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“अल्हड़ कविताएं”

नवयौवना सी
अल्हड़ थी मेरी कवितायें….

हंसती ,मुसकुराती,
मनुहार करती थी,
शब्दों के अलंकरण
और रूपक परिधानों से सजी
मुग्धा, कामिनी, सुहागिनी सी।

सुवासित थी,तुम्हारी ही
अभिव्यंजनाओं से मोगरा जूही,
चम्पा, चमेली सी,
बलखाती, इठलाती, इतराती
सभी बन्धो को तोड़
बह जाती थी कल कल
करती नदिया सी जाने कितनों के
मानस पटल को झंकृत करती
अपने भावानुराग में।

झर झर झरती थी
मीठे झरने सी,
अहसासों की नमी पाकर,
दूर तलक हरीतिमा बिखेरती
अपने शब्द सौष्ठव का,
कलरव करती थी मेरे
मष्तिक के तहखाने में
खंजन पक्षी सी,

शिव के ओंकार सी
गूंजती थी
मेरे मनाकाश में
राधा के प्रेम सी निश्चल
मीरा के भक्तिभाव सी सरल
तुलसी विरवा सी पवित्र
नेत्र बिन्दुओं सी तरल

मेरी सुबह के सुनहले सूरज
मेरी रातों के रूपहले चाँद सी
जगमगाती रहती थी ,
हर पल मेरे
स्वप्नीली जिंदगी में
मुस्कुराती रहती थी,
हृद मन्दिर में अवस्थित
मेरे, देव प्रतिमा सी।

पर आज
मेरी वही कवितायें
धवल पन्नों पर एकाकी और
शब्द शून्य,
शाम की लालिमा सी
रक्तिम पलकों पर उदास,
मेरे अन्तस की पीर से जलज
अब भावशून्य, हो रहीं हैं,

इक तुम्हारे प्रेम की झील के
सूख जाने से,

तुम सुन रहे हो न…श्याम❤❤

किरण मिश्रा #स्वयंसिद्धा
नोयडा

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