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जीवन का बिगड़ता पर्यावरण

पायल कटियार

जीवन का पूरा जीवन, पर्यावरण को बचाने के लिए निकल गया था। असल में उसका पर्यावरण से मोह यूं ही नहीं था। गांव में जन्मे जीवन ने बचपन से अब तक पर्यावरण को बिगड़ते ही देखा था। उसके ऑफिस में जब भी कोई मीटिंग होती, तो वह इस पर अपनी चिंता जरूर व्यक्त करता था। आज भी वह एक मीटिंग में इसी चर्चा पर बात करके घर वापस लौटा, तो गर्मी से उसका सर चकराने लगा। घर पहुंचते हुए उसने कमरे में देखा उसकी बेटी अपने मोबाइल में मस्त थी। वह भी उसके पास में ही जाकर सोफे पर बैठते हुए बोला-ओह! टेंपरेचर दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है। माथे पर शिकन के साथ लंबी सांस लेते हुए जीवन ने कहा- आने वाले समय में क्या होगा?  हमें क्या होगा? हम तो एसी में बैठे हुए हैं न पापा, कहते हुए जीवन की बेटी नताशा ने हॉल में लगे दूसरे एसी को भी ऑन कर दिया। नताशा की इस बात को सुनकर जीवन को न सिर्फ आश्चर्य हुआ, बल्कि गुस्सा भी आ रहा था। मगर अपने गुस्से को कंट्रोल में करते हुए वह अपने कमरे में चला गया। 
जीवन वन विभाग में उच्च पद पर अधिकारी था। जीवन की पत्नी एक सरकारी स्कूल में प्रधानाचार्य थीं। दोनों के बीच एक ही संतान थी नताशा। घर में पैसे की कोई कमी न थी, शायद इसलिए ही नताशा को दुनियां में क्या हो रहा है? क्या नहीं हो रहा है, इन बातों से कोई लेना देना न था। सुबह से शाम तक वह अपनी ही दुनियां में मस्त रहती थी। जीवन के घर के सामने एक बड़ा सा खूबसूरत सा गार्डन था। गार्डन में खूब सारे पेड़-पौधे हरी-भरी घास के बीचों बीच एक सुंदर सा आर्टिफिशियल झरना था। घर का नजारा इस बात की गवाही दे रहा था की जीवन को प्रकृति के करीब रहना अच्छा लगता है। शायद यही वजह थी कि उसने इस प्रोफेशन को चुना और आज वन विभाग में अधिकारी बन पाया। जीवन को देहरादून में रहते हुए एक लंबा अरसा बीतने को आया था। उसे याद है जब वह पहली बार गांव से आया था तब की गर्मी और अब की गर्मी में बहुत अंतर आ चुका है। हर साल बढ़ती गर्मी से शहर की जनता परेशान हो रही थी वहीं मजदूर वर्ग का जीवन तो पूरी तरह से अस्तव्यस्त हो चुका था। मगर इस पर्यावरण के बिगड़ने के लिए वह किसे दोषी ठहराए? क्योंकि इसके लिए किसी एक को दोष देना गलत होगा। अपने विचारों में खोते हुए जीवन कब एसी की ठंडक में सो गया उसे कुछ पता ही न चला।
जीवन अभी गहरी नींद में सो ही रहा था तभी उसे लगा जैसे किसी ने आवाज दी मुझे बहुत तेज प्यास लग रही है क्या पानी मिलेगा? जीवन ने देखा कि उसके जंगल में लकड़ी एकत्र कर रहा मजदूर बेहोशी की हालत में उससे पानी मांग रहा है। वह उसे पानी पिलाने के लिए दौड़कर अपनी वन विभाग की गाड़ी पर पहुंचा और उसने पानी की बोतल निकाली तो पता चला कि उसमें पानी ही न था। जीवन को याद आया कि पास में ही एक तालाब है वह दौड़ा-दौड़ा उस तालाब पर पहुंचा तो वहां पर भी पानी के नाम पर सिर्फ कीचड़ ही मिली। तालाब पूरा सूख चुका था। हताश होता हुआ वह वापस इस उम्मीद से लौटा कि वह जल्दी से उस युवक को अपनी जीप से लेकर पास के गांव में ले जाएगा ताकि उसके लिए पानी की व्यवस्था हो सके। 
जीवन दौड़ता हुआ जैसे ही युवक के पास पहुंचा, तो उसने देखा कि युवक की आंखें और मुंह खुला था मगर सांसे बंद हो चुकी थीं। जीवन समझ गया कि गर्मी ने मजदूर की जान ले ली है। मजदूर को देखकर जीवन की चीख निकल पड़ी। चीख सुनकर नताशा दौड़कर अपने पिता के पास पहुंची और हिला-हिलाकर पूछने लगी क्या हुआ पापा? जीवन की आंखें खुली तो देखा कि वह किसी जंगल में नहीं बल्कि अपने ही घर के हॉल के सोफे पर बैठे-बैठे सो गया था और यह सब एक सपना देख रहा था। जीवन का मन व्यथित हो गया और दूसरे दिन ही उसने तुरंत अपनी टिकट बुक करवाई और अपनी बेटी के साथ अपने गांव चल पड़ा। नताशा मना करती रही कि पापा बहुत गर्मी है ऐसे में गांव में वह नहीं रह सकती मगर जीवन ने उसकी एक न सुनी। 
इधर जीवन ने गांव पहुंचने से पहले ही अपने गांव आने की सूचना अपने छोटे भाई आकाश को दे दी थी। इसलिए आकाश उसे लेने निर्धारित समय से पहले ही पहुंच चुका था। 
गांव के छोटे स्टेशन पर ट्रेन कम समय के लिए ही रूकती है इसलिए जीवन ट्रेन रूकने से पहले ही गेट तक अपने सामान के साथ बेटी को लेकर आ गया। जैसे ही ट्रेन गांव के स्टेशन पर रूकी तो उसके भाई आकाश ने उसे देख लिया और दौड़ता हुआ आया और सारा समान उतरवाने में जीवन की मदद करने लगा। सामान उतरने के बाद नताशा ने जैसे ही स्टेशन पर कदम रखा उसने महसूस किया कि यहां तो उसकी सोच से भी ज्यादा गर्मी है। इधर आकाश ने अपने बड़े भाई के पैर छुए और सारा सामान अपने कंधे पर लादा और स्टेशन से बाहर की ओर चल पड़ा। जीवन और नताशा भी उसके पीछे-पीछे चल पड़े।
स्टेशन से बाहर आकर आकाश ने अपनी जीप में सारा सामान रखा और जीवन व नताशा को भी जीप में बैठने का इशारा किया। जीप चल पड़ी तो नताशा गर्म हवा से परेशान हो उठी। उसने पूछा चाचा जी इसमें एसी क्यों नहीं लगवाया है? आकाश ने कहा -एसी से पर्यावरण को नुकसान होता है। फिर हमें तो बिना एसी के ही रहने की आदत है। चाचा भतीजी की बातों के बीच में ही जीवन ने कहा तुम्हें पता है नताशा एसी से निकलने वाली गैस से पर्यावरण को कितना नुकसान होता है? नताशा ने मुंह बनाते हुए कहा- मगर मैं बिना एसी के एक पल नहीं रख सकती हूं। जीवन और आकाश एक दूसरे का मुंह देखने लगे मगर बिना कुछ बोले ही चुपचाप गाड़ी में चलते रहे। इधर नताशा ने देखाकि खेतों में किसान काम कर रहे हैं। उनके साथ उनके बीबी बच्चे भी लगे हुए हैं। वहीं कुछ छोटे बच्चों को उनकी माओं ने दो पेड़ के बीच अपनी साड़ी से एक झूला सा बनाकर उसपर लिटाया हुआ है। एक आठ दस साल का बच्चा उसे झुला रहा है। यह सारा नजारा देखकर नताशा को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतनी गर्मी में यह लोग कैसे रह लेते हैं? मगर वह चुपचाप यह सब देखती रही। 
घर पहुंची तो उनकी जीप के आगे पीछे लोगों की ऐसी भीड़ लग गई मानो गांव में कोई सेलीब्रेटी आया हुआ हो।
नताशा को भीड़ देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। भीड़ में हर उम्र के लोग शामिल थे। गांव के छोटे बच्चे नताशा को देखकर हंस रहे थे मगर किस बात पर पता नहीं। बुजुर्ग कह रहे थे बिटिया कितनी बड़ी हो गई है। हां चाचा कहते हुए जीवन ने उन सभी के पैर छुए। कुछ लोगों ने उसके पिता के पैर छुए। सभी ने राम-राम की तो सभी के राम-राम का जबाव उसके पिता ने भी राम राम से ही दिया। जीवन का बदला रूप देखकर नताशा को बढ़ा आश्चर्य हो रहा था। गांव पहुंचकर जीवन की भाषा शैली पूरी तरह से बदल चुकी थी। वह गांव वालों के साथ ऐसे घुल मिल गए लग ही न रहा था कि उसके पिता इतने बड़े अधिकारी हैं। मगर वह चुपचाप देख रही थी। वह बिना कुछ बोले जीप से उतरी और अपने चाचा के साथ घर के अंदर चली गई। अंदर दादी उसका पहले से खड़ी इंतजार ही कर रहीं थीं। नताशा के आते ही उन्होंने उसके सर पर हाथ फेरा और आदेश दिया बिटिया के लिए पानी ले आओ। नताशा ने भी दादी को नमस्ते की और उनके पास जाकर बैठ गई।
इधर अंदर से मुस्कराते हुए उसकी चाची अपने हाथ में पानी और घर के बने पेड़े ले आईं। पेड़े देखकर नताशा ने कहा चाची मैं मीठा नहीं खाती।
चाची आश्चर्य से कहा- क्यों? क्या हुआ ? अरे इस उम्र में मीठा नुकसान नहीं करता है। दोनों की बात सुनकर दादी भी बोल पड़ीं-
घर के बने हैं बाजार के मिलावटी नहीं हैं, खा लो कुछ नहीं होगा। 
नताशा को गर्मी लग रही थी सो उसने दो गिलास पानी पिया और दादी की बात रखने के लिए एक पेड़ा मुंह में रख लिया। मगर उसने उस एक पेड़े को भी पानी के सहारे से बड़ी मुश्किल से खाया। इतना ज्यादा मीठा कोई कैसे खा सकता है सोचते हुए उसने मुंह बना लिया। दादी उसके चेहरे के हावभाव देखकर समझ गईं, इसलिए उन्होंने उसे दोबारा पेड़ा लेने को न कहा। 
घर में कोई एसी नहीं था बस कूलर चल रहा था वह भी बीच-बीच में गर्म हवा ही फेंक रहा था। मगर नताशा को थकान की वजह से नींद आ रही थी इसलिए वह वहीं लेट गई। लेटे ही उसकी आंख भी लग गई।
शाम को जब आंख खुली तो उसने बाहर आकर आंगन में आकर देखा कि उसके चाचा बहुत सारे आम लेकर आए हैं जिन्हें ठंडा करने के लिए उन्होंने पानी भरी बाल्टी में डाला हुआ था। 
नताशा ने आम देखकर अपनी दादी से कहा- मैं तो सिर्फ मैंगो शेक लेती हूं वह भी कभी कभी। 
नताशा की बातें सुनकर चाची ने कहा कि-अरे इस तरह से आमों को खाकर तो देखो बहुत मीठे हैं। आखिरकार नताशा ने सभी की बातों को मानते हुए खाया तो सिर्फ एक आम। उसके बाद अपने पिता के साथ गांव घूमने के लिए चल दी। जीवन ने उसे बताया कि गांव अब पहले से काफी बदल चुका है। पहले गांव में चारों ओर जंगल था। गांव वालों का मुख्य व्यवसाय खेती और पशुपालन ही था। मगर अब गांव के अधिकांश लोग शहर की ओर चले गए हैं। जैसे कि वह स्वयं भी कई सालों पहले गांव से निकल गया था। साल में सिर्फ एक बार आता और जब भी आता तो उसे गांव में कुछ न कुछ बदला हुआ ही मिलता। गांव में जहां पहले आठ से दस तालाब होते थे अब सिर्फ एक ही बचा था। बेचारे पशुओं के पीने के लिए पानी की कमी हो चुकी थी। आवारा पशुओं को पानी न मिल पाने की वजह से वह अग्रेसिव हो रहे थे। चारों ओर जंगल थे। पशुओं के चरने के लिए सैकड़ों मील तक खाली जमीन पड़ी थी जिसमें उगी हरी-हरी घास को आवारा पशु चरा करते थे लेकिन जब से वह जमीन समाप्त हो गई है तो आवारा पशुओं ने खेती को उजाड़ना शुरू कर दिया है। किसानों आवारा पशुओं से खेतों को बचाने के लिए चारों ओर कटीली झाड़ियां लगाई मगर वह भी कारगर साबित नहीं हुई। पहले गांव में इतने कुएं थे कि कोई भी राहगीर प्यासा नहीं मरता था। मगर कुएं सूख गए उसके बाद हैंडपंप लगवाए गए वह भी कुछ दिनों बाद बेकार साबित होने लगे। अब अधिकांश घरो में सबमर्सिबल पंप लगे हुए हैं। लेकिन गरीब लोग जमीदारों की दया दृष्टि पर ही पीने के पानी की व्यवस्था करने के लिए मजबूर हैं। 
जीवन ने नताशा की आंखों में झांकते हुए बोलना जारी रखा- मगर हमें क्या हमारे पास तो हर सुविधा है। 
दोनों पूरा गांव घूमते हुए घर की ओर वापस लौटने लगे। अंधेरा बढ़ने लगा था। गांव में जंगली जानवरों का डर बढ़ गया था इसलिए गांव के सभी लोग समय से पहले ही अपने-अपने घरों में कैद हो जाते थे। 
पिता के साथ गांव घूमकर घर पहुंची नताशा ने देखा उसकी चाची खुले आंगन में बने चूल्हे पर रोटियां बना रहीं थीं। दादी आंगन में पड़ी चारपाई पर बैठी थीं। नताशा को देखकर दादी ने चाची से कहा कि बिटिया आ गई है चलो अब खाना लगा दो। गरम-गरम रोटी खाएगी तो दो ज्यादा ही खा लेगी। दादी की बात सुनकर नताशा और जीवन एक दूसरे को देखने लगे। असल में नताशा एक या दो से ज्यादा आज तक रोटी न खा सकी थी उस पर ज्यादा का तो सवाल ही नहीं होता। लेकिन जब खाना लगा तो नताशा ने सच में आज दो रोटी कब खा लीं उसे पता ही न लगा। घर के बने घी से सादा खाने में भी इतना ज्यादा स्वाद हो सकता है इसका उसे अंदाजा न था। 
दादी ने उसे एक और दी तो वह इंकार न कर सकी। जीवन व नताशा आज पहली बार गांव में एक साथ खाना खा रहे थे। शहर की भागदौड़ वाली जिंदगी ने दोनों को कब का अलग कर दिया था उन्हें पता ही न चला। इससे पहले कब एक साथ खाना खाया होगा इसका उसे अंदाजा ही न था। खाना खाने के बाद नताशा अपनी चाची के बच्चों के साथ छत पर चली गई। छत पर जाकर उसने देखा कि गांव का जो सीन उसके पापा ने बताया था अब गांव वैसा नहीं रहा था। न ही कच्चे मकान थे व झोपड़ियां थीं न ही गांव के चारों ओर हरे भरे बाग बचे थे। जंगल तो पूरी तरह समाप्त ही हो चुके थे। तालाब सारे सूख चुके थे। गांव के बच्चे अब किसी पेड़पर चढ़कर न आम तोड़ते थे न ही जामुन के पेड़ दिख रहे थे। उसके पापा के समय का गांव अब पूरी तरह से बदल चुका था। वह चारों ओर निहार ही रही थी तभी उसके चाचा और पापा भी छत पर आ चुके थे। पापा ने अपने छोटे भाई से पूछा कि गांव में इतना बदलाव इतनी जल्दी कैसे आ गया?
आकाश ने अपने भाई की बात का जबाव देते हुए कहा- आसपास कई बड़े प्लांट लगाने के चलते सारी चरवाहे की जमीन को सरकार ने बेच दिया। गर्मी इतनी ज्यादा हो गई है कि अब कब किस पके खड़े खेतों में आग लग जाए कुछ पता नहीं। मगर चाचा सरकार मुआवजा भी तो देती है न नताशा ने पूछा? नताशा की बात सुनकर आकाश ने कहा- हां देती है न, जितना देती है उससे ज्यादा मजदूर के पैसे खर्च हो जाते हैं उसे पाने के लिए, दलालों की भेंट चढ जाते हैं, उसे कुछ नहीं मिलता नताशा, चाचा ने जबाव दिया। 
आकाश बोलना जारी रखते हुए- जंगल में आए दिन आग सिर्फ इसलिए लग जाती है क्योंकि उसका चौकीदार और वन विभाग के अधिकारी मिलकर सारी कीमती लकड़ियां काटकर बेच देते हैं अब अपने बचाव के लिए वह आग का सहारा लेते हैं। 
क्या? नताशा ने आश्चर्य से पूछा।
आकाश- हां बेटा आग कोई दुर्घटना नहीं बल्कि जानबूछ कर लगाई जाती है ताकि चोरी से कटे पेड़ों का पता न लग सके। आज हम अपने चंद फायदे के लिए पेड़ों को नष्ट करते जा रहे हैं मगर कोई इसपर ध्यान नहीं दे रहा है। पहले एक किताबों का सैट हमारे पूरे खानदान की पढ़ाई के लिए काफी होता था मगर अब स्कूल में हर साल सिलेबस चेंज कर देते हैं ताकि किताबों का बाजार गर्म हो सके। किताबे भी तो पेड़काटकर ही बनती हैं। मगर इससे न लोगों को मतलब न सरकार कोई रोक लगाती है। नेता और अधिकारी एसी में बैठकर पर्यावरण दिवस पर एक दिन लैक्चर देते हैं उसके बाद एक साल तक भूल जाते हैं पर्यावरण को। तुम्ही बताओ कि आज कितने घरों में वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगा है? प्राकृतिक तालाब पोखर हमने समाप्त कर दिए हैं। किसान भी सोचता है कि हम क्यों मरे खेती में? इसलिए वह भी प्लाट काटकर ज्यादा कमाई में लग गया है। शहर में जो पार्क बनाए भी गए हैं वहां पर धर्म की आड़ में मंदिर मस्जिद की भेट चढ गए हैं। उनसे धर्म के ठेकेदारों के पेट पल रहे हैं मगर ऑक्सीजन और पर्यावरण की किसको चिंता है? चाचा बोले जा रहे थे और नताशा चुपचाप सुने जा रही थी। 
रात को सभी सो चुके थे मगर नताशा जाग रही थी। ऐसा नहीं था कि नताशा को गर्मी लग रही थी। 
हॉल में तेज स्पीड से कूलर चल रहा था। सभी चादर ओढकर आराम से सो रहे थे मगर नताशा की आंखों में दूर-दूर तक नींद नजर नहीं आ रही थी। वह समझ चुकी थी कि उसके पापा उसे गांव किस उद्देश्य से लेकर आए हैं। उसने निश्चय किया कि अब पर्यावरण को बचाने की लड़ाई पापा का पूरा सहयोग करेगी। जीवन के बिगड़े पर्यावरण को सुधारने का प्रयास जरूर करेंगी।

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