लेख साहित्य

गुरु ही सर्वस्व, गुरु ही ज्ञान का सागर एक तत्व , एक शक्ति – डॉ दिग्विजयकुमार शर्मा

“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।”,
“गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।”

“करता” करे न कर सकें,
“गुरु” करे सो होय!!
तीन “लोक” नव खण्ड में,
“गुरु” ते बड़ा न कोय!!

“गुरू” कोई “व्यक्ति” नहीं, कोई “शरीर” नहीं, “गुरू” एक “तत्व” है, एक “शक्ति” है।
“गुरू” “सच्चा” “शब्द” हैं। “गुरू” “सच्चा” “नाम” हैं। “गुरू” एक “भाव” है, “गुरू” “श्रद्धा” है। “गुरू” “समर्पण” है। आपका “गुरू” आपके “व्यक्तित्व” का “परिचय” है। “कब” “कौन”, “कैसे” आपके लिए “गुरू” “साबित” हो यह आप की “दृष्टि” एवं “मनोभाव” पर “निर्भर” करता है। “गुरू” “प्रार्थना” से मिलता है। “गुरू” “समर्पण” से मिलता है, “गुरू” “दृष्टा” भाव से मिलता है।

गुरु बिन ज्ञान न उपजै
गुरु बिन मिले न मोक्ष
गुरु बिन लखै न सत्य को
गुरु बिन मिटे न दोष

सब धरती कागज करूं,
लिखनी सब बनजाय |
सात समुद्र की मसि करूं,
गुरु गुण लिखा न जाय।।

शास्त्रों के अनुसार “गु” का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और “रु” का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। ‘गुरु’ को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है।

“अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन। शलाकया,चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नमः।।”

गुरु तथा देवता में समानता के लिए इस श्लोक में कहा गया है कि, जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी होती है।

हिंदू धर्म के अनुयायियों के बीच आज की पूर्णिमा तिथि का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। जब यह पूर्णिमा तिथि आषाढ़ मास के शुक्ल में होती है तो इस पूर्णिमा को गुरु एवं व्यास पूर्णिमा कहते है। धार्मिक मान्यता है कि पूर्णिमा तिथि को भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। गुरु पूर्णिमा का पर्व गुरुओं के नमन और उनके द्वारा दिए गए ज्ञान के प्रति आभार व्यक्त करने का है। इस दिन भक्त अपने गुरु का आदर सम्मान करते हैं और उन्हें यथा शक्ति गुरु दक्षिणा प्रदान कर कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए हैं। धार्मिक मान्यता है कि, आषाढ़ मास की पूर्णिमा को वेद व्यास जी का जन्म हुआ था। इसलिए इसे गुरु पूर्णिमा के साथ व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। इससे आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। ऐसा माना जाता है कि वेदव्यास जी ने ही पहली बार चारों वेदों का ज्ञान दिया था। इस लिए महर्षि व्यास जी को पहले गुरु की उपाधि दी गई है।

गुरु पूर्णिमा को गुरु का आदर और सम्मान करना चाहिए। गुरु पूर्णिमा के दिन जरूरतमंद लोगों को पीले अनाज, पीले वस्त्र और पीली मिठाई का भोग लगाकर दान करें. आर्थिक तंगी से निजात मिलेगा। गुरु पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल स्नानादि के बाद कुमकुम के घोल से मंदिर के बाएं और दायें तरफ स्वास्तिक का निशान बनाएं और मंदिर में दीपक जलाएं. इससे आपके घर में गृह क्लेश की समस्या दूर होगी और सुख- समृद्धि बनी रहेगी। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
आज का दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे। सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

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