लेख साहित्य

जाट योद्धा ठाकुर रामकी चाहर

रामकी चाहर एक ऐसा जाट योद्धा था जिसके डर से औरंगजेब के सेनापति ने जहर खा लिया था भारतीय इतिहास में यह एक मात्र ऐसी घटना है जब मुग़ल सेनापति ने किसी योद्धा (रामकी चाहर की ) के भय से युद्ध लड़ने के अपेक्षा ज़हर खाकर आत्महत्या करना उचित समझा हो
रामकी चाहर का जन्म आगरा जिले में चाहरवाटी के नाम से प्रसिद्धि फतेहपुर सीकरी ,अकोला क्षेत्र में मुग़ल काल में 17 वी सदी के प्रारंभ में हुआ था| इस समय आगरा ,अकोला ,फतेहपुर सीकरी क्षेत्र पर मुगलों का कब्ज़ा था | लेकिन यहाँ के स्थानीय जाट मुगलो के नियम कायदे को नहीं मानते थे| मुगलों ने इस क्षेत्र के जाटों के डर से यहाँ अपनी राजधानी भी हस्तांतरित कर ली थी| यह क्षेत्र चाहर जाटों की अधिकता और वीरता के कारण चाहरवाटी के नाम से प्रसिद्ध है| यहाँ की मिट्ठी में जन्मे जाटों में पराक्रम संघर्ष और प्रतिरोध का जन्मजात गुण पाया जाता है | रामकी चाहर के समय दिल्ली पर अत्याचारी औरंगजेब का शासन था | रामकी चाहर को घासी बाबा चाहर की सलाह पर चाहर जाटों का मुखिया चुना गया था| रामकी चाहर के समय सिनसिनवार जाटों का मुखिया थून सिनसिनी का राजाराम सिनसिनवार और सोगरवार जाटों का मुखिया खेमकरण सिंह थे | सौंख खुटेलापट्टी में कुंतल (तोमर) जाटों का मुखिया सुखपाल सिंह था| इन सभी जाटों ने आपसी सहयोग के लिए एकता करके एक संगठन बना रखा था|
रामकी चाहर ने मुगलों की राजधानी (फतेहपुर सीकरी) के निकट चाहर समेत अन्य सभी स्थानीय सभी जाट गोत्रो(खैनवार,छोंकर,मौर,सोलंकी,रावत,कहरवार,जूरेल,इन्दौलिया) की एक विशाल जाट पंचायत वैशाख माह में आयोजित की जिसमे सभी जाट गोत्रो के मुखियों ने सर्वसहमति चार प्रस्ताव पारित किए
1. कोई भी किसान अपनी फसल का लागन मुगलों को नहीं देगा
2.सभी पाले अपने अपने स्तर पर सैनिक संगठन तैयार करेगे
3.मुगलों की चौकियों को चाहरवाटी क्षेत्र से नष्ट करने में आपसी सहयोग देंगे
4.फतेहपुर सीकरी आगरा क्षेत्र में रामकी चाहर को सर्व पाल का मुखिया स्वीकार किया गया
इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद किसी भी व्यक्ति ने रबी की फसल का कर नही दिया इसके साथ ही रामकी चाहर ने 8 हज़ार जाट की एक फ़ौज भी तैयार कर ली थी | रामकी चाहर के नेतृत्व में जाटों ने स्थानीय मुग़ल सूबेदार की हत्या कर दी जब इस बात की सूचना दिल्ली में मुग़ल बादशाह औरंगजेब के पास पहुँची तो औरंगजेब ने इब्राहीम खान को मुल्तफत खान की उपाधि देकर आगरा भेजा ताकि इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) जाटों के विद्रोह को दबा सके
इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) मई 1681 ईस्वी को दिल्ली से मुग़ल सेना के साथ आगरा पहुंचा यहाँ पहुँच कर उसने जाटों की ताकत को परखा खुद को उनके सामने कमजोर पाकर जाटों के समीप संधि वार्ता का प्रस्ताव रखा लेकिन जाट वीरों ने उसकी संधि वार्ता को ठुकरा कर उसको युद्ध की चुनोती दे डाली
इब्राहीम खान (मुल्तफत खान ) ने धोखे से अकोला और बाद ग्राम के जाट मुखिया को बंदी बनाने का असफल प्रयास किया स्वाभिमानी जाट मुखियों ने झुकने के अपेक्षा युद्ध भूमि में मरना स्वीकार किया जब इस बात (इब्राहीम खान के धोखे का) का समाचार रामकी चाहर को पहुंचा तो उसने चाहरवाटी के आठ हज़ार योद्धाओं को लेकर मुगलों के गढ़ पर हमला कर दिया इस युद्ध में जाट वीरो के अदम साहस और पराक्रम के आगे मुग़ल परास्त होकर भाग खड़े हुए रामकी चाहर ने अकोला और बादगाँव के जाट मुखियों को सकुशल अपने अपने गाँव भेज दिया
इस युद्ध में विजयी होकर रामकी चाहर ने इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) को बंदी बनाकर अकोला गढ़ी ले आया अकोला गढ़ी में चाहर जाटों ने औरंगजेब के सेनापति इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) की जूतियों से अच्छी तरह मरम्मत (पिटाई) की अंत में मुग़ल सेनापति द्वारा रामकी चाहर के पैर पकड़ कर गिडगिडाना से मुग़ल सेनापति इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) को सैनिक की अपेक्षा हिजड़ा समझ कर छोड़ दिया जब मुगलों के इस तरह अपमान की खबर दिल्ली में औरंगजेब के पास पहुंची तो औरंगजेब ने अपने दूत के हाथो एक संदेश और ज़हर की पुडिया सेनापति इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) के पास भेजी मुग़ल दूत ने सेनापति इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) को औरंगजेब का सदेश पढ़कर सुनाया की यदि तुम मुगलों के अपमान का बदला रामकी चाहर और उसके वीर जाटों से नहीं ले सकते तो यह ज़हर खा लेना इस ज़हर को आलमगीर का आखरी तोफा समझना
सेनापति इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) ने लाख कोशिश की लेकिन वो जाटों को कभी भी परास्त नहीं कर पाया मुग़ल सेनापति की ऐसी दुर्दशा आज तक कभी भी नहीं हुई थी| अंत में रामकी चाहर और चाहरवाटी के जाट वीरों के आगे खुद को निर्बल समझ रामकी चाहर द्वारा अपने अपमान के डर से 6 जुलाई 1681 ईस्वी को ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली थी| भारत के इतिहास में ऐसी दूसरी कोई भी घटना दर्ज नहीं है जब किसी मुग़ल सेनापति ने भय से युद्ध लड़ने के अपेक्षा ज़हर खाकर मरना उचित समझा

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