लेख साहित्य

प्रवीण प्रभाती, “बाल श्रम”

दर-दर ठोकर खाता बचपन, शर्म न हमको आती।
बिना तरस खाये बच्चों से, दुनिया नज़र फिराती।1
एक तरफ नंगा है बचपन, भीख सड़क पर मांगे,
तैमूरों को छींक जो आये, कितने पीटें छाती।2
कितने छोटू चाय पिलाते, पंचर कहीं लगाते,
बर्तन धोते कचरा बिनते, जगह-जगह दिन-राती।3
ऊपर से हँसते हों फिर भी, टीस छिपाये रहते,
कितना जीवट भरा हुआ है, बिना कहे कह जाती।4

कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा/उन्नाव, 16 नवंबर 2021

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