उत्तर प्रदेश लखनऊ

शरण्ये त्रयंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते

लखनऊ सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना भारतीय संस्कृति की विलक्षण विशेषता है। यह भाव दुनिया की अन्य सभ्यताओं में दुर्लभ है। नवरात्र शक्ति उपासना का पर्व है। किंतु शक्ति का यह विचार भी सभी प्राणियों के कल्याण हेतु है –
सर्व मंगल मांगल्ये, 
शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्ये त्रयंबके गौरी, नारायणी नमोस्तुते!
वर्ष और दिवस में दो संधिकाल महत्वपूर्ण होते है। दिवस में सूर्योदय व सूर्यास्त के समय संधिकाल कहा जाता है। सूर्योदय के समय अंधकार विलीन होने लगता है,उसके स्थान प्रकाश आता है। सूर्यास्त के समय इसकी विपरीत स्थिति होती है। भारतीय चिंतन में इस संधिकाल में उपासना करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त वर्ष में दो संधिकाल होते है। इसमें मौसम का बदलाव होता है। ऋतु के समय संयम से स्वास्थ भी ठीक रहता है। नवरात्र आराधना भी वर्ष में दो बार इन्हीं संधिकाल में आयोजित होती है। यह शक्ति आराधना का पर्व है। इसी के अनुरूप संयम नियम की भी आवश्यकता होती है। पूरे देश में इक्यावन शक्तिपीठ पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते है। इस बार घर में रहकर ही व्रत आराधना करना भी एक प्रकार का आत्म संयम था। कुछ समय पहले ही उत्तर प्रदेश सरकार ने मां विंध्यवासिनी शक्तिपीठ, मां ललिता देवी शक्तिपीठ नैमिषारण्य और मां पाटेश्वरी शक्तिपीठ देवीपाटन में नवरात्र पर लगने वाले मेलों को राज्य स्तरीय मेले का दर्जा प्रदान किया था। इस बार मेला नहीं हो सका। लोगों ने आत्मसंयम का परिचय दिया। इसे भी आराधना का अंग कहा जा सकता है। सीतापुर जिले में मां ललिता देवी शक्तिपीठ पर अमावस्या मेला लगता है। बलरामपुर जिले में मां पाटेश्वरी शक्तिपीठ देवीपाटन तुलसीपुर व मिर्जापुर जिले में मां विंध्यवासिनी शक्तिपीठ पर वर्ष के दोनों नवरात्रि में मेला लगता है। इन्हीं का प्रांतीयकरण किया गया है। शक्तिपीठों में मां विंध्यवासिनी की महिमा भी विख्यात है। एक मान्यता के अनुसार विंध्यवासिनी मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। जनपद मीरजापुर में गंगा जी के तट पर मां विंध्यवासिनी का धाम है। यहां देवी के तीन रूपों का धाम है। इसे त्रिकोण कहा जाता है। विंध्याचल धाम के निकट ही अष्टभुजा और काली खोह का मंदिर है। अष्टभुजा मां को भगवान श्रीकृष्ण की सबसे छोटी और अंतिम बहन माना जाता है। श्रीकृष्ण के जन्म के समय ही इनका जन्म हुआ था। कंस ने जैसे ही इन्हें पत्थर पर पटका,वह आसमान की ओर चली गयीं थी। अष्टभुजा धाम में इनकी स्थापना हुई। यह मंदिर एक अति सुंदर पहाड़ी पर स्थित है। पहाड़ी पर गेरुआ तालाब भी प्रसिद्ध है। मां अष्टभुजा मंदिर परिसर में ही पातालपुरी का भी मंदिर है। यह एक छोटी गुफा में स्थित देवी मंदिर है। त्रिकोण परिक्रमा के अंतर्गत काली खोह है। रक्तबीज के संहार करते समय माँ ने काली रूप धारण किया था। उनको शांत करने हेतु शिव जी युद्ध भूमि में उनके सामने लेट गये थे। जब माँ काली का चरण शिव जी पर पड़ा। इसके बाद वह पहाडियों के खोह में छुप गयी थी। यह वही स्थान बताया जाता है। इसी कारण यहां का नामकरण खाली खोह हुआ। नवरात्र शक्ति आराधना का आध्यात्मिक पर्व है। मां दुर्गा के इस पावन पर्व में रंगो का बहुत अधिक महत्व होता है। नवरात्रि में नौ दिन दुर्गा मां के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा शैलपुत्री माता हैं। यह पर्वतराज हिमालय के घर में जन्मी थी। जिसके कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। शैलपुत्री माता की पूजा के दौरान पीले रंग वस्त्रों का महत्व है।
नवदुर्गाओं में दूसरी  माता ब्रह्माचारिणी हैं। ब्रह्माचारिणी माता की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। इस दिन हरे रंग के वस्त्र ठीक रहते है। मां दुर्गा की तीसरी शक्ति चंद्रघंटा है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। चंद्रघंटा माता की पूजा के दौरान स्लेटी रंग का विधान है। मां दुर्गा की चौथी शक्ति कुष्मांडा माता हैं। कुष्मांडा माता के आठ भुजाएं हैं। नवरात्रि के चौथे दिन कुष्मांडा मां की पूजा की जाती है। इस दिन नारंगी रंग के वस्त्र धारण करना शुभ होता है। मान्यता है कि मां कुष्मांडा को नारंगी रंग प्रिय है। पांचवी शक्ति स्कंदमाता माता है। स्कंदमाता अपने भक्तो को इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। इस दिन सफेद रंग के वस्त्र शुभ होते है। माता कात्यायनी को अमरकोष में पार्वती का दूसरा नाम बताया गया है। नवरात्रि के छठे दिन कात्यायनी माता की पूजा की जाती है। कात्यायनी और दुर्गा माता दोनों को लाल रंग काफी प्रिय है। कालरात्रि माता दुर्गा माता की सांतवी शक्ति है। कालरात्रि माता को काली,महाकाली, भद्रकाली,भैरवी,रुद्रानी, चामुंडा,चंडी और दुर्गा के कई विनाशकारी रूपों में से एक माना जाता है। देवी के इन रुपों से सभी राक्षस भूत,प्रेत,पिसाच और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है। इनकी पूजा के समय नीले वस्त्र धारण करने चाहिए। महागौरी मां दुर्गा की आठवी शक्ति है। नवरात्र के आठवे दिन महागौरी माता की पूजा की जाती है। इनको गुलाबी रंग प्रिय है। सिद्धिदात्रत्री माता मां दुर्गा की नौवी और अंतिम शक्ति है। नवरात्र के आखिरी दिन सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इस दिन बैंगनी वस्त्रों को शुभ माना जाता है। भारतीय पर्व उत्सव वैज्ञानिक।काल गणना पर आधारित है। आधुनिक खगोल विज्ञान के लिए भी चमत्कार से कम नहीं। क्योंकि इसका अविष्कार उस समय हुआ था जब दुनिया में अन्यत्र मानव सभ्यता नहीं थी। इसकल आकलन ईसापूर्व जैसी परिधि में संभव ही नहीं है। यह काल गणना पृथ्वी के प्रादुर्भाव से प्रारंभ होती है। यह शाश्वत है,चारों युग समाप्त होंगे,नए युगों का चक्र प्रारंभ होगा,लेकिन यह काल गणना तब भी इसी गति से चलती रहेगी। इसमें एक पल का भी अंतर नहीं आएगा। दुनिया की सर्वाधिक प्राचीन व वैज्ञानिक काल गणना का अविष्कार भारत में हुआ था। इसमें समय के न्यूनतम अंश का भी समावेश है। प्रलय के बाद भी यह काल गणना निरन्तर जारी रहेगी प्रासंगिक रहेगी। इसके नव वर्ष में प्रकृति भी नए रूप में परिलक्षित होती है। यह संधिकाल आध्यात्मिक ऊर्जा को प्राप्त करने का अवसर होता है। इसमें पाश्चात्य नव वर्ष की तरह देर रात का हंगामा नहीं होता। भारतीय काल गणना में परमाणु से लेकर कल्प तक का विचार है। इसलिए यह पूर्णतया वैज्ञानिक है। भारतीय नव वर्ष का प्रथम दिन अपने में व्यापक सन्देश देने वाला होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही पृथ्वी माता का प्रादुर्भाव हुआ। इसी के साथ ब्रह्मा जी ने काल गणना का श्री गणेश किया। नवरात्रि का प्रथम दिवस मत्स्यावतार,प्रभु श्री राम का राज्याभिषेक,धर्म राज युधिष्ठिर का राज्य तिलक इसी दिन हुआ था। यह सभी अवसर भारतीय संस्कृति को समृद्ध बनाने वाले है।पृथ्वी के प्रादुर्भाव के एक अरब सत्तानबे करोड़ उनतीस लाख उनचास हजार एक सौ बाइस वर्ष हो चुके है। इस अवधि में एक पल का भी अंतर नहीं हुआ है। यह भारतीय वैज्ञानिक काल गणना कि विशेषता है। इसकी बराबरी के विषय में दुनिया की अन्य काल गणना कल्पना भी नहीं कर सकती। ईसा पूर्व और ईसा बाद का प्रचलन तथ्य परक नहीं है। प्राचीन भारत के गुरुकुल अनुसन्धान के केंद्र हुआ करते थे।
कालगणना में क्रमश: प्रहर,दिन रात,पक्ष, अयन,संवत्सर, दिव्यवर्ष,मन्वन्तर,युग, कल्प और ब्रह्मा की गणना की जाती है। हमारे ऋषियों ने चक्रीय अवधारणा का सुंदर वर्णन किया। काल को कल्प,मन्वंतर,युग में विभाजित किया। चार युग बताए। सतयुग, त्रेता,द्वापर और कलियुग। इनकी चक्रीय व्यवस्था चलती है। अर्थात ये शाश्वत रूप से आते जाते है। इसकी पुनरावृत्ति होती रहती है। इसके अनुरूप इस समय ब्रह्मा की आयु के दूसरे खंड में,श्वेतावाराह कल्प में,वैवस्वत मन्वंर में अट्ठाईसवां कलियुग चल रहा है। इस कलियुग की समाप्ति के पश्चात चक्रीय नियम में पुन: सतयुग आएगा।

About the author

india samachar

Add Comment

Click here to post a comment

Leave a Reply

Live TV

GMaxMart.com

Our Visitor

1288704
Hits Today : 7532