लेख साहित्य

भक्तों से भी सुदामा जैसी मित्रता निभाते हैं भगवान

भगवान श्री कृष्ण द्वारका के राजा होने से पहले अपने भक्तों के खेवनहार हैं। उन्होंने जितना स्नेह ब्रज में लुटाया उतना ही सुदामा पर। भगवान की विशेषता है कि वे अपने भक्तों को चुपके से मनोवांछित दे देते हैं क्योंकि उनके प्रेम में प्रदर्शन नहीं है।’ श्रीमद् भागवत कथा के अंतिम दिन कथावाचक डॉ. दीपिका उपाध्याय ने प्रवचन देते हुए कहा कि भगवान का नाम संकीर्तन ही कलियुग में जीवन आधार है। उन्होंने कहा कि भागवत कथा सुनना भी स्वयं में एक कला है। कुछ भक्त श्रोता प्रवर अर्थात उच्च कोटि के होते हैं और कुछ अवर अर्थात जिनका मन भगवत कथा में भी भटकता रहता है। जो भगवान की लीला चरित्रों के दौरान भी निंदा में तल्लीन रहते हैं, वे ‘ऊंट’ स्वभाव के श्रोता है। जिस प्रकार ऊँट आम छोड़कर कड़वा नीम पसंद करता है, ऐसे ही यह श्रोता कथा के स्थान पर निंदा में रस लेते हैं। जो कथा और निंदा को समान रूप से ग्रहण करते हैं यह ‘वृष’ स्वभाव के श्रोता है। जैसे बैल कड़वी खली और आम समान भाव से खाता है।
इसी प्रकार कुछ श्रेष्ठ श्रोता ‘चातक’ स्वभाव के होते हैं जिनका मन केवल भगवान के लीला वर्णन में लगता है। यह भक्त धन्य है। जो हंस स्वभाव के श्रोता हैं वे सभी शास्त्रों को सुनकर सार स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं।
सप्तम दिवस भगवान के भक्तों की कथा सुनाई गई। भगवान द्वारा यदुकुल संहार की यह लीला बताती है कि मर्यादा लुप्त हो जाने पर भगवान अपने वंशजों को भी दंड देने से नहीं चूकते। प्रभास क्षेत्र में ले जाकर, ब्राह्मणों को भोजन करा कर अपने वंश को नष्ट होता देखकर भी निर्विकार रहते हैं।
श्री भगवान अपने धाम को चले जाते हैं। भगवान का स्वधाम गमन यात्रा का यह प्रसंग भगवान के भक्तों के लिए बड़ा दारूण है। वास्तव में भगवान अपने भक्तों को प्राणहीन सा ही धरती पर छोड़ गए।
यही कारण था कि वही अर्जुन, वही गांडीव, वही महान अस्त्र-शस्त्र किंतु भगवान के अपने धाम जाने के बाद भगवान की पत्नियों को आभीर दस्यु मात्र लकड़ियों के बल पर अर्जुन के सामने ही हर ले जाते हैं। भगवान की पटरानियाँ भगवान के जाने के बाद योगाग्नि से अपना शरीर भस्म कर देती हैं। शेष 16100 रानियां अष्टावक्र ऋषि के श्राप के कारण दस्युओं द्वारा हर ली जाती हैं।
श्रीमद्भागवत कथा का प्रत्येक चरित्र भक्ति प्रदाता है। सातवें विश्राम के बाद शनिवार को श्रीमद् भागवत कथा की पूर्णाहुति हुई।
डा. दीपिका उपाध्याय ने कहा कि इस आपद् स्थिति में जहाँ घर पर रहना ही सुरक्षा के लिए अनिवार्य है, वहीं भगवान् का नाम सर्वोच्च सुरक्षा कवच है। दोनों का एकसाथ निर्वाह ऑनलाइन कथा के द्वारा ही संभव है।

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