
‘कल्पवासियों के लिए तो माघ मेला आज ही समाप्त हो गया।’ रुंधे गले से एक सद्य:स्नाता प्रौढ़ा का यह कथन रिपोर्टर को ही नहीं आसपास खड़े लोगों को भी जड़ीभूत कर गया ।
शायद ही कोई समाचार पत्र रहा हो जिसने माघ मेला की कवरेज न की हो लेकिन मौनी अमावस्या के दिन प्रातःकाल अचानक सभी टीवी चैनलों पर जगद्गुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती छा गए। कारण था उनके द्वारा मौनी अमावस्या के स्नान से इंकार। बहुत से चैनलों के रिपोर्टर उस समय संगम तट पर उपस्थित थे। सुबह-सुबह कवरेज हुई। बताया गया कि शंकराचार्य पालकी में बैठकर अपने कुछ अनुयायियों के साथ संगम स्नान को जा रहे थे। उन्हें रोका गया और पैदल जाने को कहा गया। कारण था उस स्थान पर उपस्थित भारी भीड़।
आगे टीवी चैनलों के माध्यम से पूरे देश ने देखा कि किस तरह शंकराचार्य जी की पालकी को धकियाया गया, शंकराचार्य जी का छत्र तोड़ा गया और उनके ब्रह्मचारियों, सन्यासियों और सेवकों को बुरी तरह पीटा गया। जो लोग शंकराचार्य परंपरा को थोड़ा भी जानते हैं उन्हें ज्ञात है कि छत्र और दंड का क्या महत्व है। इनको स्पर्श करना संन्यासी अथवा शंकराचार्य जी की देह को स्पर्श करना है। ऐसे में छत्र तोड़ देना तो शंकराचार्य की हत्या के समान है। बस यही सोचकर आज सनातनियों की आत्मा कांप उठी है। यदि देश में भगवान शिव के अवतार माने जाने वाले शंकराचार्य ही सुरक्षित नहीं तो आम सनातनी का क्या होगा?
आक्षेप लग रहे हैं कि शंकराचार्य बिना अनुमति के संगम तक पहुंच गए थे, इसलिए उनके साथ धक्का- मुक्की हुई। प्रश्न बड़ा है। बयान चिंतनीय है। यदि कोई बिना अनुमति संगम तट पर पहुंच जाएगा तो क्या उसको इसी तरह धकिया दिया जाएगा ? क्या संगम स्नान के लिए किसी ने टिकट बांटे थे और शंकराचार्य जी बेटिकट पहुंच गए थे ? क्या वे 50 लाख लोग, जैसा सरकारी आंकड़े बता रहे हैं, लिखित अनुमति प्राप्त करके ही गए थे जिन्होंने मौनी अमावस्या के दिन दोपहर तक संगम स्नान कर लिया था। यदि नहीं, तो क्या देश में शंकराचार्य के अधिकार आम जनता से कम हैं ? किस आधार पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के संगम स्नान से भगदड़ मच जाने का अंदेशा हुआ ? यदि वाकई ऐसा होने की संभावना थी तो उन्हें 13 जनवरी को माघ मेले में प्रवेश ही क्यों करने दिया गया?
अब बात करते हैं पालकी पर चढ़कर स्नान करने की। प्रत्येक सनातनी को यह ज्ञात है कि चारों शंकराचार्य एवं महामंडलेश्वर जब शाही स्नान को जाते हैं तो उनकी पेशवाई की परंपरा चली आ रही है। वे पालकी पर अथवा रथ पर बैठते हैं उनके अनुयाई उस रथ अथवा पालकी को खींचने को भारी पुण्य का कार्य मानते हैं। यह परंपरा लगभग ढाई हजार वर्ष से चली आ रही है। भारतीयों पर जुल्मों की लंबी दास्तां लिखने वाली मुगल सल्तनत तथा सनातन परंपराओं को हिकारत से देखने वाले अंग्रेज भी इन परंपराओं को रोकने अथवा परिवर्तित करने का दुस्साहस न कर सके, किंतु वर्तमान में सनातनी परंपराओं के विरोधी धर्मांतरण गैंग ने मानव परंपराओं पर कुठाराघात करने की सौगंध खा ली है। इसके लिए शंकराचार्यों को किनारे लगाना आवश्यक है क्योंकि सभी को विदित है कि चारों शंकराचार्य सनातन धर्म की धुरी है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस माघ मेले में सभी संतों के शिविरों में संपर्क कर उन्हें सनातन धर्म के हित में एकजुट कर रहे हैं और यही धर्मांतरण गैंग को रास नहीं आ रहा। इतिहास साक्षी है कि गोरक्षा आंदोलन के आदि प्रणेता स्वामी करपात्रीजी महाराज भी इसी प्रकार सनातन विरोधियों का शिकार हुए थे। अब देखना यह है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस चक्रव्यूह से बचकर कैसे निकलते हैं?


