लेख साहित्य

“सुहानी भोर”

खूबसूरत पैगाम
मिला जो शाम….
किरण झिलमिलायी
चाँदनी गुनगुनायी
चाँद बेसब्री से
बस चलता ही रहा…
रजनी का आँचल
रातरानी ज्यों खिल गयी..
सन्दली महक
पवन संग… घुल …गयी.
तारों.. से सजी ओढ़नी
निशा की ढलक गयी
शर्म से लाल
विभा पनघट… जब
ऊषा गगरी….
धरा मुख
स्वर्ण पुञ्ज उड़ेल गयी…..
क्षितिज ने ली बलायें .
पवन मुस्कुराये…
प्रेम का पैगाम…
रश्मि किरण….
अमृत रस
दिनकर में घोल गयी….
सुहानी हुई भोर
दसों दिशाये…डोल गयी..
सत्य …शिव.. सुन्दर…
जीवन पथ खोल गयी…….!!”

किरण मिश्रा “स्वयंसिद्धा”
नोयडा

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