लेख साहित्य

श्रद्धा व विश्वास

मित्रों नमो नारायण
इस जीवन के विकास में बुद्धि का बहुत बड़ा योगदान है। वर्तमान में बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है, उन्हीं में से कुछ श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों का मानना है कि, जो हम पूजा पाठ करते हैं, तद् तद् मंत्रों से देवताओं का आवाहन, पूजन आदि करते हैं वह उन तक पहुंचता है क्या ???? यह केवल व्यक्ति का विश्वास होता है उससे कोई लाभ नहीं होता आदि-आदि बहुत सारे तर्क दिए जाते हैं। पर वे यह भूल जाते हैं कि विश्वासम फलदायकम

विश्वास व श्रद्धा से ईश्वर का नाम लेने मात्र से जो लाभ होता है वह अन्य लाख उपायों के बावजूद भी नहीं हो पाता ।एक बार विश्वास जग जाने से बड़ा से बड़ा कार्य भी हम पूरा करने की स्थिति में होते हैं ।
एक विश्वासी सैनिक ही अकेले सैकड़ों दुश्मनों को मार गिराता है, एक विश्वासी व्यक्ति ही लाखों व्यक्तियों को एक साथ संबोधित कर पाता है, एक विश्वासी व्यक्ति ही जंगल में मंगल मना पाता है, और एक विश्वासी व्यक्ति ही रात को दिन करके दिखा पाता है ।

इस बात को हमारे वैदिक ऋषि जानते थे इसलिए वे बड़े ही मनोवैज्ञानिक ढंग से कर्मकांड पूजा-पाठ, प्रार्थना, अर्चना, वंदना ग्रह शांति ग्रह मंत्र जप अन्यान मंत्रों का जप और कुंडली जागरण का नियम तथा साकार मूर्ति उपासना की पद्धति में श्रद्धा व विश्वास का सबसे बड़ा योगदान बतलाये।
आइए इसी बात को हम मनोवैज्ञानिक रूप से समझते हैं , हमारी संपूर्ण शक्तियाँ हमारे मस्तिष्क में विद्यमान है,यह हमारा मस्तिक ही संपूर्ण ब्रह्मांड की शक्तियों को महसूस करने का स्थान है या यूं समझें कि हमारा मस्तिक ही ईश्वर है ।

हम विश्वास के साथ जो कार्य करते हैं जो मंत्र जपते हैं जो पाठ करते हैं जो पूजा अर्चन प्रार्थना करते हैं उसका एक अद्भुत मानसिक लाभ होता है और जिसका प्रभाव हमारे जीवन पर दिखता है उसको चाहे हम ईश्वर की कृपा मान लें या अपनी मन की शक्ति परंतु बिना विश्वास के न मन की शक्ति जागृत होती है और न ईश्वरीय कृपा की अनुभूति होती है।

अतः आए हम जो भी करें विश्वास के साथ करें यही हमारा मुक्तिदाता सिद्ध होगा ।
ध्यान रहे यह विश्वास बिना श्रद्धा के नहीं हो सकती और यह श्रद्धा बिना महिमामंडन के नहीं हो सकता, और यह महिमामंडन उस परम सत्ता का ही हो सकता है जिसने सूरज चांद बनाया जिसने पशु पक्षी बनाया जिसने इस नाना प्रकार की योनियों को बनाया जिसने इस पृथ्वी जैसे अनेकों ग्रह को बनाया और जो सब में चेतना रूप में विद्यमान है वही कर्तुम अकर्तुम सब कुछ करने में समर्थ है उसके प्रति हमारी श्रद्धा होनी ही चाहिए । वह निराकार या साकार किसी भी रूप में हो सकता है ।
इतना पढ़ने के बावजूद मुझे पूरा विश्वास है कि आप वही करेंगे जो आपको समझ में आएगा और आपको वही समझ में आएगा जैसा आप का प्रारब्ध होगा । अतः विवेक रूपी गुरु की सन्निधि करते हुए कुछ अच्छा करने की कोशिश करें निश्चित ही आपसे अच्छा हो जाएगा क्योंकि जहाँ चाह वहाँ राह।

पं रामजस त्रिपाठी नारायण
भुआलपुर चुनारगढ़ उ प्र

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