लेख साहित्य

“बुढ़ापा” और “वरिष्ठता” में अंतर : संकलन “गौसेवक” खोजी बाबा

मनुष्य को उम्र बढ़ने पर “बूढ़ा” नहीं बनना चाहिये बल्कि “वरिष्ठ” बनना चाहिए l
“बुढ़ापा” अन्य लोगों का आधार ढूँढता है
और “वरिष्ठता” तो लोगों को आधार देती है l
“बुढ़ापा” छुपाने का मन करता है
और “वरिष्ठता” को उजागर करने का मन करता है l
“बुढ़ापा” अपने अनुभव का अहंकारी होता है
और “वरिष्ठता”अनुभवसंपन्न,विनम्र और संयमशील होती है l
“बुढ़ापा” नई पीढ़ी के विचारों से छेड़छाड़ करता है
और “वरिष्ठता” युवा पीढ़ी को बदलते समय के अनुसार जीने की छूट देती है.
“बुढ़ापा” “हमारे ज़माने में ऐसा था वैसा था” की रट लगाता है
और “वरिष्ठता” बदलते समय से अपना नाता जोड़ लेती है,उसे अपना लेती है l
“बुढ़ापा” नई पीढ़ी पर अपने विचार लादता है, थोपता है
और “वरिष्ठता” तरुण पीढ़ी की राय को समझने का प्रयास करती है l
“बुढ़ापा” जीवन की शाम में अपना अंत ढूंढ़ता है
मगर
“वरिष्ठता”वह तो जीवन की शाम में भी एक नए सवेरे का इंतजार करती है, युवाओं की स्फूर्ति से प्रेरित होती है l अत: “वरिष्ठता”और “बुढ़ापे”के बीच के अंतर को गम्भीरतापूर्वक समझकर जीवन का आनंद पूर्ण रूप से लेने में सक्षम बनिए l
उम्र कोई भी हो सदैव फूल की तरह खिले रहिए, उम्र की ऐसी की तैसी जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है !
बुढ़ापे में शांसें खत्म हैं लेकिन इच्छाएं अभी भी बांकी हैं जिसे मौत कहते हैं और
वरिष्टता में अभी भी सांसे बांकी है लेकिन इच्छाएं खत्म है जिसे मोक्ष कहते हैं !
बुढ़ापा जीवन के विभिन्न कोष्टकों में जोड़,घटाव, गुणा,भाग करता हैं जिसका अंतिम(यात्रा) गुणनफल शून्य होता है !
वरिष्टता में जीवन घटता है लेकिन अनुभव बढ़ता है, इसलिए कम समय में सम्पूर्ण जीवन जीती है l
बुढ़ापा देर से जीवन जीना शुरू करता है,जबतक रास्ते समझ में आती है तबतक लौटने का वक्त हो जाता है
और
वरिष्टता जीवन का हर लम्हा शुरू से ही आनंदपूर्वक चिंतामुक्त जीती है l
बुढ़ापा को आनेवाली मृत्यु भयभीत करती है,
जबकि वरिष्टता में आनेवाली मृत्यु एक चीर निंद्रा का शाश्वत पड़ाव है क्योंकि वह समझती है कि मौत एक दिन मुय्यन(तय) है तो रात को नींद क्यों नहीं आती !
बुढ़ापा जीवन के अंतिम क्षणों तक संग्रह करता है
जबकि वरिष्टता पुण्य को प्राथमिकता देती है जो करेंसी यहां के बाद भी चलती है l
अत: सदा हंसते रहें,मुस्कुराते रहें और खुश रहें l

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