लेख साहित्य

वृक्षारोपण ही मॉनव जीवन की अमूल्य धरोहर डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा की कलम से..

भारत की संस्कृति एवं सभ्यता वनों में ही पल्लवित तथा विकसित हुई है यह एक तरह से मानव की जीवन सहचर है वृक्षारोपण से प्रकृति का संतुलन बना रहता है वृक्ष अगर ना हो तो सरोवर, नदियों में ना जल होगा और ना ही सरिता कल कल ध्वनि से प्रभावित होंगी, वृक्षों की जड़ों से वर्षा ऋतु का जल धरती के अंक में पहुँचता है, यही जल स्रोतों में गमन करके हमें अपार जल राशि प्रदान करता है वृक्षारोपण मानव समाज का सांस्कृतिक दायित्व भी है, क्योंकि वृक्षारोपण हमारे जीवन को सुखी संतुलित बनाए रखता है। वृक्षारोपण हमारे जीवन में राहत और सुख आनन्द प्रदान करता है। यहां की सभ्यता वनों की गोद में ही विकासमान हुई है। हमारे यहां के ऋषि मुनियों ने इन वृक्ष की छांव में बैठकर ही चिंतन मनन के साथ ही ज्ञान के भंडार को मानव को सौपा है। वैदिक ज्ञान के वैराग्य में, आरण्यक ग्रंथों का विशेष स्थान है वनों की ही गोद में गुरुकुल की स्थापना की गई थी। इन गुरुकुलों में अर्थशास्त्री, दार्शनिक तथा राष्ट्र निर्माण की शिक्षा ग्रहण करते थे इन्ही वनों से आचार्य तथा ऋषि मानव के हितों के अनेक तरह की खोजें करते थे और यह क्रम चला ही आ रहा है। पक्षियों का चहकना, फूलों का खिलना किसके मन को नहीं भाता है इसलिए वृक्षारोपण हमारी संस्कृति में समाहित है। मनुष्य के जीवन में वृक्षों का बहुत ही विशेष महत्व है। पेड़ धरती माता के बेटे हैं और हमारे मित्र भी जो कि हमें जीवन प्रदान करते हैं। वृक्षों से हमें फल, सब्जियां, लकड़ियां, आदि प्राप्त होती हैं। लकड़ी से फर्नीचर, कागज़, गोंद, आदि वस्तुएँ तैयार की जाती हैं। इसके अलावा पेड़ों से बहुत सारी औषधियां तैयार की जाती है, जो हमारे शरीर से संबंधित कई प्रकार के रोगों का उपचार करने में हमारी मदद करती है।

सनातन हिन्दू धर्म में पेड़ों को पूजा भी जाता है। कई ऐसे वृक्ष है, जिन्हें हमारे हिंदू धर्म में ईश्वर का निवास स्थान माना जाता है, जैसे नीम का पेड़, पीपल का पेड़, आंवला, बरगद आदी को शास्त्रों के अनुसार पूजनीय कहलाते है और साथ ही धर्म शास्त्रों में सभी तरह से वृक्ष प्रकृति के सभी तत्वों की विवेचना करते हैं। जिन वृक्ष की हम पूजा करते है वो औषधीय गुणों का भंडार भी होते हैं, जो हमारी सेहत को बरकरार रखने में मददगार सिद्ध होते है। आदिकाल में वृक्ष से ही मनुष्य की भोजन की पूर्ति होती थी, वृक्ष के आसपास रहने से जीवन में मानसिक संतुलन ओर संतुष्टि मिलती है। गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं –

मूलतः ब्रह्मा रूपाय मध्यतो विष्णु रुपिनः।
अग्रतः शिव रूपाय अश्वव्याय नमो नमः।।

अर्थात इसके मूल रूप में ब्रह्मा मध्य में विष्णु और अग्र भाग में शिव का वास होता है, इसी कारण अश्व्यय नामधारी वृक्ष को नमन किया जाता है।

पेड़ ना केवल हमें शुद्ध हवा प्रदान करते हैं बल्कि पर्यावरण को भी सुंदर बनाते हैं। पेड़ पर पक्षी अपना घोंसला बनाकर रहते हैं। तपती धूप में यह मनुष्य को छाया प्रदान कर उसे गर्मियों से बचाने में मदद करती हैं। वन हमें दूषित वायु को ग्रहण करके शुद्ध एवं जीवनदायक वायु प्रदान करता है, जितनी वायु और जल जरूरी है उतना ही आवश्यक वृक्ष होते हैं इसलिए वनों के साथ ही वृक्षारोपण सभी जगह करना जरूरी है और कई तरह के लाभ देने वाले वनों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। पेड़ों के ना होने से मनुष्य का जीवन संकट में आ जाएगा। मनुष्य सुख सुविधाओं के लालच में आकर आज पेड़ों का शत्रु बन बैठा है। वह निरंतर पेड़ों को काटते जा रहा है कंक्रीट के बड़े बड़े बंगले बिल्डिंग बनायी जा रही हैं जिस कारण हमारे पर्यावरण में दुष्परिणाम पड़ रहे हैं और मनुष्य को कई प्रकार के प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है।

वर्तमान में कोविड-19 का उदाहरण समस्त विश्व में देखने को मिल रहा है, जिसके कारण मनुष्य को ऑक्सीजन न मिलने की वजह से , ऑक्सीजन की कमी के कारण करोड़ो की संख्या में लोग मर रहे हैं। पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है, पहाड़ों का बर्फ लगातार पिघल रही है, जिससे बाढ़ का खतरा बना रहता है। पेड़ पौधे प्रकृति की शान है इसी के कारण इंसान धरती पर बचे हैं। पेड़ पौधे हैं तो जन जीवन है। अन्यथा इन सब आपदाओं के कारण जीवन खत्म हो जाएगा इसलिए हम सबको संकल्प लेकर अधिक से अधिक पेड़ लगाने चाहिए। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को कसकर जकड़े रहती हैं। जड़ों के कारण उपजाऊ मिट्टी हवा मे उड़ने (मृदा अपरदन) से बची रहती है। पेड़ समय पर बारिश करने में हमारी मदद करते हैं। सचमुच पेड़ हमारे सच्चे दोस्त हैं। हमें उनकी रक्षा करनी होगी। पेड़-पौधे खुद धूप और तूफान सहते हैं और हमें शीतल हवा और छाया प्रदान करते हैं ना कभी किसी से भेदभाव करते हैं और ना कभी किसी को अपना और पराया कहते हैं। हमें इनकी रक्षा करनी होगी और लोगों को पेड़ काटने से रोकना होगा, इनका हम पर बहुत उपकार है, यदि हमारे जीवन में हमें एक अच्छा जीवन चाहिए तो हमें अपने बच्चों की तरह इन पेड़-पौधों को पालना होगा। इन पेड़ों से ही तो हमें शुद्ध हवा और ऑक्सीजन प्राप्त होती है इसके बिना मानव जीवन असंभव है।

आज मानव अपनी भौतिक प्रगति की तरफ लालायित है वह अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए बेधड़क वृक्षों की कटाई कर रहा है ओधोगिक प्रतिस्पर्धा और जनसंख्या के चलते बनो का क्षेत्रफल प्रतिदिन घटता जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार एक करोड़ हेक्टेयर इलाके के वन काटे जाते हैं, अकेले भारत में ही 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले बनो को काटा जा रहा है, वृक्ष के कटने से पक्षियों का चहचहाना भी कम होता जा रहा है, पक्षी प्राकृतिक संतुलन स्थिर रखने में प्रमुख कारक है, परंतु वृक्षों की कटाई से तो वो भी अब कम ही दिखने लगे हैं, अगर इसी तरह से वृक्ष की कटाई होती रही तो इसके अस्तित्व पर ही एक प्रश्न चिन्ह लग जाएगा।

कई प्रकार के प्राकृतिक आपदाओं और प्रदूषण से भुगतने के पश्चात अब लोगों को वृक्षारोपण का महत्व समझ में आने लगा है। अब शहर से लेकर गाँव तक लोगों और सरकार ने मिलजुल कई कार्यक्रमों की शुरुवात की है जिससे कि वृक्षारोपण को बढ़ावा मिल रहा है। स्कूल और कॉलेज में भी बच्चों और अध्यापकों द्वारा नियमित रूप से निरन्तर वृक्षारोपण के कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं।

भारत सरकार द्वारा प्रतिवर्ष वन महोत्सव जुलाई माह के प्रथम सप्ताह में आयोजित किया जाता है। सन 1960 के दशक में यह पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति परिवेश के प्रति संवेदनशीलता को अभिव्यक्त करने वाला एक आंदोलन था। उस समय कृषि मंत्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के इसका सुत्रपात किया था। वनों को विनाश से बचाने एवं वृक्षारोपण योजना को वन महोत्सव का नाम देकर अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने तथा भू-आवरण को वनों से आच्छादित करने का एक नया प्रयास था। वर्षा काल में ये चार माह के पौधे थोड़े से प्रयास से अपनी जड़ें जमा लेते हैं। ऐसा प्रयास हम सभी को करना चाहिए।

ऐसे समय में हम बीज बम बनाकर ले जाएं और जहां भी जाएं खाली स्थान देखकर वह बीज बम डाल दें। बारिश की बूंदे जैसे ही गिरेंगी उसकी ऊपरी परत खाद मिट्टी की नम होकर गलकर बीज को अंकुरित करने में उसे बढ़ने में वह खाद उसकी मदद करेगा। और कुछ समय बाद पेड़ का आकार ले लेगा।

गरुण पुराण में कहा गया है कि, एक पीपल, एक नीम, एक बरगद, दस चिचड़ा, तीन कैथ, तीन बेल, तीन आंवले और पांच आम के वृक्ष लगाने वाला मनुष्य कभी नरक का द्वार नही देखता है।

छायाम ददाति शशिचन्दनशीतलां,
य: सौगन्धवन्ति सुम्नांसि मनोहरणीं।
स्वादुनि सुन्दरफलानि च पादपं तँ,
छिन्दन्ति जंगलजना अकृतज्ञता हा।।

अर्थात, जो वृक्ष चन्द्रकिरणों तथा चंदन के समान शीतल छाया प्रदान करता है, सुंदर एवं मन को मोहित करने वाले पुष्पों से वातावरण सुगंधमय बना देता है, आकर्षक तथा स्वादिष्ट फलों को मानवजाति पर न्योछावर करता है, उस वृक्ष को जंगली असभ्य लोग काट डालते हैं। मनुष्य की यह कैसी अकृतज्ञता है।

उज्जवल भविष्य के प्रति आशान्वित रहें, वृक्ष लगाएं, भविष्य उज्ज्वल बनाएं। वृक्षारोपण से स्वर्ग फल की कामना पूर्ण होती है।

हमारे देश में वृक्षारोपण के लिए कई संस्थाएं, पंचायती राज संस्थाएं, राज्य वन विभाग, पंजीकृत संस्था, कई समितिया ये सब वृक्षारोपण के कार्य कराती हैं कुछ संस्थाओं तो वृक्ष को गोद लेने की परंपरा कायम कर रही है, शिक्षा के पाठ्यक्रम में भी वृक्षारोपण को भी स्थान दिया गया है, पेड़ लगाने वाले लोगों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सभी देशवासी वनों तथा वृक्षों की महत्ता को एक स्वर से स्वीकार कर रहे हैं वन महोत्सव हमारे राष्ट्र की अनिवार्य आवश्यकता है, देश की समृद्धि में हमारे वृक्ष का भी महत्वपूर्ण योगदान है इसलिए इस देश के हर नागरिक को अपने लिए और अपने राष्ट्र के लिए वृक्षारोपण करना बहुत आवश्यक है।

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