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भारतीयता के अनुरूप स्वदेशी शिक्षा पद्धति से ही सशक्त होगा हमारा राष्ट्र

Indian Education Policy भारत में सत्ता संचालन के लिए अंग्रेजों ने जिस मैकाले शिक्षा पद्धति को लागू किया था अब हमें उसका पूर्ण त्याग करते हुए भारतीय परंपरा के अनुकूल शिक्षण पद्धति की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

डा. नागेंद्र प्रसाद सिंह। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमृत महोत्सव के दौरान शिक्षा क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम के रूप में भारतीय शिक्षा नीति का उद्घोष किया तथा उसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण कदम भारतीय शिक्षा बोर्ड को संचालित करने हेतु वैधानिक स्वरूप प्रदान किया। साथ ही स्वामी रामदेव एक दशक से हर मंच पर यह बात प्रमुखता से उठाते रहे कि राष्ट्र तभी पूर्ण स्वाधीन एवं वैश्विक स्तर पर सशक्त होगा, जब हमारी शिक्षा पद्धति स्वदेशी होगी।

स्वदेशी का उनका तात्पर्य यह था कि हमारी शिक्षा पद्धति सनातन साझा संस्कृति के गर्भ से उद्भूत होनी चाहिए। उनका यह तर्क था कि हम जब तक अपनी शिक्षा पद्धति में अपने महापुरुषों के संकल्पों को समावेशित नहीं करेंगे, तब तक हमारी शिक्षा पद्धति मूलतः मैकाले द्वारा प्रतिपादित पाश्चात्य शिक्षा पद्धति की ही नकल होगी। प्राचीन ज्ञान परंपरा के बिना मात्र पाश्चात्य संस्कृति पर आश्रित शिक्षा युवा पीढ़ी को राष्ट्र की जड़ों से दूर हटाती है।

भारतीय शिक्षा बोर्ड का गठन

भारत सरकार द्वारा भी यह अनुभव किया गया कि जब हम देश की ज्ञान परंपरा को अलग से पढ़ाते हैं तथा उसका समावेश नूतन अनुसंधान के साथ नहीं होता है तो वह शिक्षा पद्धति भी अधूरी रहती है। साथ ही यह अभिभावकों व छात्रों को आकर्षित नहीं कर पाती है। उनके मस्तिष्क में यह भाव आता है कि मात्र प्राचीन परंपरा पढ़ने से हम वर्तमान चुनौतियों हेतु आवश्यक जीवन कौशल से भिज्ञ नहीं रहेंगे। इसलिए व्यापक चिंतन के बाद यह अनुभव किया गया कि इसका एक मात्र समाधान प्राचीन ज्ञान परंपरा एवं नूतन अनुसंधानों से समन्वित शिक्षा ही हो सकती है। इसके लिए शिक्षा मंत्रालय (पूर्व में मानव संसाधन एवं विकास) भारत सरकार की स्वायत्तशासी संस्था के माध्यम से एक ‘एक्सप्रेशन आफ इंटरेस्ट’ जारी किया गया, जिसके माध्यम से एक ‘स्पांसरिंग बाडी’ का चयन किया जाना था जो भारतीय शिक्षा बोर्ड सोसाइटी पंजीकृत करके भारतीय शिक्षा बोर्ड का गठन करेगी।

 

नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप

भारतीय शिक्षा बोर्ड द्वारा पाठ्यक्रम और पाठ्य विवरण तैयार करके भारत सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया गया जिसका परीक्षण एनसीईआरटी और सीबीएसई से कराया गया। उसके आधार पर यह प्रमाणित किया गया कि पाठ्यक्रम एनसीएफ (नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क) के अनुकूल एवं नई शिक्षा नीति 2020 की भावनाओं के अनुरूप है। बोर्ड को वैधानिक रूप से चलाने के लिए यह आवश्यक है कि देश के समस्त केंद्रीय बोर्ड एवं राज्य सरकारों के समस्त बोर्ड के समकक्ष यह वैधानिक रूप से मान्य हो। ऐसा इसलिए आवश्यक है ताकि भारतीय शिक्षा बोर्ड के माध्यम से पढ़े हुए छात्रों को आवश्यकता पड़ने पर अन्य बोर्ड से मान्यता प्राप्त विद्यालयों में प्रवेश हो सके, साथ ही विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक सत्र में प्रवेश की अर्हता हो जाए, भारत सरकार एवं राज्य सरकारों की नौकरियों के लिए भारतीय शिक्षा बोर्ड के मूल्यांकन प्रमाण-पत्र को वैधानिकता मिले। इसके लिए भारत सरकार ने समस्त बोर्ड के मानकीकरण और पारस्परिक समकक्षता के लिए एआइयू (एसोसिएशन आफ इंडियन यूनिवर्सिटीज) को कतिपय निर्देशों के साथ अधिकृत किया।

पाश्चात्य सभ्यता को बेहतर मानने की प्रवृत्ति

जहां तक सवाल मैकाले की शिक्षा पद्धति का है तो इसे प्रतिपादित करने का उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी एवं ब्रिटिश राज्य के लिए ऐसे युवाओं को तैयार करना था जो ब्यूरोक्रेसी और उनकी सेना के लिए उपलब्ध हो सकें। इसके लिए उन्होंने ऐसी शिक्षा पद्धति लागू की, ताकि भारत के युवाओं के भीतर भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना समाहित हो जाए और वे यह समझने लगें कि पाश्चात्य दर्शन हमारी भारतीय संस्कृति से कई गुना बेहतर है। इस प्रकार आत्मगौरव के भाव पर चोट किया गया और पाश्चात्य सभ्यता को बेहतर मानने की प्रवृत्ति को विकसित किया गया। इसके पीछे यह भाव निहित था कि जो समाज और राष्ट्र अपने संस्कृति की विरासत को हीन समझने लगे, उसे उपनिवेश के रूप में बनाए रखना सुविधाजनक होगा। इसके माध्यम से सनातन, बौद्ध, जैन एवं सिख के मध्य दरार पैदा करने का प्रयास किया गया। इसके पीछे मैकाले और उनके सहयोगियों का यह सोच रहा कि यदि भारत कभी राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो भी जाए तो सांस्कृतिक रूप से अखंड भारत न बन सके। इस शिक्षण पद्धति के आधार पर बहुत सारे दृष्टांत और उसका प्रभाव अखंडता में बाधक होते हुए दिखाई पड़ते हैं।

भारतीय शिक्षा बोर्ड इसका उपचार करने का सशक्त साधन है। हमारे पाठ्यपुस्तक, हमारी शिक्षण पद्धति, शिक्षणेत्तर गतिविधियां एवं मूल्यांकन पद्धति इस प्रकार होगी कि प्रत्येक विद्यार्थी का विकास अखंड भारतबोध के साथ होगा। वह आधुनिक विज्ञान में भी निष्णात हो, वैश्विक स्तर पर नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता से युक्त हो, परंतु उसकी नाभि भारत की सांस्कृतिक आत्मा से आप्लावित हो। उसे भारत की सांस्कृतिक एकत्व का सही ज्ञान हो एवं यदि संस्कृति के मूल सिद्धांत से उसके व्यवहार में विकृति आई हो तो उसके परिष्करण का भी सामर्थ्य हो।

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