लेख साहित्य

प्रार्थना मय दोहे

हे !अंबा हे!अंबिका, हे! शारद हे! मात ।
मेरी भवबाधा हरो! होए शुभ्र विभात ॥

मैं जड़मति अनजान हूँ, मोटी बुद्धि विचार ।
माता मुझको ले शरण, कर दे बेड़ापार ॥

अहम क्रोध आवेश में, भभकूँ र्मैं दिन रात।
मुझपर अपनी कृपा की, करिए नत बरसात ॥

वर्ण शब्द अरु वाक्य का, नहीं मुझे कुछ ज्ञान |
बोल तोतली बोलकर, बनना चहूँ महान ॥

कर दो माँ ऐसी कृपा, मुझे मिले सत्संग ।
विज्ञ जनों का साथ हो, मन में बढे उमंग ॥

वीणा तान तरंग से, झंकृत कर मम गात ।
रोम -रोम हर्षित रहे, पुलकित नित्य प्रभात ॥

माता ऐसी कर कृपा, मन हो मेरा उदात्त ।
नि:सृत हो सर छंद सी, मिटे मनस उत्पात ॥

हे! श्री शारद कालिके, धरूँ तेरा मैं ध्यान ।
सात्विकता की बाढ़ कर, भर दे मुझमें ज्ञान ॥

सबका प्रकृति विकास हो, सबका हो कल्याण ।
सबमें सत्व विवेक हो, मिले सभी को प्राण ॥

दुनिया के जन हों सुखी! पालें नित कर्त्तव्य ।
उनके सारे कर्म हों, कर्म यज्ञ के हव्य ॥

रचनाकार
पं रामजस त्रिपाठी नारायण
भुआलपुर, चुनारगढ़,उ प्र

Live TV

GMaxMart.com

Our Visitor

1186534
Hits Today : 1107
LIVE OFFLINE
track image
Loading...