लेख साहित्य

क्यूँ हंसा इतना दूर हुआ

देह गंध रह गई, सुगंधित मन कपूर काफूर हुआ ।
पिंजरा उजड रहा है मनसर,हंसा इतना दूर हुआ ।।

चालें , घातें ,छलनाऐं,वर्जित अनुबन्ध बचे हैं शेष ,
कुटी हुई मिश्री सा जीवन, ढाई आखर चूर हुआ ।।

आँखें तो अपनी थी लेकिन,ख्वाब उन्हीं के सजते थे।
आँख चुराई जो उसने, तो अब यह चेहरा बेनूर हुआ।

उस कान्हा की बांसुरिया को राधा कहाँ छिपा पायी ।
तन तो हुआ कबीरा उसका,मेरा मन भी सूर हुआ।

चंद दिनों पायल संग संगत की, प्राणों ने प्रणय के मेले में ।
अब कलम हुई वाचाल प्रतिपल, हृदय मेरा संतूर हुआ।

सोचूँ उसके भी यादों की, खिडकी तो खुलती होगी।
वही बताये मनवा उसका, क्यूँ मुझसे इतना दूर हुआ।।

किरण मिश्रा “स्वयंसिद्धा/
नोयडा

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