लेख साहित्य

काहे मनवा समझ न पाता

मानव से मानव का नाता
काहे मनवा समझ न पाता

अपनेपन की वैशाखी,
रिश्तों के बोझे में उलझी
तेरा मेरा करते-करते
जीवन क्षण भंगुर हो जाता।

काहे मनवा समझ न पाता।

खूब हंसाए जग के मेले,
फिर भी बापू फिरें अकेले
जिस आंचल में बडे़ हुए हैं ,
उनसे अब छत्तीस का नाता,

काहे मनवा समझ न पाता..

उम्र मदारी खूब नचाती,
सारा जीवन आपा-धापी
बचपन की उंगली को पकडे़
जिस्म यहाँ बंजर (बूढा़) हो जाता।

काहे मनवा समझ न पाता।

कर्म का लेखा भाग्य है बाँचे ,
लोभ में उलझा कब वो जाँचे
माया ठगिनी आनी जानी
कौन ये गठरी संग ले जाता।

काहे मनवा समझ न पाता।

डाॅ. किरण मिश्रा ‘स्वयंसिद्धा’
नोयडा

Live TV

GMaxMart.com

Our Visitor

1351316
Hits Today : 5327