लेख साहित्य

प्यासा प्यासा सावन रोया

“प्यासा प्यासा सावन रोया,”
मन के मेरे शिवालय में
आँसू के पैमाने छलके,
गम के इस मदिरालय में !

यादों के जब ओले बरसे
तन की नगरी घायल थी !
पत्थर बन,पत्थर की पूजा
मैं भी कितनी पागल थी !

धड़कन सिसकी कंगन मचले !
पायल शोर मचाती थी।
बाजूबन्द उलझ झुमके में
साँसों को भरमाती थी!

चूनर उड़ती नभ को छूने,
आँचल के दुख हो गये दूने
सूखे नैन तड़फ ज्यूँ मछली
घर आंगन सब तुम बिन सूने!

एक सुहागन बनी वियोगन
प्रेम चुनरिया सीती है,
ओ निष्ठुर निर्मोही आजा,
जीवन बगिया रीती है!!

किरण मिश्रा “स्वयंसिद्धा”
नोयडा

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