“वैश्विक हिंदी दिवस: नागपुर से विश्वपटल तक हिंदी की सांस्कृतिक, बौद्धिक और मानवीय यात्रा”
डॉ प्रमोद कुमार

“वैश्विक हिंदी दिवस: नागपुर से विश्वपटल तक हिंदी की सांस्कृतिक, बौद्धिक और मानवीय यात्रा” विषय केवल एक भाषा-दिवस का औपचारिक स्मरण नहीं है, बल्कि यह हिंदी के उस ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, वैचारिक और मानवीय विस्तार की कथा है, जिसने उसे भारत की सीमाओं से निकालकर विश्व मानवता की साझा अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। 10 जनवरी को मनाया जाने वाला वैश्विक हिंदी दिवस उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाता है, जब भारत सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में नागपुर, महाराष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ। यह सम्मेलन केवल भाषायी विमर्श का मंच नहीं था, बल्कि यह उस आत्मविश्वास का प्रतीक था, जिसमें हिंदी को एक वैश्विक संवाद-भाषा के रूप में स्थापित करने का संकल्प निहित था। उसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण प्रतिवर्ष 10 जनवरी को वैश्विक हिंदी दिवस मनाया जाता है, जो हिंदी की निरंतर गतिशीलता, समावेशिता और सार्वभौमिकता का उत्सव है।
हिंदी की यात्रा मूलतः मानव जीवन की यात्रा से जुड़ी हुई है। यह भाषा किसी एक वर्ग, जाति, क्षेत्र या संप्रदाय की बपौती नहीं रही, बल्कि जनसामान्य की अनुभूति, संघर्ष, आशा और स्वप्नों की संवाहक बनी। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और लोकभाषाओं के सतत संवाद से विकसित हिंदी ने समय-समय पर स्वयं को परिवर्तित किया, संवारा और व्यापक बनाया। यही लचीलापन और ग्रहणशीलता हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति रही है। इसीलिए हिंदी केवल साहित्यिक भाषा नहीं बनी, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, स्वतंत्रता आंदोलन, लोकतांत्रिक चेतना और मानवीय मूल्यों की वाहक भाषा भी बनी।
नागपुर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का ऐतिहासिक महत्व इसी संदर्भ में और अधिक स्पष्ट हो जाता है। यह सम्मेलन उस समय हुआ जब वैश्वीकरण के दबाव में भाषाओं की अस्मिता पर प्रश्नचिह्न लग रहे थे। अंग्रेज़ी के वर्चस्व के बीच हिंदी को केवल राष्ट्रभाषा या संपर्क भाषा के रूप में सीमित रखने की प्रवृत्ति थी। किंतु इस सम्मेलन ने हिंदी को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखने की नई दृष्टि दी। डॉ. मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री और दूरदर्शी नेता के नेतृत्व में यह संदेश स्पष्ट हुआ कि आर्थिक विकास और वैश्विक संवाद के लिए अपनी भाषाओं को त्यागना आवश्यक नहीं है, बल्कि अपनी भाषाओं के माध्यम से भी विश्व से संवाद संभव है। हिंदी इसी आत्मनिर्भर भाषायी चेतना का प्रतीक बनी।
वैश्विक हिंदी दिवस का अर्थ केवल विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार तक सीमित नहीं है। इसका मूल भाव यह है कि हिंदी विश्व मानवता के साझा सरोकारों को व्यक्त करने में सक्षम भाषा बने। आज हिंदी करोड़ों लोगों की मातृभाषा है, उससे कहीं अधिक लोगों की संपर्क भाषा है और उससे भी अधिक लोग इसे भावनात्मक रूप से अपनाते हैं। प्रवासी भारतीय समुदायों के माध्यम से हिंदी ने मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद, नेपाल, दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया तक अपनी जड़ें जमाई हैं। इन देशों में हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि स्मृति, संस्कृति और पहचान का माध्यम बनी हुई है।
हिंदी की सांस्कृतिक यात्रा अत्यंत समृद्ध और बहुआयामी रही है। भक्तिकाल के संतों ने हिंदी को जन-जन की आध्यात्मिक भाषा बनाया। कबीर, तुलसी, सूर, मीरा और रैदास ने हिंदी के माध्यम से सामाजिक विषमता, आडंबर और अन्याय के विरुद्ध मानवीय चेतना को स्वर दिया। आधुनिक काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, निराला, महादेवी वर्मा और नागार्जुन जैसे साहित्यकारों ने हिंदी को सामाजिक यथार्थ, करुणा और विद्रोह की भाषा बनाया। यह साहित्यिक परंपरा आज भी विश्व के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई और शोध का विषय है, जो हिंदी को वैश्विक अकादमिक मानचित्र पर स्थापित करती है।
बौद्धिक दृष्टि से हिंदी ने दर्शन, समाजशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र और विज्ञान तक अपनी अभिव्यक्ति का विस्तार किया है। डॉ. भीमराव आंबेडकर, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और लोहिया जैसे चिंतकों के विचार हिंदी के माध्यम से व्यापक जनसमूह तक पहुंचे। हिंदी ने लोकतांत्रिक विमर्श को सरल, सुलभ और सहभागी बनाया। यही कारण है कि हिंदी केवल अभिव्यक्ति की भाषा नहीं रही, बल्कि विचार-निर्माण और चेतना-निर्माण की भाषा बनी।
मानवीय यात्रा के संदर्भ में हिंदी की भूमिका और भी गहरी है। हिंदी करुणा, सह-अस्तित्व, संवाद और शांति की भाषा है। इसमें संघर्ष है, परंतु घृणा नहीं; विरोध है, परंतु अमानवीयता नहीं। वैश्विक हिंदी दिवस का संदेश यही है कि भाषा को वर्चस्व का औजार नहीं, बल्कि मानवता को जोड़ने का सेतु बनाया जाए। जब हिंदी वैश्विक मंच पर आती है, तो वह केवल भारत की नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की पीड़ा, आकांक्षा और आशा को स्वर देती है।
डिजिटल युग में हिंदी की वैश्विक यात्रा ने एक नया मोड़ लिया है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, ब्लॉग, पॉडकास्ट और ऑनलाइन शिक्षण मंचों पर हिंदी की उपस्थिति निरंतर बढ़ रही है। आज हिंदी केवल पुस्तकों और भाषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर, वीडियो मंचों पर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संसार में भी अपनी जगह बना रही है। यह परिवर्तन हिंदी को नई पीढ़ी से जोड़ता है और उसे भविष्य की भाषा के रूप में स्थापित करता है। वैश्विक हिंदी दिवस इस डिजिटल सशक्तिकरण का भी उत्सव है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि वैश्विक हिंदी दिवस आत्ममंथन का अवसर भी प्रदान करता है। यह दिन हमें यह सोचने को प्रेरित करता है कि क्या हम हिंदी को केवल औपचारिक आयोजनों और भाषणों तक सीमित कर रहे हैं, या उसे ज्ञान, विज्ञान और नवाचार की भाषा बना रहे हैं। हिंदी की वैश्विक प्रतिष्ठा तभी सुदृढ़ होगी जब उसमें समकालीन ज्ञान का सृजन होगा, जब वह शोध, तकनीक और वैश्विक समस्याओं पर विमर्श की सक्षम भाषा बनेगी। नागपुर सम्मेलन की आत्मा इसी दिशा में प्रेरित करती है।
अंततः वैश्विक हिंदी दिवस मानव जीवन के लिए एक व्यापक संदेश लेकर आता है। यह भाषा की राजनीति से ऊपर उठकर भाषा की मानवता को स्थापित करता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भाषाएँ केवल शब्दों का संग्रह नहीं होतीं, वे संस्कृतियों की आत्मा और मनुष्यता की स्मृति होती हैं। हिंदी ने अपनी यात्रा में विविधताओं को अपनाया है, विरोधाभासों को समेटा है और संवाद को प्राथमिकता दी है। नागपुर से विश्वपटल तक की यह यात्रा हिंदी की ही नहीं, बल्कि उस मानवता की यात्रा है जो भिन्नताओं के बावजूद एक-दूसरे से जुड़ना चाहती है।
इसी भावना के साथ वैश्विक हिंदी दिवस सभी विश्व मानवजीवन के लिए शुभकामनाओं का दिवस बनता है। यह कामना करता है कि हिंदी संवाद की भाषा बने, विभाजन की नहीं; संवेदना की भाषा बने, सत्ता की नहीं; और मानव गरिमा की भाषा बने, किसी एक राष्ट्र या समूह की नहीं। वैश्विक हिंदी दिवस की यही सच्ची सार्थकता है और यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि भी।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा



