लेख साहित्य

इश्क़ तल्खियाँ हैं जुदाई है

तोड़ दिया आखिर मेरा गुरुर,
मेरी आत्मा, मेरा प्रेम, मेरी रूह का सुरूर।

कौन कहता है आसमाँ रोता नहीं,
शाम का आँचल यूँ ही तो सुर्ख होता नहीं ।

चाँद करता है रोज रजनी से ही बेवफाई,
संग लेके चाँदनी अकसर इठलाता है वो हरजाई।

कौन कहता है भ्रमर खोता नहीं ।
खिलाता है कली का यौवन पर ताउम्र ढोता नहीं।

कौन कहता है पंतगा जल जाता है।
शम्मा पर होता है निसार पर मिलन को ठुकराता है।

कौन कहता है बादल को है पीर भारी,
पाकर पुरवा का साथ करता है धरा से होशियारी।

कौन कहता है पीर उर में पलती है।
नयनों की गगरी फिर खामोशी में क्यूँ छलकती है।

कौन कहता है इश्क़ ..खुदाई है,
कर के तो देखो ! रंजिशे हैं,तल्खियाँ हैं ,और जुदाई है।

किरण मिश्रा “स्वयंसिद्धा”
नोयडा

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