लेख साहित्य

नैना पंथ निहारे..

अधर शुष्क,मैले हैं वसन,
हृदय कुन्ड,धधके है अगन।
खड़ी द्वार पर आकुल जोगन,
अश्रु विकल व्याकुल अति खंजन,

हृद-अनंग बिध डारे।
नैना पंथ निहारे……..।

रूप षोडशी ,चंचल यौवन
थिरक रहे थे,कल तक कँगन
आज खड़ी बस करती मंथन,
रूठे क्यूं प्रियतम मनरंजन,

टूटे क्यूँ नेह पियाले।
नैना पंथ निहारे…….।

मदिर वदन, बहती मधुशाला,
कंचन काया, रूप शिवाला,
पायल की रून झुन में बसती
थी जिसके जीवन की शाला।

मृत सपने तेरे बिना रे ।
नैना पंथ निहारे…..।

मन बगिया में फूल खिलाने,
कब आओगे प्रीत सिखाने,
दिल की धड़कन, तुम्हें पुकारे
मन में उलझन,क्यूँ हुई अनबन,

कुछ तो बैन सुना रे,
नैना पंथ निहारे…..!

किरण मिश्रा “स्वयंसिद्धा”
नोयडा

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