लेख साहित्य

“तुझे मीत लिखूँ”

मन चाहता है,इक गीत लिखूँ
खुद को राधे, तुझे मीत लिखूँ….!

आँखों में नाचे मन मयूर….
धड़कन-धड़कन तेरा सुरूर
ले इन्द्रधनुष से मैं उमंग….
फूल और तितली की, प्रीति लिखूँ.
मन चाहता है,इक गीत लिखूँ

मन बहका हो तन घायल हो,
फिर भी तुझपे दिल पागल हो..
धरा-गगन सी कर अनुबंध
सागर-दरिया की रीति लिखूँ…
मन चाहता है,इक गीत लिखूँ….

होंठों पर खिलती पुष्पलता.
माथे पर चमके चन्द्रकला…
सोलह ऋंगार अभिव्यंजित हो
नट-नृत्यकला संगीत लिखूँ….
मन चाहता है,इक गीत लिखूँ..

वृन्दावन का वट हो ………
यमुना का शीतल तट हो..
हो वंशी की धुन पर महारास..
राधे-संग कृष्णा प्रीति .लिखूँ..
मन चाहता है,इक गीत लिखूँ..

तन-सुंदर-सत्य-शिवाला ……हो,
मन..प्रेम की जलती ज्वाला..हो,
दीपक संग पांखी…..का उत्सर्ग,
या विरहन चकवी की जीत लिखूँ !
मन चाहता है ,इक गीत लिखूँ..!
खुद को राधे, तुझे मीत लिखूँ….!!

किरण मिश्रा “स्वयंसिद्धा”
नोयडा

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