लेख साहित्य

“मनवा मेरा पागल है”

गीली-गीली पलकें है , सहमा -सहमा काजल है।
बरखा, बूँदें, सावन ,बदली सबके सब ही घायल है।

मोर, पपीहरा, कोयल, दादुर, पिया- पिया की टेर लगी,
सबने पीर हृदय में रख ली, रिसता-रिसता आँचल है।

सारी रैन खड़ी देहरी पर, पलकें झूला झूल रही।
थर-थर काँपे रूह सजन बिन, टूटी प्रेम की साँकल है।

तेरे दरश को दियना बारे, आस प्रीत की टूट रही।
पवन की आहट उठि-उठि झाँके,मनवा मेरा पागल है।

किरण मिश्रा स्वयंसिद्धा
नोयडा

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