॅनिक माध्यम से प्रारुप जीएसटी आरईजी-31 में या रजिस्ट्रीकरण के समय दिये गये ई-मेल पते, या समय-समय पर संशोधित पते पर, इसके बारे में सूचित कर दिया जाएगा।’’
यह संशोधन स्पष्टरुप से परीलक्षित हो रहा है कि सरकार जावक ब्यौरों को ‘सत्यापित करवाने के या कहा जाए कि खरीदार (आवक) पंजीकृत व्यक्ति को लाभ अथवा सुविधा देने के मूड में नहीं है। यहां पर कैसे ज्ञात होगा कि अंतर या विसंगति है। यह काम विभाग को मिल गया, क्योंकि एक्ट में विभागीय अधिकारियों को ‘‘विश्वास करने का अधिकार’ (Reason to believe) मिला हुआ है। तो ऐसे में अधिकारी इस अधिकार को दुरुपयोग करने की संभावना बनी रहेगी। स्पष्ट है कि सरकार एक्ट की धारा-38 को अधिसूचित करने और लागू करने की बिल्कुल भी मंशा नहीं दिख रही।
अधिसूचना की बिन्दु 9 के अन्तर्गत नियम 86क पश्चात 1 जनवरी 2021 से नियम 86ख जोड़ा जा रहा है। जिसके उपबिन्दु (घ) में 1 प्रतिशत टैक्स जमा करने की बाध्यता जोड़ देना, सरकार की यह मंशा प्रदर्शित कर रहा है कि सरकार कोई भी सुविधा तो देना चाहती नहीं है बल्कि कैसे भी टैक्स जमा करवा दो।

अधिवक्ता दीपक गोयल (बुलन्दशहर) अधिवक्ता दिनेश चन्द्र शर्मा (आगरा) का कहना है कि इस प्रकार के आदेशों के यह स्पष्ट हो रहा है कि इस प्रकार से जीएसटी मूल भावना समाप्त करने की लाईन पर चल पड़ी है। या यह कह सकते हैं कि सरकारी तंत्र इसकी मूल भावना को पीछे छोड़कर नये ऐसे युग में प्रवेश कराने की तैयारी कर रहा है कि देश के व्यापारीवर्ग कैसे भी व्यापार करना भूल जाएं और मजदूरी अथवा अन्य धन्धों में सलंग्न हो जाएं।

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