लेख साहित्य

वर्षा गीतिका…

पावस ऋतु जब भी आती है, बादल करते शोर रे।
गर्जन तर्जन रिमझिम रिमझिम, हो वर्षा घनघोर रे।1
वन-उपवन में केकी झूमें, छटा दीखती अति अनुपम।
रंग-बिरंगे पंख पसारे, नर्तन करते मोर रे।2

धरती ओढ़े धानी चूनर, चहुँदिशि हरियाली छायी।
देख हरीतिम सुंदर वसुधा, मन में उठे हिलोर रे।3

तप्त धरा शीतल हो जाती, कूप-सरोवर भर जाते।
कल-कल ध्वनि सुनकर नदियों की, मन हो भाव विभोर रे।4

गिरती बूँदें पैदा करतीं, पड़-पड़ टन-टन का सरगम।
आरोही-अवरोही लय हो, वर्षा धीमी-जोर रे।5

मोर-मोरनी रह-रह बोलें, प्रतिध्वनि लगती अति प्यारी।
व्याकुलता स्वर में लगती है, ज्यों ढूढ़ें चितचोर रे।6

पिय की याद सताती दिल को, गोरी यह चिंता करती।
रात अकेले कटे न काटे, जाने कब हो भोर रे।7

कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, उन्नाव. ट्विटर- @tripathi_ps

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