लेख साहित्य

गणपति प्रभाती एवं वंदना

भारी मन से दें विदा, लंबोदर को आज।
दस दिन का यह साथ था, पुलकित हुआ समाज।।28
हाथ जोड़ विनती करें, पुनः पधारें आप।
भूल चूक सब कर क्षमा, हरें सकल संताप।।29
स्वागत हम सब फिर करें, मन में है यह आस।
प्रभु का हो पुनरागमन, बिखरे पुनः सुवास।।30

हे गजानन नमन करते, आपको कर जोड़ कर।
भक्ति में हों लीन हम सब, अहं सारे छोड़ कर।।

आपकी आराधना पूजा, हम सभी दिल से करें।
भक्ति के अनुपम अनूठे, भाव दिल में हम भरें।
माल्य अर्पण कर रहे हम, पुष्प लड़ियाँ जोड़ कर।
हे गजानन नमन करते, आपको कर जोड़ कर।1

जुड़ रहे कंधे अनेकों, भेद कोई है नहीं।
मात्र दर्शन की ललक है, दृष्टि स्थिर है वहीं।
आपके द्वारे उमड़ते, सर्व बंधन तोड़ कर।
हे गजानन नमन करते, आपको कर जोड़ कर।2

एकता की एक आँधी, हर कहीं पर चल रही।
हो रही जयकार प्रभु की, अति मधुर सुर है यही।
आप समरसता बिखेरें, भाव धारा मोड़ कर।
हे गजानन नमन करते, आपको कर जोड़ कर।

भोग में लड्डू चढ़ाते, नारियल भी फोड़ कर।
हे गजानन नमन करते, आपको कर जोड़ कर।।

कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा/उन्नाव, 19 सितंबर 2021

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