
भारतीय ज्ञान परम्परा को यदि एक जीवंत, प्रवहमान और बहुस्तरीय चेतना के रूप में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इसका निर्माण केवल वेदों, उपनिषदों, पुराणों या दर्शनों तक सीमित नहीं है। भारतीय बौद्धिक इतिहास की आत्मा उस समग्र दृष्टि में निहित है, जिसमें तर्क, अनुभव, करुणा, नैतिकता और मानव-मूल्यों का संतुलित समन्वय दिखाई देता है। इसी संदर्भ में बौद्ध दर्शन भारतीय ज्ञान परम्परा का केवल एक अंग नहीं, बल्कि उसकी आत्मा के रूप में उपस्थित है। बौद्ध दर्शन ने भारतीय चिंतन को न केवल नई दिशा दी, बल्कि उसे आत्मालोचन, वैज्ञानिकता, सामाजिक नैतिकता और करुणा की कसौटी पर कसने का साहस भी प्रदान किया। यदि भारतीय ज्ञान परम्परा से बौद्ध दर्शन को अलग कर दिया जाए, तो यह परम्परा आधी-अधूरी, एकांगी और अभिजात्य बनकर रह जाएगी।
बौद्ध दर्शन का उद्भव उस ऐतिहासिक क्षण में हुआ, जब वैदिक कर्मकांड, यज्ञ-बलि, वर्ण-व्यवस्था और ब्राह्मणवादी वर्चस्व अपने चरम पर था। समाज में ज्ञान कुछ विशिष्ट वर्गों तक सीमित था और आम जनमानस के दुःख, शोषण और असमानता को धार्मिक वैधता प्रदान की जा रही थी। ऐसे समय में तथागत गौतम बुद्ध ने न तो किसी ईश्वर की सत्ता को केंद्र में रखा, न ही आत्मा, ब्रह्म या सृष्टि की उत्पत्ति जैसे दार्शनिक प्रश्नों में उलझने को आवश्यक समझा। उन्होंने प्रत्यक्ष मानव दुःख को अपने दर्शन का केंद्र बनाया। यही बौद्ध दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह अमूर्त आध्यात्मिकता के बजाय जीवन की यथार्थ स्थितियों से संवाद करता है। दुःख, उसका कारण, उसका निरोध और उसके निरोध का मार्ग—ये चार आर्य सत्य भारतीय ज्ञान परम्परा को पहली बार जीवन-केंद्रित, मानव-केंद्रित और व्यवहारिक दृष्टि प्रदान करते हैं।
भारतीय दर्शन की परम्परा में बौद्ध दर्शन ने तर्क और अनुभव को सर्वोच्च स्थान दिया। बुद्ध ने अंधविश्वास, श्रुति-प्रामाण्य और परंपरागत सत्ता को स्वीकार करने से पहले विवेक की कसौटी पर कसने का आग्रह किया। कालाम सूत्र में बुद्ध का यह कथन कि किसी बात को केवल इसलिए सत्य न मानो कि वह शास्त्र में लिखी है, परंपरा से चली आ रही है या किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति ने कही है—भारतीय ज्ञान परम्परा में बौद्धिक स्वतंत्रता की घोषणा है। यह दृष्टि आगे चलकर न्याय, वैशेषिक और यहां तक कि वेदान्त के विकास को भी प्रभावित करती है। बौद्ध दर्शन के बिना भारतीय ज्ञान परम्परा आलोचनात्मक विवेक और तर्कशीलता के उस स्तर तक नहीं पहुँच पाती, जिसे आज हम उसकी विशिष्ट पहचान मानते हैं।
बौद्ध दर्शन ने भारतीय ज्ञान परम्परा को नैतिक आधार प्रदान किया। शील, प्रज्ञा और करुणा—ये तीन स्तंभ केवल बौद्ध संघ की आचार-संहिता नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे सामाजिक दर्शन की नींव हैं, जिसमें व्यक्ति और समाज दोनों का कल्याण निहित है। अहिंसा, मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा जैसे भाव केवल व्यक्तिगत साधना के विषय नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता के उपकरण हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा में करुणा को दार्शनिक मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय बौद्ध दर्शन को जाता है। वेदांत या सांख्य जहाँ मुक्ति को व्यक्तिगत आत्म-कल्याण के रूप में देखते हैं, वहीं बौद्ध दर्शन निर्वाण को समस्त प्राणियों के दुःख-निरोध से जोड़ता है। महायान परम्परा में बोधिसत्व की अवधारणा इस सामूहिक मुक्ति की भावना का चरम रूप है।
ज्ञान की लोकतांत्रिकता भारतीय ज्ञान परम्परा में बौद्ध दर्शन का एक और अमूल्य योगदान है। बुद्ध ने ज्ञान को किसी जाति, वर्ण, लिंग या वर्ग तक सीमित नहीं रखा। संघ के द्वार शूद्रों, स्त्रियों, दासों और समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के लिए खुले थे। यह भारतीय बौद्धिक इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम था। बौद्ध दर्शन ने यह स्थापित किया कि मनुष्य का मूल्य उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म और चेतना से निर्धारित होता है। यह विचार आगे चलकर भक्ति आंदोलन, संत परम्परा और आधुनिक सामाजिक न्याय की अवधारणाओं की प्रेरणा बनता है। यदि बौद्ध दर्शन न होता, तो भारतीय ज्ञान परम्परा में सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा की अवधारणा इतनी सशक्त रूप में विकसित नहीं हो पाती।
दार्शनिक दृष्टि से बौद्ध दर्शन ने भारतीय ज्ञान परम्परा को अनात्मवाद, क्षणिकवाद और प्रतीत्यसमुत्पाद जैसी मौलिक अवधारणाएँ दीं। आत्मा के स्थायी, नित्य और स्वतंत्र अस्तित्व को नकारते हुए बुद्ध ने यह दिखाया कि व्यक्ति पंचस्कंधों का एक अस्थायी समुच्चय है। यह विचार न केवल आध्यात्मिक अहंकार को तोड़ता है, बल्कि मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का मार्ग भी प्रशस्त करता है। प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत—कि सभी वस्तुएँ कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर हैं—भारतीय ज्ञान परम्परा को गहन दार्शनिक वैज्ञानिकता प्रदान करता है। यह सिद्धांत आज के आधुनिक विज्ञान, पारिस्थितिकी और समाजशास्त्र से भी संवाद स्थापित करता है। इस दृष्टि के बिना भारतीय ज्ञान परम्परा नियतिवाद या रहस्यवाद की ओर अधिक झुक सकती थी।
बौद्ध दर्शन ने भाषा, तर्क और संवाद की परम्परा को भी समृद्ध किया। पालि, प्राकृत और बाद में संस्कृत बौद्ध साहित्य ने ज्ञान को जनसुलभ बनाया। त्रिपिटक, अभिधम्म और बौद्ध दर्शन के विभिन्न निकायों ने भारतीय बौद्धिक परम्परा को सुव्यवस्थित और विश्लेषणात्मक रूप प्रदान किया। नागार्जुन का शून्यवाद भारतीय दर्शन की चरम बौद्धिक ऊँचाइयों में से एक है। शून्यता का अर्थ शून्य होना नहीं, बल्कि स्वभावगत सत्ता का अभाव है। यह विचार भारतीय ज्ञान परम्परा को द्वैत और अद्वैत के पार एक मध्य मार्ग प्रदान करता है। शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त भी नागार्जुन से अप्रत्यक्ष रूप से संवाद करता है। इस प्रकार बौद्ध दर्शन भारतीय दर्शन का आलोचक ही नहीं, उसका सह-निर्माता भी है।
भारतीय ज्ञान परम्परा केवल ग्रंथों और दर्शन तक सीमित नहीं रही, उसने कला, स्थापत्य, साहित्य और लोकजीवन को भी गहराई से प्रभावित किया। स्तूप, विहार, चैत्य, अजंता-एलोरा की गुफाएँ, सांची और भरहुत की शिल्पकला—ये सभी बौद्ध दर्शन की करुणा और सौंदर्यबोध के साक्ष्य हैं। जातक कथाएँ नैतिक शिक्षा का सरल और प्रभावी माध्यम बनीं। भारतीय लोकसंस्कृति में करुणा, दया और अहिंसा के जो तत्व दिखाई देते हैं, उनमें बौद्ध दर्शन की गहरी छाप है। यदि बौद्ध दर्शन को भारतीय ज्ञान परम्परा से अलग कर दिया जाए, तो यह सांस्कृतिक विरासत भी अधूरी प्रतीत होगी।
आधुनिक भारत में भी बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता भारतीय ज्ञान परम्परा को जीवंत बनाए हुए है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बौद्ध धम्म को सामाजिक न्याय, समानता और मानव गरिमा के दर्शन के रूप में पुनर्स्थापित किया। उनके लिए बौद्ध दर्शन केवल धार्मिक विकल्प नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक, नैतिक और मानवतावादी जीवन-दृष्टि था। आंबेडकर के माध्यम से बौद्ध दर्शन ने आधुनिक भारतीय ज्ञान परम्परा में लोकतंत्र, संवैधानिकता और सामाजिक समता को नैतिक आधार प्रदान किया। यह दिखाता है कि बौद्ध दर्शन कोई अतीत की वस्तु नहीं, बल्कि सतत प्रवहमान चेतना है।
अंततः यह स्पष्ट होता है कि बौद्ध दर्शन भारतीय ज्ञान परम्परा की आत्मा इसलिए है, क्योंकि उसने उसे आत्मालोचन का साहस, करुणा की संवेदना, तर्क की दृढ़ता और मानव-मूल्यों की सार्वभौमिकता प्रदान की। मानव से मानवता का दर्शन ही बौद्ध दर्शन है। मानवता ही मनुष्य के लिए प्रथमदृष्ट्या है। मानवताविहीन मनुष्य पशु समान है। भारतीय ज्ञान परम्परा में मानवता को सर्वोच्च स्थान देना ही एक सर्वश्रेष्ठ व उत्कृष्ट उदाहरण है जो विश्व के सभी ज्ञान परम्परा में श्रेष्ठ है। बौद्ध दर्शन के बिना भारतीय ज्ञान परम्परा केवल शास्त्रों का संग्रह या दार्शनिक विमर्श बनकर रह जाती, जबकि बौद्ध दर्शन ने उसे जीवन-दर्शन बनाया। दुःख से मुक्ति का मार्ग दिखाते हुए बुद्ध ने यह सिखाया कि ज्ञान का अंतिम उद्देश्य सत्ता, प्रभुत्व या मोक्ष का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मानव और मानवता का कल्याण है। यही कारण है कि बौद्ध दर्शन न केवल भारतीय ज्ञान परम्परा का एक अध्याय है, बल्कि उसकी धड़कन, उसकी चेतना और उसकी आत्मा है।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा



