लेख साहित्य

” सूरज पूरब से उगा और पश्चिम में डूब गया “

आज नई साल का नया दिन आया,
हमने इसमें कुछ भी नया नहीं पाया।
हमने प्रात:काल भ्रमण के लिए दरबाजा खोला,
“हप्पी न्यू ईयर ”
पडोसी मुस्करा कर बोला ।
“नव बर्ष आपके लिए भी शुभ हो”
हमने भी झट से बोल दिया,
जितना उसने दिया
हमने भी उसे उतना ही तोल दिया।
रोज की तरह कचरा बीन रहा था
बच्चा भोला भाला,
घने कोहरे में सवारी के इंतजार में था
रिक्शा बाला।
कार का टायर जला हाथ ताप रहे
कुछ गरीब,
कूं-कूं करते कुत्ते के पिल्ले भी थे
उनके करीब।
दुबला-पतला लड़का घनी धुंध में
अखबार बांट रहा था,
सडक किनारे भिखारी पुराने ही अंदाज़ में
भीख मांग रहा था।
पता ही नहीं चला कब पुरानी साल बीती और
नई आ गई ,
पेट की आग इन्हें
सब कुछ भुला गई ।
स्ट्रीट लाइट धुंध में टिमटिमा रही थी,
कभी आ रही थी कभी जा रही थी।
मैं अपनी ही धुन में
बढा चला जा रहा था,
मुझे तो वही पुराना
मंज़र नजर आ रहा था।
अखबार में भी सब कुछ वही था ,
उसमें नया तो कुछ भी नहीं था।
शहर की गति को भीषण जाम,
बढते प्रदूषण से जीना हराम।
स्वास्थ्य मंत्री ने दवा खरीद में
घोटाला कर डाला ,
स्वामीजी ने नाबालिग शिष्या से
रेप कर डाला।
शहर में दिन-दहाड़े डकैती का
फिर वही किस्सा ,
फिरौती की रकम में से पुलिस मांग रही थी
अपना हिस्सा।
पुलिस इधर मलाई और उधर
मंत्री जी के तलुए चाट रही थी ,
बलात्कार पीड़िता रपट के लिए
थाने के चक्कर काट रही थी ।
शहर के पंच सितारा होटल
दूधिया रोशनी में नहा रहे थे,
कथित धनाड्य नव बर्ष का
जश्न मना रहे थे।
अंदर बार-बालाओं पर
वे नोट लुटा रहे थे,
बाहर मासूम उनकी
झूठन चाट रहे थे।
ये कैसा शुभ दिन जब विलासिता हंस रही
दीनता रो रही है,
अन्नपूर्णा देवी क्यों
सिर ढक कर सो रही है।
कुछ नए का इंतजार करते-करते
शाम तक मन ऊब गया,
पर रोज की तरह सूरज पूरब में उगा और
पश्चिम में डूब गया।
(विजय कुमार)

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