आगरा उत्तर प्रदेश कार्यक्रम

होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से, जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान यज्ञ से।।

आगरा। आर्य समाज आगरा द्वारा छावनी क्षेत्र की डिफेन्स कालोनी के राम दरबार मन्दिर में पर्यावरण शुद्धि हेतु महायज्ञ का अनुष्ठान आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री जी के ब्रह्मत्व में चल रहा है। जिसमें श्री रविन्द्र सिंह चौहान ( सचिव – सद्भावना जन कल्याण ट्रस्ट ) नेतृत्व कर रहे हैं।

आज दिनांक २४ मई २०२१ दिन सोमवार के यज्ञ में श्रीमती राधा एवं श्री राजेन्द्र सिंह जी यजमान बनें।

यह महायज्ञ प्रतिदिन प्रातः काल ७:०० बजे से ९:०० बजे तक दिनांक ३० मई रविवार २०२१ तक चलेगा। आप भी यजमान बन सकते हैं। यज्ञ में आहुति लगाकर पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
श्री अभय यादव “शिक्षक” ( उपमन्त्री – आर्य वीर दल जनपद आगरा), और मन्दिर के पुरोहित श्री राघव शर्मा जी यज्ञ व्यवस्था में सहयोग प्रदान कर रहे हैं।

यज्ञ में श्रीमती ईश चौहान, श्री रामनरेश यादव पूर्व पार्षद, श्रीमती सोनम खिरवार, श्री संजय खिरवार, श्री उदयराज आदि सज्जनों ने आहुतियाँ प्रदान कर समाज कल्याण में अपना सहयोग प्रदान किया ।

🔥🔥 आओ अग्निहोत्र करें।
पर्यावरण को शुद्ध करें।। 🔥🔥

समाज कल्याण के उद्देश्य से आर्य समाज जनपद आगरा द्वारा आप सभी महानुभावों के सहयोग से सरकार और स्वास्थ्य मन्त्रालय के नियमों का पालन करते हुए महामारी निवारणार्थ नगर के विभिन्न स्थानों पर सप्ताह भर ( दिनांक २४ मई सोमवार से ३० मई रविवार २०२१ तक ) चलने वाले वायु शुद्धि महायज्ञों ( भेषज्ययज्ञों ) का आयोजन किया जा रहा है।

प्राचीनकाल में महामारी के निवारण के लिए आयुर्वेद में यज्ञों का वर्णन‌ मिलता है, वेद और वैदिक साहित्य में यज्ञों का विस्तृत वर्णन है।
महाराज मनु कहते हैं कि अग्निहोत्र प्राणियों के जीवन का आधार है –
अग्नौ प्रस्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजा।।
अर्थात् अग्नि में दी गयी आहुति सूर्यमण्डल में पहुंचती है, उससे बादल बनते हैं, वर्षा होती है, उससे अन्न की उत्पत्ति होती है, जिससे प्रजाओं की उत्पत्ति और जीवन चलता है।

यजुर्वेद में यज्ञ को वायु की शुद्धि का हेतु कहा है –
वसोः पवित्रमसि शतधारं वसोः पवित्रमसि सहस्रधारम्। ( यजु० १/३ ) यह असंख्यात संसार एवं अनेक प्रकार के ब्रह्माण्ड को धारण करने वाला तथा शुद्ध करने वाला कर्म है।

अथर्ववेद में यज्ञ द्वारा रोगों की चिकित्सा करने का वर्णन है – मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्। ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्।। ( अथर्ववेद ३/११/१ ) “हे व्याधिग्रस्त मनुष्य! तुझे सुख पूर्वक जीवन व्यतीत कराने के लिए हवन द्वारा अज्ञात रोगों से तथा तपेदिक जैसे ज्ञात रोगों से बचाता हूं। इसे सब अंगो को जकड़ने वाला रोग भी पकड़ ले तो भी शुद्ध वायु या सूर्य की गर्मी या विद्युत द्वारा तथा होमाग्नि इसे उक्त रोग से मुक्त करे।”

वैदिक काल में ऋषियों ने यज्ञ की महिमा का वर्णन किया है वहीं हमारे पूर्वजों ने इसे दिनचर्या में अपनाया है, महाभारत काल तक दैनिक यज्ञ के साथ साथ बड़े-बड़े यज्ञों का वर्णन मिलता है।
आज के समय में भी यज्ञ पर अनेक प्रयोग करने के बाद वैज्ञानिकों ने इसे वायु शुद्धि और रोग निवारण का आधार माना है।

फ्रांस के विज्ञानवेत्ता ट्रिलवर्ट कहते हैं – “जलती हुई शक्कर में वायु शुद्ध करने की बहुत बड़ी शक्ति होती है।
इससे क्षय, चेचक, हैजा आदि रोग तुरन्त नष्ट हो जाते हैं।” (सरस्वती, अक्टूबर १९९१)

डॉक्टर एम० ट्रेल्ट ने मुनक्का, किशमिश आदि सूखे फलों को ( जिनमें शक्कर अधिक होती है ) जलाकर देखा। वे इस निर्णय पर पहुंचे थे कि उनके धुएं ( गन्ध ) में टाइफाइड ज्वर के रोगकीट केवल तीस मिनट तथा दूसरी व्याधियों के रोगाणु घण्टे दो घण्डे में मर जाते हैं।”
( भारत सुदशा प्रवर्तक, जून १९९३)

अमरीका के एक डॉक्टर ने एक बार मुम्बई में भाषण देते हुए कहा था, हम लोग सैकड़ों वर्षों से इस खोज में थे कि फेफड़ों की तपेदिक को गैस की सुगन्धि से अच्छा किया जा सके।
अब हम इसमें सफल हो गए हैं और इस चिकित्सा का परिणाम सब चिकित्साओं से बेहतर रहा है।”
(लीडर, इलाहाबाद से प्रकशित समाचार पत्र, ६अप्रेल, १९५५)

डॉक्टर फुन्दनलाल अग्निहोत्री मध्य प्रदेश में राजकीय टीवी सेनेटोरियम, जबलपुर में मेडिकल ऑफिसर थे। वहां उन्होंने यज्ञ के द्वारा तपेदिक के रोगियों की चिकित्सा की तथा 80% रोगियों को इस विधि से पूर्ण लाभ हुआ।
(यज्ञ चिकित्सा, १९४९)

कपूर, गूगल, चन्दन, केसर, लोबान, बालछड़, अगर, तगर, नीम के पत्ते आदि कृमिनाशक हैं। इनका धूंआ ( अग्नि में जलाने से निकली गन्ध ) स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है। गिलोय नीम के पत्ते तथा घृत के जलाने से जो धूम‌ बनता है, वह मलेरिया बुखार में बहुत लाभदायक है। गिलोय, नीम के पत्ते और शक्कर को अग्नि में जलाने से जुकाम ठीक होता है। चावल और खीलों‌ को जलाने से छाती के रोग नष्ट करने में सहायता मिलती है।

उपरोक्त बातें तो संक्षेप में जनजागरण के उद्देश् प्रसारित करने योग्य है।
अधिक जानकारी के लिए कार्यक्रमों में सम्मिलित होने की कृपा करें।
आर्य समाज विश्व के कल्याण के‌ लिए महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज के द्वारा स्थापित संस्था है, जिसमें जीवन से सम्बन्धित सभी सभी विषयों पर प्रकाश डाला जाता है। आप आर्य समाज के कार्यक्रमों में सम्मिलित हो सकते हैं।

आओ यज्ञ करें –
वर्तमान समय में महामारी को दूर करने के लिए जितना सावधान रहने और औषधि उपचार करने की आवश्यकता है उतना ही वायु को शुद्ध करने के लिए यज्ञ करने की भी आवश्यकता है।
सभी से विनम्र निवेदन है कि अपने घर पर दैनिक यज्ञ ( अग्निहोत्र ) अवश्य करें और औरों को करने की प्रेरणा भी दें।
यदि आप पहले से ही दैनिक अग्निहोत्र करते हैं तो देर तक हवन करें अर्थात् कुछ अधिक आहुतियाँ लगायें जिससे और अधिक वायु शुद्ध हो।
यदि आप समर्थ है तो और देर तक चलने वाला यज्ञ ( अग्निहोत्र ) करें।
आर्य समाजें अपने भवन में देर तक चलने वाला यज्ञ करें। हो सके तो अपने आस-पास भी अनेक स्थानों पर यज्ञ कराने की व्यवस्था करें।
इस समय बड़े-बडे यज्ञों की बहुत आवश्यकता है। इसके के लिए सभी सामर्थ्य अनुसार सहयोग करें।
समाज कल्याण के लिए आज यज्ञ की महती आवश्यकता है।
क्योंकि –
अग्निहोत्र उस महान प्रभु द्वारा रचाई गए इस महान प्राकृतिक यज्ञ का ही एक रूप है। इसके द्वारा वायु की दुर्गन्ध नष्ट होकर सुगन्ध फैलती है।
वेद यज्ञ को वायु की शुद्धि का हेतु मानता है – वसोः पवित्रमसि शतधारं वसोः पवित्रमसि सहस्रधारम्। ( यजु० १/३ ) यह असंख्यात संसार एवं अनेक प्रकार के ब्रह्माण्ड को धारण करने वाला तथा शुद्ध करने वाला कर्म है।
इसीलिए शास्त्रकारों ने प्रतिदिन यज्ञ करने का विधान किया है। यजुर्वेद (१/२) में यज्ञ का त्याग न करने का स्पष्ट आदेश है – वसोः पवित्रमसि द्यौरसि पृथिव्यसि मातरिश्वनो धर्मोऽसि विश्वधाऽअसि परमेण धाम्ना दृँहस्व मा ह्वार्मा ते यज्ञपतिर्ह्वार्षीत्।
इस मन्त्र का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द सरस्वती जी लिखते हैं,
“हे विद्या युक्त मनुष्य! तू जो यज्ञ शुद्धि का हेतू है, जो विज्ञान के प्रकाश का हेतु और सूर्य की किरणों में स्थिर होने वाला है,
जो वायु के साथ देश-देशान्तर में फैलने वाला है, जो वायु को शुद्ध करने वाला है, जो संसार का धारण करने वाला है तथा जो उत्तम स्थान से सुख का बढ़ाने वाला है, इस यज्ञ का मत त्याग कर। तेरे यज्ञ की रक्षा करने वाला यजमान भी उसको न त्यागे।
वेद यज्ञ द्वारा रोगों की चिकित्सा होना सम्भव मानता है – मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्। ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्।। ( अथर्ववेद ३/११/१ )
“हे व्याधिग्रस्त मनुष्य! तुझे सुख पूर्वक जीवन व्यतीत कराने के लिए हवन द्वारा अज्ञात रोगों से तथा तपेदिक जैसे ज्ञात रोगों से बचाता हूं। इसे सब अंगो को जकड़ने वाला रोग भी पकड़ ले तो भी शुद्ध वायु या सूर्य की गर्मी या विद्युत द्वारा तथा होमाग्नि इसे उक्त रोग से मुक्त करे।”
फ्रांस के विज्ञानवेत्ता ट्रिलवर्ट कहते हैं – “जलती हुई शक्कर में वायु शुद्ध करने की बहुत बड़ी शक्ति होती है। इससे क्षय, चेचक, हैजा आदि रोग तुरन्त नष्ट हो जाते हैं।”
(सरस्वती, अक्टूबर १९९१)

डॉक्टर एम० ट्रेल्ट ने मुनक्का, किशमिश आदि सूखे फलों को ( जिनमें शक्कर अधिक होती है ) जलाकर देखा। वे इस निर्णय पर पहुंचे थे कि उनके धुएं ( गन्ध ) में टाइफाइड ज्वर के रोगकीट केवल तीस मिनट तथा दूसरी व्याधियों के रोगाणु घण्टे दो घण्डे में मर जाते हैं।”
( भारत सुदशा प्रवर्तक, जून १९९३)
अमरीका के किसी डॉक्टर ने एक बार मुम्बई में भाषण देते हुए कहा था, हम लोग सैकड़ों वर्षों से इस खोज में थे कि फेफड़ों की तपेदिक को गैस की सुगन्धि से अच्छा किया जा सके। अब हम इसमें सफल हो गए हैं और इस चिकित्सा का परिणाम सब चिकित्साओं से बेहतर रहा है।”
(लीडर, इलाहाबाद से प्रकशित समाचार पत्र, ६ अप्रेल२९५५)
डॉक्टर फुन्दनलाल अग्निहोत्री मध्य प्रदेश में राजकीय टीवी सेनेटोरियम, जबलपुर में मेडिकल ऑफिसर थे। वहां उन्होंने यज्ञ के द्वारा तपेदिक के रोगियों की चिकित्सा की तथा 80% रोगियों को इस विधि से पूर्ण लाभ हुआ।(यज्ञ चिकित्सा, १९४९)

कपूर, गूगल, चन्दन, केसर, लोबान, बालछड़, अगर, तगर, नीम के पत्ते आदि कृमिनाशक हैं। इनका धूंआ ( अग्नि में जलाने से निकली गन्ध ) स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है।
गिलोय नीम के पत्ते तथा घृत के जलाने से जो धूम‌ बनता है, वह मलेरिया बुखार में बहुत लाभदायक है।
गिलोय, नीम के पत्ते और शक्कर को अग्नि में जलाने से जुकाम ठीक होता है।
चावल और खीलों‌ को जलाने से छाती के रोग नष्ट करने में सहायता मिलती है।

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