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जातिवाद की वास्तविकता: ईश्वर व प्रकृति नहीं वल्कि मानवनिर्मित सामाजिक संरचना की असमानता”

डॉ प्रमोद कुमार

“जातिवाद की वास्तविकता: ईश्वर व प्रकृति नहीं बल्कि मानव-निर्मित सामाजिक संरचना की असमानता” विषय भारतीय समाज की उस जटिल संरचना को समझने का प्रयास है, जिसने सदियों से सामाजिक संबंधों, अवसरों, संसाधनों और सम्मान के वितरण को प्रभावित किया है। जातिवाद को अक्सर धार्मिक, दैवीय या प्राकृतिक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया, मानो यह ईश्वर द्वारा निर्मित कोई अपरिवर्तनीय सत्य हो। किंतु गहन ऐतिहासिक, समाजशास्त्रीय और दार्शनिक विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि जाति व्यवस्था न तो प्रकृति की देन है और न ही ईश्वर की इच्छा का परिणाम; यह मानव द्वारा निर्मित एक ऐसी सामाजिक संरचना है, जिसका निर्माण विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों, सत्ता-संबंधों और आर्थिक हितों के आधार पर हुआ।

यदि जाति वास्तव में प्राकृतिक होती, तो उसका आधार जैविक या आनुवंशिक भिन्नताओं में दिखाई देता। प्रकृति मनुष्यों के बीच रंग, कद, रूप या शारीरिक विशेषताओं में विविधता अवश्य उत्पन्न करती है, परंतु वह किसी को जन्म से श्रेष्ठ या हीन घोषित नहीं करती। आधुनिक विज्ञान ने सिद्ध किया है कि समस्त मानव जाति जैविक रूप से एक ही प्रजाति है और उनकी बौद्धिक क्षमता, नैतिकता या योग्यता जन्म से निर्धारित नहीं होती। अतः यह विचार कि कोई व्यक्ति केवल जन्म के आधार पर उच्च या निम्न है, वैज्ञानिक दृष्टि से निराधार है। यदि प्रकृति ने जाति बनाई होती, तो वह विश्व के प्रत्येक समाज में समान रूप से विद्यमान होती, किंतु जाति जैसी कठोर, जन्म-आधारित, वंशानुगत सामाजिक व्यवस्था विशिष्ट रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में विकसित हुई। इससे स्पष्ट है कि यह प्राकृतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक-सामाजिक निर्माण है।

धार्मिक आधार पर भी जाति को उचित ठहराने का प्रयास किया गया। कुछ प्राचीन ग्रंथों की व्याख्याओं के माध्यम से यह प्रचारित किया गया कि समाज का विभाजन ईश्वर की इच्छा से हुआ है। उदाहरणतः ‘पुरुष सूक्त’ की एक लोकप्रिय व्याख्या के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमशः ब्रह्मा के मुख, भुजाओं, जंघाओं और चरणों से उत्पन्न हुए। किंतु यह एक प्रतीकात्मक आख्यान है, जिसे बाद के काल में सामाजिक श्रेणीकरण को स्थायी और पवित्र स्वरूप देने के लिए उपयोग किया गया। यदि इसे शाब्दिक रूप से स्वीकार किया जाए तो यह प्रश्न उठता है कि क्या ईश्वर असमानता का पक्षधर हो सकता है? क्या वह किसी को ज्ञान का अधिकार और किसी को दासता का जीवन प्रदान करेगा? धर्म का मूल संदेश करुणा, समानता और मानव-मूल्य है, परंतु जाति व्यवस्था ने धर्म के नाम पर असमानता को संस्थागत रूप दे दिया। यही कारण है कि अनेक संतों और सुधारकों ने जातिवाद का विरोध किया।

मध्यकालीन संत परंपरा में कबीर, रैदास और गुरु नानक जैसे व्यक्तित्वों ने जन्म-आधारित श्रेष्ठता को अस्वीकार किया। आधुनिक काल में ज्योतिबा फुले ने ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना की तीखी आलोचना करते हुए शिक्षा और सामाजिक जागृति के माध्यम से शूद्रों और स्त्रियों के उत्थान का आह्वान किया। बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर ने जाति व्यवस्था को “ग्रेडेड इनइक्वैलिटी” अर्थात श्रेणीबद्ध असमानता की व्यवस्था कहा, जिसमें प्रत्येक ऊँची जाति अपने से नीचे वाली जाति को दबाती है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जाति केवल सामाजिक विभाजन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक अलगाव, आर्थिक शोषण और मानसिक गुलामी की संरचना है। यदि जाति ईश्वर-निर्मित होती, तो उसका विरोध करना ईश्वर का विरोध होता; किंतु इतिहास बताता है कि जाति का विरोध सामाजिक न्याय की दिशा में एक नैतिक संघर्ष रहा है।

जाति व्यवस्था का निर्माण श्रम-विभाजन के साथ जुड़ा रहा, परंतु यह सामान्य श्रम-विभाजन से भिन्न था। श्रम-विभाजन किसी भी समाज में दक्षता और संगठन के लिए आवश्यक हो सकता है, किंतु जाति व्यवस्था में श्रम का विभाजन जन्म के आधार पर स्थायी बना दिया गया। किसी व्यक्ति को यह स्वतंत्रता नहीं थी कि वह अपनी रुचि या योग्यता के अनुसार पेशा चुन सके। यह पेशागत स्थिरता पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रही और अंततः सामाजिक गतिशीलता को रोकने का माध्यम बन गई। इससे कुछ समूहों को विशेषाधिकार प्राप्त हुए, जबकि अन्य समूहों को वंचना, अस्पृश्यता और अपमान का सामना करना पड़ा। यह स्पष्ट संकेत है कि जाति व्यवस्था एक सत्ता-समर्थित सामाजिक ढाँचा था, जिसका उद्देश्य विशेष वर्गों के हितों की रक्षा करना था।

आर्थिक दृष्टि से भी जातिवाद ने संसाधनों के असमान वितरण को स्थायी बनाया। भूमि, शिक्षा, धार्मिक पद और प्रशासनिक अधिकार मुख्यतः उच्च जातियों के पास केंद्रित रहे। निम्न कही जाने वाली जातियों को श्रमसाध्य और अपमानजनक कार्यों तक सीमित रखा गया। इस व्यवस्था ने सामाजिक पूँजी और आर्थिक अवसरों का संकेंद्रण किया। यदि यह प्राकृतिक व्यवस्था होती, तो आर्थिक अवसरों में ऐसी कठोर वंशानुगत सीमाएँ नहीं होतीं। आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में व्यक्ति की पहचान उसकी योग्यता, शिक्षा और उपलब्धियों से होती है, न कि जन्म से। यही कारण है कि स्वतंत्र भारत के संविधान ने समानता को मूल अधिकार के रूप में स्थापित किया।

Mahatma Gandhi ने अस्पृश्यता को पाप कहा और हरिजन आंदोलन के माध्यम से सामाजिक समरसता का संदेश दिया। हालांकि वे वर्ण व्यवस्था को एक आदर्श श्रम-विभाजन के रूप में देखते थे, किंतु जन्म-आधारित ऊँच-नीच का विरोध करते थे। वहीं डॉ. आंबेडकर ने जाति के पूर्ण उन्मूलन की बात की। यह वैचारिक मतभेद भी इस तथ्य को रेखांकित करता है कि जाति कोई दैवीय सत्य नहीं, बल्कि एक सामाजिक संरचना है, जिस पर विचार-विमर्श और परिवर्तन संभव है। यदि कोई व्यवस्था मानव-निर्मित है, तो उसे मानव द्वारा बदला भी जा सकता है।

समाजशास्त्रियों के अनुसार जाति एक ‘सोशल क्लोज़र’ की प्रणाली है, जिसमें समूह अपने विशेषाधिकारों की रक्षा के लिए बाहरी लोगों के प्रवेश को रोकते हैं। अंतर्जातीय विवाह पर प्रतिबंध, भोजन और सामाजिक संपर्क में भेदभाव, तथा सांस्कृतिक अलगाव इसी सामाजिक बंदीकरण के उपकरण हैं। यह बंदीकरण प्राकृतिक नहीं, बल्कि सुनियोजित सामाजिक नियंत्रण का परिणाम है। आधुनिक शिक्षा, नगरीकरण और औद्योगीकरण ने इस संरचना को चुनौती दी है, क्योंकि वे व्यक्तियों को पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकलने का अवसर प्रदान करते हैं।

आज भी जातिवाद राजनीति, विवाह, रोजगार और सामाजिक संबंधों में दिखाई देता है। जाति-आधारित वोट बैंक, सामाजिक बहिष्कार और हिंसा इस बात के प्रमाण हैं कि यह समस्या अभी समाप्त नहीं हुई है। किंतु समान अवसर, आरक्षण नीति और सामाजिक न्याय के प्रयास इस असमानता को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 समानता और अस्पृश्यता-निषेध की घोषणा करते हैं। यह संवैधानिक व्यवस्था इस तथ्य की स्वीकृति है कि जाति एक सामाजिक बुराई है, जिसे समाप्त करना राज्य का दायित्व है। दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए तो मनुष्य की गरिमा जन्म से नहीं, बल्कि उसकी चेतना और कर्म से निर्धारित होती है। यदि समाज जन्म के आधार पर मनुष्य की क्षमता तय कर देता है, तो वह उसकी स्वतंत्रता और मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है। जातिवाद व्यक्ति की आत्मसम्मान भावना को चोट पहुँचाता है और उसे सीमित पहचान में बाँध देता है। यह मानसिक दासता का रूप है, जो व्यक्ति को अपनी संभावनाओं से दूर रखता है। इसीलिए आधुनिक मानवाधिकार चिंतन जाति-आधारित भेदभाव को अस्वीकार करता है।

अतः यह स्पष्ट है कि जातिवाद न तो ईश्वर की देन है और न ही प्रकृति की अनिवार्यता। यह मानव द्वारा निर्मित एक ऐसी सामाजिक संरचना है, जो असमानता, शोषण और विभाजन पर आधारित रही है। इतिहास साक्षी है कि जो भी व्यवस्था मानव-निर्मित होती है, वह परिवर्तनशील होती है। सामाजिक जागरूकता, शिक्षा, संवैधानिक मूल्यों और नैतिक प्रतिबद्धता के माध्यम से जातिवाद को चुनौती दी जा सकती है। आवश्यक है कि समाज जन्म-आधारित पहचान से ऊपर उठकर मानवता, समानता और न्याय को आधार बनाए। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि जाति कोई दैवीय आदेश नहीं, बल्कि ऐतिहासिक निर्माण है, तभी उसके उन्मूलन की दिशा में सार्थक कदम उठाए जा सकते हैं। मानव समाज का भविष्य उसी में सुरक्षित है, जहाँ मनुष्य को मनुष्य के रूप में सम्मान मिले, न कि जाति के लेबल के आधार पर।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा

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