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भारत पूर्व में ही विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था थी

पराग सिंहल

आजकल देश के समाचार पत्रों में बड़ा उल्लेख हो रहा है कि भारत विश्व की छठवी अर्थव्यवस्था में शामिल हो गया है। कहा यहां तक जा रहा है कि दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ रही भारतीय अर्थ व्यवस्था का आकर 2047 तक 20 लाख करोड़ डाॅलर हो जाएगा। यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि अगले 25 वर्षो में औसत वृ(ि दर वार्षिक वृ(ि दर 7-7.5 प्रतिशत हो।

हम आपका ध्यान प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएमद्ध के चेयरमैन बिबेक देबराॅय के बयान पर आकृष्ट करना चाहते हैं, ‘भारत के लिए प्रतिस्पर्धात्मकता का मसौदा /100’ जारी करते हुए उनके द्वारा कहा गया कि पीएम मोदी ने 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। लेकिन महत्वपूर्ण यह भी है कि भारत के विकास के लिए राज्यों की वृ(ि भी महत्वपूर्ण है। आगे कहा कि आर्थिक वृ(ि की गति 7-7.5 प्रतिशत को नियमित बनी रही तो 2047 तक बनी रही तो अर्थव्यवस्था का आकार 20 लाख करोड़ डाॅलर से थोड़ा कम होगा। साथ ही कहा कि वर्तमान में दुनिया का छठवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का आकार 2.7 लाख करोड़ डाॅलर है। 

हमको एक 1947 के उस आंकडे़ ध्यान देना होगा कि आजादी के समय जब हमको ब्रिटिश शासन से प्राप्त हुई थी तब भारत को ‘तीसरी दुनिया’ का देश माना जाता था, उस दौरान भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2.7 लाख करोड़ रुपये था, जबकि पिछले 7 दशकों में बढ़कर 150 लाख करोड़ रुपये हो गई। आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं हार्वड बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर माइकल ई पोर्टर के बयान की ओर देना होगा, जिसमें कहा कि भारत दुनिया के सर्वाधिक महत्वपूर्ण देशों में एक है। जबकि मार्गन स्टैनली के विश्लेषकों ने कहा कि 202-23 में भारत की आर्थिक वृ(ि दर एशियाई देशों में सबसे तेज होगी। यह सभी अध्ययन वर्तमान के हैं अथवा संभावना व्यक्त किये गये हैं।

हम गर्व कर रहे हैं कि भारत 2047 तक विश्व की बड़ी अर्थ व्यवस्था में शामिल हो जाएंगे, कोशिश जारी हैं कि अगले 22 वर्षो में शामिल हो पाएंगे।

मैं भारत की जीडीपी पर विकीपीडिया का अध्ययन कर रहा था उसमें पाया कि According to economic historian Angus Maddison in Contours of the world economy, 1–2030 AD: essays in macro-economic history, the Indian subcontinent was the world's most productive region, from 1 AD to 1600 यह तो आपको ध्यान होगा कि लेकिन हमको अपने भारत के ऐतिहासक तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए कि हमारे भारत को ‘सोने की चिड़िया’ क्यों कहा जाता था, क्या कारण था। कारण ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं कि जब 1857 में ब्रिटिश फौजों ने भारत में पूर्णतया शासन स्थापित कर लिया उस समय ब्रिटिश क्राउन ने गुलाम भारत की अर्थव्यवस्था का अध्ययन कराया था, और अध्ययन करने वाले कोई ब्रिटिश नहीं थे बल्कि भारतीय ही थे, नाम मुखर्जी ‘स्रोत था Mukherjee, Asian Studies Income & Wealth (Page 103) पर, इस अध्ययन में 1857-1863 के बीच (7 साल) प्रति व्यक्ति आय 169 रुपये आंकी गई थी। अब बात करते हैं भारत को ‘सोने की चिड़िया’ क्यों कहा जाता था। हम अक्सर धार्मिक एवं सामाजिक कहानियों में पढ़ते हैं कि एक सेठ था जोकि भारत की बनी हुई वस्तुओं को बिक्री करने और धन कमाने के सिलसिले में समुद्र मार्ग से विदेशों में जाते थे, उस विदेशी व्यापार और धन सम्पदा के बारे में सुन कर ही विदेशी आंक्राता भारत में आये और भारत को लूटा भी और शासन भी स्थापित कर लिया। 

तो अब प्रश्न खड़ा होता है कि आज भारत विश्व की बड़ी अर्थ व्यवस्थाओं में शामिल होने की कतार में खड़ा है और उसको अभी भी 2047 का इंतजार करना होगा। लेकिन मेरा मानना है कि आज भी भारत सोने की चिड़िया है लेकिन भारत सरकार की कुछ नीतियों, जो भी ब्रिटिश काल के कानूनों से प्रभावित हैं और भारत में व्यापार-धन्धें के व्यापक विकास से रोक रही है। इस तर्क के समर्थन में पुनः लिख रहे हैं कि हमारे देश में जो व्यापार-उद्योग आदि सम्बन्धित कानून आदि है वह 62 साल से 78 साल पुराने हैं, साथ ही यह भी स्पष्ट है कि उनके पीछे सोच तभी की है जबकि आजाद हुए देश में व्यापार-उद्योग एवं व्यापारियों की संख्या पूरे देश में हजारों में ही थी, न कि लाखों में और न करोड़ों में। सम्य यह भी हमारे देश में व्यापार-उद्योगों पर प्रतिबंध नीति भी प्रभावी थी, जोकि तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहाराव ने समाप्त की। अभी ही हाल ही में एक समाचार पढ़ने का मिला कि त्यौहारों का देखते हुए वाहनों में बिक्री में 21 प्रतिशत की वृ(ि दिखायी दे रही हैं। 

बहरहाल, हमारा तो यह मानना है और कहना है कि भारत के नागरिक होने के नाते हमको खुशी होनी चाहिए कि भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था में शामिल होने की तेज गति से बढ़ रहा है कि 2047 का लक्ष्य रखा है लेकिन हम केन्द्र सरकार, विशेष की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी का ध्यान आकृष्ट करना चाहेंगे कि वह 62 से 78 साल पुराने कानूनों को प्रभावहीन करने का बड़ा निर्णय शीघ्र ही लें, क्योंकि हम जानते हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कोई बड़ा और चुनौतीभरा निर्णय लेने में संकोच नहीं करते।

हां, हम यही कहेंगे कि देश में 62 साल पुरान आयकर अधिनियम 1961 के साथ माल एवं सेवाकर अधिनियम, जो कि 2017 में प्रभावी एवं लागू हुआ, परन्तु वह सेन्ट्रल एक्साइज एक्ट, 1944 एवं इण्डियन कस्टम एक्ट, 1962 को आधार पर बनाया गया था, को पुनः देश की वर्तमान औद्योगिक स्थिति का अध्ययन करते हुए व्यापार- उद्योंगों को खुले बातावरण देने का निर्णय देनी होगा, यहां पर एक प्रश्न और खड़ा होता है कि भारत का सबसे बड़ा बाजार है, जिसकी आबादी 135 करोड़ है विश्व की बड़ी-बड़ी उत्पादन कम्पनियां भारत में अपना उत्पाद बेचने के लिए आतुर हैं परन्तु अफसोस है कि 135 करोड़ की आबादी के साक्षेप में मात्र 10 करोड़ और आयकरदाता है, उसमें से मात्र 2 करोड़ ;लगभगद्ध आयकर का भुगतान कर रहें उधर जीएसटी में मात्र 1.50 करोड़ लोग ही व्यापार उद्योग कर रहे हैं, इन स्थिति को बदलने के लिए ठोस एवं कड़े निर्णय लेने होंगे, देश में Tax sense, ease of doing business को सरल एवं लोकप्रिय बनाना होगा, केवल नारों तक सीमित न रहे। 

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