लेख साहित्य

गुरु पूर्णिमा विशेष

आज गुरु पूर्णिमा का दिन है । सभी अपने गुरुजनों का आशीर्वाद पाने का प्रयास करते हैं ।सच्चा गुरु कैसे खोजा जाए क्योंकि ढोंगी और दुराचारी भी गुरु बने बैठे हैं । क्या जिसने फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ आदि विषय पढ़ाये वो गुरु है या वो सिर्फ शिक्षक है जो रोजगार पाने के लिए कुछ सांसारिक शिक्षा और अंक आधारित ज्ञान देते रहे । भारतीय संस्कृति में दो शब्द महत्वपूर्ण हैं – अविद्या और विद्या । अविद्या का अर्थ फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ आदि जैसे सांसारिक विषयों की शिक्षा से है, जब जिसके बारे में जानना है यूट्यूब पर वीडियो देख कर सीख लो या उस विषय की कोई किताब पढ़ लो, गुरु की भी आवश्यकता नहीं । किंतु विद्या के बारे में कहा गया है – “सा विद्या विमुक्तये” अर्थात ऐसा ज्ञान जो मुक्त करे । जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसे जड़ विकारों से मुक्ति दिलाये ऐसा ज्ञान देने वाला गुरु है । सँस्कृत में “गु” शब्द का अर्थ अंधकार है और “रु” शब्द का अर्थ उस अंधकार को मिटाने वाला । सच्चा गुरु भी यही करता है क्योंकि वह शिष्य को सन्मार्ग दिखाता है ।

आज के भौतिकता वादी युग में गुरु के प्रति न्यूनता आयी है उसका कारण ये भी है कि जीवन की आपाधापी और फटाफट हर चीज पाने की इच्छा ने हमें स्वकेन्द्रित बना दिया है और दूसरा आज के समय में किसी पर भी विश्वास करके उसे गुरु नहीं बनाया जा सकता । ऐसे में तुलसीदास जी कहते हैं कि जिनका कोई गुरु नहीं है या वो जो खोज नहीं पा रहे हैं उन्हें श्रीहनुमान जी को अपना गुरु बनाना चाहिए । हनुमान चालीसा का में वे लिखते हैं – “जै जै जै हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरुदेव की नाई ।”

श्रीहनुमान जी के चरणों में बारम्बार प्रणाम । बाबा हम सब को सही मति और गति प्रदान करें ।

जय श्रीराम जय हनुमान ।।

डॉ शशांक
(विवेकानंद विचार मंच
)

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