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सबक देकर गया ये चुनाव, जनता से जुड़ने और निचले स्तर पर भ्रष्टाचार रोकने जरूरत

पूरन डावर

2024 का आम चुनाव का परिणाम अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है और सबको सबक देकर गया है, कोई भी अपरिहार्य नहीं है, किसी को यह गुमान नहीं होना चाहिये कि वे बदले नहीं जा सकते।
राष्ट्रहित के मुद्दे, देश की भौगोलिक सीमाओं की रक्षा महत्वपूर्ण है, कश्मीर का मुद्दा महत्वपूर्ण है, देश में जो विस्थापित लंबे समय से रह रहे हैं उनकी नागरिकता भी महत्वपूर्ण है, राजनीतिक भ्रष्टाचार का उन्मूलन महत्वपूर्ण है, देश में समान नागरिकता कानून महत्वपूर्ण है। जनसंख्या पर नियंत्रण महत्वपूर्ण है। रोज-रोज के चुनाव से भी मुक्ति चाहिए, एक देश एक चुनाव महत्वपूर्ण मुद्दा है। देश की अस्मिता पर जो समय समय पर चोट लगी देश की संस्कृति आहत हुई उसे वापस लाना भी महत्वपूर्ण है। मोदी सरकार कहें, भाजपा सरकार कहें या फिर एनडीए सरकार इन विषयों को बखूबी देख रही है। दिशा ठीक थी शुरुआत शौचालयों और स्वच्छता से हुई, लेकिन कहीं न कहीं भटक गयी। 

देश की अर्थव्यवस्था भले ही पांचवें स्थान पर पहुँच गई हो, लेकिन जनसंख्या के अनुपात में देखें या प्रति व्यक्ति आय (पर कैपिटा इनकम) देश अभी भी बहुत पीछे है, आम जनों की बुनियादी समस्याओं में त्वरित सुधार आवश्यक है। हालाँकि भोजन सुरक्षा मिली है। राशन मिल रहा है। घरों में बिजली, गैस गांवों तक पहुँच रही है। गरीबों के पक्के मकानों पर भी ध्यान है, स्वच्छता पर जनता जाग्रत हो रही है।
सरकार को समीक्षा करनी होगी कि जो आँकड़े रखे जा रहे हैं, वे आँकड़े धरातल पर कितने सही हैं। जब हम दो सौ करोड़ से ऊपर वैक्सिनेशन की जानकारी या सर्टिफिकेट एक क्लिक पर ले लेते हैं तो इन योजनाओं के प्रतिफल की न केवल जानकारी बल्कि पक्के मकानों की लिस्ट फोटो सहित उपलब्ध हो सकती है। सर्विलांस के ज़रिये उनकी देखरेख जानी जा सकती है।
शिक्षा नीति में परिवर्तन तो हुआ लेकिन धरातल पर अभी एक कदम भी नहीं बढ़ा, सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी की है। अभी तक के 75 सालों में केवल विलायती बबूल के पेड़ लगे हैं तो उन पर आम तो लगने वाले थे नहीं। उनके हुनर छीन कर पेपर की डिग्री पकड़ा दी गई। सरकारी नौकरियों में असीमिति भ्रष्टाचार और पैसे ने सारे युवाओं का एक मात्र लक्ष्य बना दिया कि सरकारी नौकरी के लिए किसी तरह डिग्री लो सरकारी नौकरी की न्यूनतम या अधिकतम अहर्ता हासिल करो और जुट जाओ नौकरियों की जुगाड़ में। सरकारी, अर्द्ध सरकारी, बैंकिंग सब मिलाकर मात्र 7% नौकरियाँ हैं बाक़ी 93% के हाथ निराशा है। आवश्यकता उद्यमशीलता की है। पूरे देश को स्किल करने की है। शिक्षा नीति में अनिवार्य रूप से एक ज़िला एक उत्पाद की शिक्षा होनी ही चाहिए। या कम से कम मेक इन इंडिया के फोकस उत्पादों को बेसिक शिक्षा के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है।

सबसे बड़ी समस्या है सरकार भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाना चाहती है ऊपर के स्तर पर भ्रष्टाचार निश्चित कम हुआ है सरकार पर किसी बड़े घोटाले  के आरोप नहीं लगे हैं लेकिन धरातल पर सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्री तो दूर पदाधिकारियों के आचरण में भी अंतर नहीं लगता। कदम कदम पर भ्रष्टाचार है। आम आदमी की पहुँच या ज़रूरत पंचायत, तहसील, निगम, विकास प्राधिकरणों तक है। इनके भ्रष्टाचार में क़तई राहत नहीं है। हो भी कैसे जब पंचायत सदस्यों से लेकर पार्षदों तक की टिकटें बेची जाती हों। ऐसे कृत्यों ने सरकार के सारे बड़े कार्यों को धोया है और तेजी से मोदी सरकार के भ्रष्टाचार मुक्त वातावरण को पलीता लग रहा है, क्योंकि जब आम आदमी को राहत नहीं है तो ऊपर यदि झूठे भी आरोप लगें तो आम आदमी उसे भी सत्य मानने लगेगा। नगर निगम हों या प्राधिकरण, कार्यशैली में केवल पेपर पर अंतर, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही है। कुछ ने सीख लिया है कि पोर्टल पर आँकड़े डालकर कैसे रेटिंग बनायी जा सकती है, ऐसे ही अनेक सड़क छाप नेता सोशल मीडिया पर फोटो डाल कर और नमो पोर्टल पर डाल कर अपने को दर्शाने में सफल हो जाते हैं जबकि उनका धरातल पर कोई बेस नहीं होता है।
अपने प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं और प्रतिभाओं को दरकिनार कर दूसरे दलों के भ्रष्ट दागी यहाँ ताकि के रेप में आरोपियों को शामिल करना और विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा में पहुँचाना, भाजपा के आचरण पर सबसे बड़ा आघात है। जब उनके कारनामे उजागर होते हैं तो आरोप सीधे भाजपा पर आता है और भाजपा की स्वच्छ और भ्रष्टाचारमुक्त राजनीति पर सीधा तमाचा लगता है। महाराष्ट्र की राजनीति में तो सारी हदें पार कर दी गईं और नतीजा सामने है।

जब कोई छोटा उद्योग बिना पॉवर डेलीगेशन के नहीं बढ़ सकता या नहीं चल सकता तो विश्व का सबसे बड़ा देश बिना डेलीगेशन के कैसे चल सकता है राज्यों के नेतृत्व की अपनी भूमिका है। स्थानीय लोकप्रियता, स्थानीय मुद्दे राज्य में वर्षों के त्याग से नेतृत्व खड़ा होता है, उसे पंगु बनाना बुद्धिमत्ता नहीं कहा जा सकता। न उस नेतृत्व को दरकिनार किसी भी कठपुतली को दिया जा सकता है।
अहम... हम अपरिहार्य हैं, हम चुनाव जीतना जानते हैं, हमारे पास पन्ना प्रमुख हैं, हमारे पास कार्यकर्ताओं की फौज है, यहाँ तक कि संघ शक्ति भी निरर्थक हो जाती है। जब अहम चरम पर होता है तो किशोरी लाल शर्मा जैसा छोटे से छोटा कार्यकर्ता भी स्मृति ईरानी जैसी प्रतिभाओं को भी परास्त कर सकता है।
2024 के परिणाम इसी ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि यदि समय रहते कार्यशैली में सुधार नहीं आया तो न वैश्विक इमेज काम आएगी, न बड़े-बड़े कार्य। पहले छोटे-छोटे कार्य देश में आम आदमी की दशा बदलना, गाँवों और शहरों की सूरत बदलना, हवाई अड्डे बाद में पहले बस अड्डों को पूर्ण सुविधायुक्त बनाने जैसे कार्यों की जरूरत है। देश की आम जनता हवाई अड्डों पर नहीं रेल और बसों में चलती है। रेलवे में निश्चित बड़े सुधार हुए हैं लेकिन बस अड्डे निजी क्षेत्र में देकर पहले ही टर्म में ही बदले जा सकते थे। साबरमती वाटर फ्रंट खूब प्रचारित किया गया। पांच साल में हर शहर जो नदी के किनारे हैं सब पर वाटर फ्रंट बन सकता है मात्र एक वाटर फ्रंट पर 30 से अधिकतम 100 करोड़ और इसके लिए धन जुटाने की आवश्यकता नहीं, बल्कि सरकार धन बना सकती है और नदियाँ भी स्वतः साफ़ हो सकती हैं। यह सब पीपीपी पर आसानी से संभव है।

स्मार्ट सिटी की योजना जितनी भटकी है शायद और कोई योजना इतनी नहीं भटकती, एक स्ववित्तपोषी शहर, सेल्फ सस्टेनेबल, ग्रीन पॉवर से लेकर कूड़ा प्रबंधन पर्यावरण की दृष्टि से उत्कृष्ट स्मार्ट सिटी की परिभाषा..  काश! सार्थक होती लेकिन उसी भ्रष्टाचार की भेंट।

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