उत्तर प्रदेश मथुरा

आरक्षण निर्बल बनाने का माध्यम – शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद

मथुरा। ज्योतिष्पीठ एवं द्वारकाशारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने शहर की उभरती कथा वाचक डा. दीपिका उपाध्याय की नवीनतम पुस्तक का विमोचन किया। होली के सुअवसर पर वृन्दावन स्थित उड़िया बाबा आश्रम में पधारे शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती ने पुस्तक ‘ विश्व हित में कुछ संतुलित विचार’ का विमोचन किया। इस पुस्तक में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर तीखे,बेबाक और स्पष्ट साक्षात्कारों का संकलन है, जो समय समय पर लेखिका ने लिए।
अपने राजनैतिक संबंधों पर बेबाक टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि राजनेता उनके पास शिक्षा लेने नहीं आते हैं, वे तो अपने मनोरथ की पूर्ति के लिए आशीर्वाद लेने आते हैं। वर्तमान समय में बढ़ते ‘गुरुडम’ पर भी उन्होंने जमकर तंज कसे। उन्होंने कहा कि कुछ संस्थाओं ने ईश्वर के स्थान पर गुरु की पूजा- सेवा को ही महत्त्व देकर अपने अनुयायियों को हिन्दू धर्म से अलग कर दिया। इन लोगों ने मानव मन की श्रद्धा का लाभ उठाकर श्रद्धेय बदल दिया है।

लेखिका के एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने साईं पूजा से होने वाले नुकसान के विषय में कहा कि यह वह दीमक है जो सनातन धर्म रुपी पेड़ को सुखाने का कार्य कर रहा है। जनता के मन से घटती धार्मिक भावना और बढ़ती भोग भावना से वे चिंतित दिखाई दिए। उन्होंने धर्म गुरुओं को लक्ष्य बनाकर कहा कि आज समाज को ऐसे गुरुओं की आवश्यकता है जो ये न देखें कि राजा क्या चाहता है? उन्हें कहा कि राजा यदि मनमाना आचरण करे तो उसका विरोध शुरु हो जाता है। आरक्षण का उन्होंने अपने ही अंदाज में विरोध करते हुए उसे निर्बल बनाने का माध्यम बताया।
शंकराचार्य परंपरा और उस पद के लिए चल रही खींचतान की बात पर वे मुखर हो उठे। उन्होंने कहा कि इसके लिए उन्हें तगड़ा प्रचार करना होगा, चूँकि वे सरकार की हाँ में हाँ नहीं मिलाते इसलिए फर्जी शंकराचार्य खड़े किए जा रहे हैं।
राष्ट्र के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने स्वीकारा कि भारत को अभी पूरी आजादी नहीं मिली है। सत्ता का धर्म द्वारा नियंत्रित होना आवश्यक है। हिंदू राष्ट्र की माँग करने वालों पर शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद के तेवर तीखे थे। उन्होंने कहा कि रावण और दुर्योधन दोनों हिंदू थे इसलिए हम हिंदू राष्ट्र नहीं राम राज्य चाहते हैं जहाँ कुत्ते को भी न्याय मिलता था।
उन्होंने स्पष्ट किया कि शंकराचार्य व्यवस्था देते हैं, फतवा नहीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जातिहीन समाज की कल्पना को उन्होंने अनीतिपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि जातियों में बँटा होने के कारण ही हिंदू सुरक्षित है। वरना औरंगजेब के समय में एक हिंदू के मुसलमान बनते ही सब मुसलमान हो जाते। जातियाँ धर्मान्तरण करने वालों का बहिष्कार कर देती थीं, इसलिए हिंदू धर्म सुरक्षित रहा।
इसके अलावा उन्होंने इस पुस्तक में धर्मग्रंथों, लोकाचार, लव जेहाद से लेकर इस्लाम धर्म की बहत्तर हूरों की अवधारणा पर भी अपने बेबाक अंदाज में वक्तव्य दिये।

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