लेख साहित्य

कहानी .. मेरी तपस्या – डॉ कृष्णा चतुर्वेदी

वातावरण में शोरगुल था, रात के 10 बजे होगें, जिधर नजर जा रही है उधर से वहां प्रकाश दिखाई दे रहा था। तरह_ तरह की लाइटिंग की व्यवस्था जो की गई थी। माहौल बहुत खुशनुमा जो लग रहा था, संगीत की आवाज बहुत तेज आ रही थी। सभी लोग नृत्य करने में मस्त हो रहे थे, क्योकि आज दीपक के जन्मदिन का उत्सव बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा था, तभी मेरी नजर एक बहुत ही मासूम से बालक की तरफ गई जो बहुत ही उदास_ सा बैठा था, उसके चेहरे पर अन्य बालकों के जैसी चमक व खुशी नहीं दिखाई दे रही थी, मेरे कदम धीरे-धीरे उस बालक की तरफ अपने आप बड़े जा रहे थे, जब मैं उसके पास पहुंची तो वह सकपका गया, और हल्की सी बनावटी मुस्कान अपने चेहरे पर लाने की कोशिश करने लगा। मेरे बड़े सौहार्द से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा यस राज तुम यहां अकेले उदास क्यों बैठे हो? वहां सभी बच्चों के साथ मस्ती क्यों नहीं कर रहे हो। तो उसने बड़ी ही बेरुखी से जवाब दिया _आंटी सब का जन्मदिन मनाया जाता है, मेरा कोई भी जन्मदिन नहीं मनाता। मैंने पूछा कब है तुम्हारा जन्मदिन? तो उसने कहा मुझे नहीं मालूम इतना कहकर वह गहरी सोच में पड़ गया, पता नहीं, बताना चाह रहा हो कि मेरी तो मा ही नहीं है, जो बताए कि मैं किस दिन इस दुनिया में आया? और वह यशराज चुप हो गया, और मेरी तरफ बहुत ही आशा भरी नजरों से देखने लगा। फिर वह उठकर मेरे पास से कब चला गया मुझे मालूम ही नहीं पड़ा और मैं उसके बारे में सोचने लगी जैसे वह घटना दो-चार दिन पहले की ही हो _ 4 साल बीत गए, पता ही नहीं चला जब वह 3 वर्ष का ही तो था तब उसकी मां एक एक्सीडेंट मैं इस दुनिया से जा चुकी है, उसकी बड़ी बहन और दादी दादा 4 बच्चों की जिम्मेदारी निभाई, हमें कुछ पता ही नहीं चलता है कि कौन से बच्चे का कब जन्म दिन मनाया जाता है। लेकिन बच्चे जब किसी दूसरे बच्चों के जन्मदिन में जाते हैं तो बाल इच्छा जागती है, कि मेरा भी जन्मदिन बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाए। लेकिन यस कि वह बाल इच्छा मेरे मन में घर कर गई और मैंने पता लगा लिया कि यस की जन्मदिन तिथि क्या है। दिन महीने गुजरते गए और उसके जन्म की तिथि आई तो बड़े ही हर्ष के साथ उसके जन्मदिन की तैयारी करवाई, जब उसको मालूम हुआ कि आज मेरा जन्मदिन मनाया जाएगा तो वह खुशी से उछलता हुआ सारे मोहल्ले में बता आया कि आज मेरा जन्मदिन है। तुम सब शाम को मेरे घर आना। यस के जन्मदिन की तैयारी दीपक के जन्मदिन जितनी अच्छी नहीं थी, लेकिन उसकी खुशी इतनी नजर आ रही थी, कि किसी राजकुमार के जन्मदिन पर भी फीकी हो। वह खुशी से फूला नहीं समा रहा था। समय बीतता गया उसके 2o जन्मदिन बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाए गए। अब वह बड़ा हो चला था, बड़ा ही सात्विक विचारों वाला, अपने काम से काम रखता, सभी का चहेता बन गया क्योंकि वह सभी के काम सेवा बड़े ही भाव से करता। आज उसने स्नातक करके एक बड़ी लिमिटेड कंपनी में सुपरवाइजर की नौकरी करने लगा, जब भी मेरी नजर उसके ऊपर जाती है। तो बड़े ही आदर भाव से मेरे चरण स्पर्श करके कहता है। कि मुझे अपनी मां का तो ध्यान नहीं लेकिन मेरी मां होती तो आपके ही जैसी होती, उसकी ऐसी बातें सुनकर मेरा ममत्व उस पर न्योछावर करने का मन करता है। कि अपनी सारी ममता उसी पर लुटा दूं। सुबह के 10:00 बजे थे दरवाजे की घंटी बजी मैं पूजा छोड़कर दरवाजे पर पहुंची तो यश बड़ा खुश दिख रहा था उसने दौड़ कर मेरे चरण स्पर्श किए और शरमाकर कुर्सी पर बैठ गया, कुछ कहना चाह रहा था लेकिन बात होटो तक आते_ आते रुक जाती_ तो मैंने ही पूछ लिया क्या कहना चाहता है, मां से क्या शर्माना बताओ तो उसे साहस आया और कहने लगा कि आंटी जी मुझे आपकी जैसी भी बहू चाहिए, आप ही ढूंढ कर ला ना मेरी दुल्हनिया, पहले तो मुझे ऐसी बात सुनकर हंसी आई, और उससे कहा ठीक है। तो आज से ही मैं तेरी दुल्हनिया ढूंडूगी। उसे मेरी ऐसी बात सुनकर बड़ी ही सात्वना मिली, और एक उम्मीद लेकर वह चला गया। इस घटना को घटे 2 महीने मैंने ही निकले थे की रिश्तेदारी में एक लड़की मिली, वह एकदम कंचन सी काया, और उम्र में भी उससे 2 वर्ष कम थी मुझे पसंद आई, लड़की के घरवालों से बात हुई, विवाह तय हुआ। उसके परिवार वालों ने बड़ी ही धूमधाम से विवाह किया। यश के विवाह के उपरांत वह नौ 10 महीने बाद अचानक मेरे पास अपनी पत्नी को साथ लेकर और मेरे पास ही बैठकर मेरी ठोडी पकड़ कर कहने लगा की आंटी जी आपने कैसी मेरी पत्नी ढूंढी है? यह तो आपकी तरह ही डाटती है। और उसी तरह की ही नसीहते देती है। मुझसे अपनी बीवी की शिकायत करने लगा, मैंने एक एक शिकायत सुनी, वह कहता गया आप ही रखो, मैंने उसका कान पकड़ कर कहा कि तू ही तो कह रहा था, कि अपनी जैसी दुल्हनिया ला दो अब क्या है? तो उसने बड़ा ही आभार सा प्रगट किया, और मेरी गोद में सिर रखकर आंखों में आंसू भरकर कहने लगा कि आप जरूर मेरी यशोदा मां हो, उसकी ऐसी बात सुनकर मेरा अंतर मन भर आया और मेरी सिसकियां निकलने लगी, वह और उसकी पत्नी दोनों ही मेरे गले लग जाते हैं। और दोनों ही मेरे पैर दबाने लगे और, कहने लगे अब मुझे आपके ही पास रहना है, हम आपसे दूर नहीं रहना चाहते हैं, यस अच्छी तरह समझ गया था कि मेरी आंटी को अब मेरी जरूरत है। मेरी सेवा की जरूरत है क्योंकि मैं अपनी जिंदगी अपनी तनहाइयों के सहारे गुजार रही थी, उन दोनों की ऐसी बातें सुनकर मैं अपने ईश्वर को धन्यवाद करने लगे की प्रभु यही मेरी तपस्या का फल है, और मैं प्रभु के सामने जाकर दीपक प्रज्वलित करने लगी और उनके खुशहाल जीवन की ईश्वर से प्रार्थना कर ही रही थी कि _फिर आवाज आ रही थी कि मैं अभी तेरी शिकायत करता हूं_ मैं मंद मंद मुस्कुरा रही थी।

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