लेख साहित्य

कहानी–कौशिकी…डॉ कृष्णा चतुर्वेदी

आज कौशिकी की आंखों में मुझे सिर्फ आंसू ही नहीं दिख रहे थे; वह काफी दुख और कष्टों के सागर में डूबी थी मैंने उसे कई बार पुकारा लेकिन मेरी आवाज उसके कानों तक नहीं जा रही थी; तथा मैंने उसे पास जाकर पुकारा कौशि फिर भी उसने मेरी आवाज पर ध्यान नहीं दिया; फिर मैंने उसके सिर पर हाथ रख कर पूछा; कौशिकी आज स्कूल नहीं जाएगी तो उसने बड़े ही दबे स्वर में कार्यरत भाव से कहा नहीं मैडम जी आज मेरी मां की तबीयत ठीक नहीं है ;भाई का ध्यान रखना है; घर का सारा काम करना है ;पिताजी के लिए टिफिन लगाना है; मैं बड़े आश्चर्य में पड़ गई कि इतनी छोटी सी उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी अभी उसकी उम्र ही क्या है ?11 वर्ष की है।उसकी जिम्मेदारी ने उसे आज बहुत बड़ा बना दीया है। और समझदार भी अभी ज्यादा समय ही नहीं हुआ मुझे अच्छी तरह याद है। ये वही कौशिकी है जो खिलता हुआ गुलाब सा चेहरा वह हमेशा खिलखिलाती रहती थी, बहुत सारे खिलौने के बीच वह खुद खेलने वाली गुड़िया सी लगती थी, जब उसकी मां मेरे पास आकर पूछते मैडम जी आपने कौशिकी को बिगाड़ दिया है हर समय खेलती ही रहती है। कभी इधर कभी उधर, घर पर 10 मिनट भी नहीं रुकती, रात में भी आपके पास आने की जिद करती है। मुझे भी जब तक उसे गोद में लेकर लाड न कर लूं उसके कोमल कपोल के दो-चार चुम्मन ना ले लूं तब तक मेरे भी,दिन की शुरुआत नहीं होती थी मुझे उसकी लत सी लग गई। जब वह मेरे पास आती बहुत ही धीरे से आकर मेरा आंचल खींचती बड़ी शरारती नजर से देखती और आकर लिपट जाती, मुझे अच्छी तरह याद है। जब वह प्रथम दिन स्कूल जा रही थी तो अपने माता-पिता के साथ ना जाकर मेरे लिए जिद करने लगी अगर मैडम जी जाएगी तभी जाऊंगी, मैं अपने कॉलेज में जाकर उससे स्कूल छोड़कर आई_ तो_ साड़ी का पल्लू पकड़ कर कहा आपके साथ ही जाऊंगी_ आप ही लेने आना ठीक है जब वह अंदर गई समय बीता गया जब वह 6 वर्ष की हुई तो आकस्मिक उसकी मां के सिर में जाने कौन सा दर्द हुआ कि वह दर्द उसकी जिंदगी लेकर ही गया, उसके सिर से मां का साया ही चला गया उसके पिता के पास इतनी आर्थिक स्थिति नहीं थी कि वह अच्छे डॉक्टर से उसकी इलाज करा सकता अब वह मां को याद करती है तो कहते हैं कि वह दवाई लेने गई है। वह हमेशा दरवाजे पर ही आंखें लगाए रहती की मां आएगी, किसी की आहट पाकर है दौड़ पड़ती मां आई है। लेकिन उदास चेहरा बहुत सारी प्रतीक्षा व मां के आने की आशा लेकर हमेशा चुपचाप बैठी रहती, अब उसका चुलबुला पन कम हो गया। 6 महीने बाद एक दिन मैं क्या देखती हूं कि एक दिन मैंने देखा की नवविवाहित जोड़ा रिक्शे से उतर रहा है। कौशिकी के पिता के साथ नई नवेली घुंघट में दुल्हन दिखाई दी जो धीरे-धीरे कौशिकी के घर की तरफ जा रही थी मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये क्या? मैं भी बड़ी उत्सुकता वश उनके पीछे-पीछे कौशिकी को लेकर उसके घर पहुंची और उसके पिता से पूछा कि ये कौन है। तो उसने बड़े ही प्रसन्नता पूर्वक अपनी बत्तीसी दिखाते हुए कहा कि कौशिकी रात दिन अपनी मां को याद करती और कहती थी कि मेरी मां दवाई लेकर आएगी रट लगाए रहती थी, तो मैं उसके लिए नई वाली मा ले आया हूं, जैसे कि कौशिकी ने नई मा का घूंघट उठाया तो उसे नई मां का चेहरा देखकर वह खुशी नजर नहीं आई, जो वह दौड़ कर अपनी मां समझ कर घूंघट उठाने चली थी। फिर अपने पिता से पूछा पापा ये मेरी वाली मम्मी नहीं है। तो पापा ने बस यही कहा कि अब यही तुम्हारी मम्मी है। अब उसका चेहरा बड़ा ही उदास रहता, वो मेरे पास तो कुछ समय के लिए मां को भूल जाती, और जब तक पूछती मैडम जी मेरी अच्छी वाली मां दवाई लेकर कब आएगी, तो मैं उसे सीने से लगा कर कहती बेटी और तुम्हारे यही मम्मी है, वह मम्मी अब भगवान के पास गई है, और उन्होंने ही इस मम्मी को भेजा है, मेरी इतनी बात सुनकर वह बहुत ही जोर से आंखों में आंसू लेकर रोती और कहने लगती_ ये वाली मम्मी मुझे प्यार नहीं करती ये तो पापा को प्यार करती है मुझे कोई भी खाने की चीज भी नहीं देती पापा भी मम्मी के लिए चीज लाते हैं मैं मांगती हूं तो पापा डांटते हैं, मम्मी तो पिटाई लगाती है, और काम भी करवाती है, नयी मम्मी अच्छी नहीं है, उसकी ये निश्चल बातें सुनकर मेरी भी आंखें भर आई और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उससे पूछा कि बेटा बताओ क्या चीज लोगी तो उसने बड़े ही मासूमियत से कहा मुझे चीज नहीं मुझे अपनी पुरानी वाली मम्मी चाहिए, भगवान जी से फोन करके कह दो मेरी मम्मी मेरे पास भेज दे! उसकी ऐसी बातें सुनकर मेरी आत्मा आज बहुत ही रोई और उसे कुछ खिलौने और चाकलेट आदि देकर बहला दिया, समय कब बीत गया पता ही नहीं चला, अब कौशिकी 11 वर्ष की हो गई, उसके एक बहन और एक छोटा भाई भी हो गया। अब वह रोती नहीं है। भाई को देख कर खुश हो जाती है। मां के साथ काम भी करती है। भाई को खिलाती है। अपनी पढ़ाई व स्कूल भूलकर, अब उसकी यही पाठशाला है। यही खेल खिलौने हैं। अब उसके चेहरे पर वह खुशी नहीं दिखती है। ना वह चुलबुलापन _केवल एक उदासी सी चेहरे पर छाई रहती है। और एक जिम्मेदारी। अभी मैं कुछ कहती कि उसके पिता की आवाज आई कौसी, मां को पानी पिला दे मां बुला रही है और वह दौड़ कर चली जाती है। और मैं अब उसको देखती ही रह जाती हूं।

डॉ दिग्विजयकुमार शर्मा

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