लेख साहित्य

“जगतजननी माँ’

माँ तेरी मुट्ठी में ही तो है ,
ये सृष्टि सारी,
माँ तू ही है इस
जगत को बनाने वाली,

तमस मध्य माँ
तू ही तो है उजाला,
साक्षी सूक्ष्म प्रकृति माँ तू ही तो है शिवाला,

माँ तू ही तो है दुर्गा शक्ति,
तू ही ममता की
करूणामयी मूर्ति,

माँ तेरे बिना दुनिया की
हर कल्पना अधूरी है,
माँ संवेदना तू,
तू ही भावना है,

इक सुमधुर अहसास है तू,
तू ही आराधना है,
तू ही परमपिता मां,
तू ही परमात्मा है,

तू अनुपम,अप्रतिम
सौगात है माँ..
तू आँगन की तुलसी है तो..
काँटो भरा गुलाब है माँ ,

बनकर ममत्व महके.
.सुन्दर सुवास है माँ,
जीवन रूपी मरूस्थल में..
बहती इक मीठी नदी है,

माँ…तू प्यारी लगती है सबसे…
तू ही पालिका है,

देवी….है माँ तू…
हम आराधक है तेरे
दिल से
तू ही तो जगतजननी माँ है……!!

किरण मिश्रा
नोयडा

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