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"रिश्तों का मर्म"

कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

लोग भले ले लें बदला पर, हम न कभी ले पाएंगे।
दिल के अंदर द्वेष नहीं है, यह जग को दिखलाएंगे।1
गैर समझ कर भले बिखेरें, कितने काँटे राहों में,
शूल भले हमको मिलते हों, फूल सदा दे जाएंगे।2
मोड़ लिया मुख अच्छाई से, इसमें उनका दोष नहीं,
खुद वो भटकेंगे नित बीहड़ में, सँग जग को भटकाएंगे।3
सही तरीका जीने का यह, हाथ पकड़ कर सदा चलें,
जो भी उलझन सम्मुख आये, हम मिलकर सुलझाएंगे।4
टीस-पीर मन को दे पीड़ा, दूर अगर होते अपने,
नेह भरा मलहम हौले से, जख्मों पर सहालएंगे।5
बोझ नहीं होते हैं रिश्ते, इनसे दूर नहीं होते,
भूले से यदि बिखर गए ये, पुनः इकट्ठा लाएंगे।6
जीवन का यह मर्म अनूठा, एकाकीपन घातक है,
संबंधों को नित्य सुवासित, मिलकर करते जाएंगे।

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