जलवायु संतुलन के लिए महत्त्वपूर्ण है अरावली पहाड़ियाँ : डॉ दिनेश शर्मा
अरावली की पहाड़ियाँ भौगोलिक संरचना मात्र नहीं हैं बल्कि ये हैं सुरक्षा कवच

लखनऊ। राज्य सभा सांसद और पूर्व उप मुख्यमंत्री डॉ दिनेश शर्मा ने कहा कि अरावली पहाड़ियों से ही जलवायु संतुलन बना हुआ है। इस क्षेत्र में भूजल और जलवायु की समस्या , शहरीकरण , अवैध खनन की चुनौती सामने है। विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है। प्रगति के साथ आर्थिक संरक्षण हो पर पर्यावरण संरक्षण का काम भी किया जाना चाहिए। वन्य जीव संरक्षण , अवैध खनन पर रोक होनी चाहिए। उनका कहना था कि संविधान में पर्यावरण के संरक्षण की व्यवस्था की गई है। हर नागरिक की पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी तय की गई है।
नर्वदेश्वर लॉ कॉलेज, चिनहट, लखनऊ में “अरावली पर्वतमाला के संदर्भ में सतत विकास का विधिक एवं नीतिगत ढांचा” विषयक सेमिनार में मुख्य अतिथि के रूप सम्मिलित होकर विधि विशेषज्ञों एवं छात्रों को संबोधित करते हुए सांसद ने कहा कि अरावली की पहाड़ियाँ भौगोलिक संरचना मात्र नहीं हैं बल्कि ये सुरक्षा कवच हैं और इनका संरक्षण किया जाना चाहिए। विकास और पर्यावरण के मध्य संतुलन बनाना बहुत आवश्यक है। आज विकास को रोकना संभव नहीं है क्योंकि इससे प्रगति की रफ़्तार प्रभावित होगी और देश के पिछड़ने का ख़तरा है। अरावली से धार्मिक मान्यताएं भी जुड़ी है। सरकार पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण करा रही है। विकास के लिए वृक्ष अगर काटे जाते हैं तो उससे अधिक पेड़ लगाए जाने चाहिए।
डॉ शर्मा ने कहा कि जल जीव और प्रकृति के संरक्षण के लिए इन्हें धर्म से जोड़ा गया है। धर्म ग्रंथ पर्यावरण संरक्षण के लिए दिशा दिखाते थे। ऋषि मुनियों ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर जो कहा था वह देश के संविधान में भी लिखा गया है।
अरावली पर्वत के क्षेत्र में वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कानून बनाया गया है। कोर्ट ने भी अवैध खनन को लेकर सख़्त कार्रवाई की है। पर्यावरण को लेकर एक व्यापक नीति 2006 में लागू की गई। आज पर्यावरण को लेकर राज्यों के बीच में समन्वय बढ़ा है। खनन पर रोक के लिए मैपिंग की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज के समय के लोग देश में शिक्षा के बदलाव के साक्षी बने हैं। एक समय में लोग लालटेन की रोशनी में पढ़ते थे। नैतिकता , सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण आदि के प्रति कर्तव्य का बोध करते हुए आगे बढ़ने पर परिवार और राष्ट्र के संरक्षण का दायित्व होता था। देश में पूजा जल , पृथ्वी , जीव जंतु की भी होती थी और इस प्रकार मनुष्य ने ख़ुद को प्रकृति से भी जोड़ा है। भारत की संस्कृति एक अलग तरह की संस्कृति है जिसमे दुश्मन के भी कल्याण की भावना तथा प्राणियों में सद्भाव की बात कही गई है। सामाजिक मान्यताओं ने समाज को जोड़ कर रखा है। इसके साथ ही समाज ने आधुनिकता को भी अपनाया है। पहले व्यक्ति के सोने पर उसे आराम मिलता था लेकिन अब उसके सोने पर मोबाइल को आराम मिलता है। व्यक्ति की गतिविधियों पर आधुनिकता और तकनीक हावी हो रही है। मन की अशांति सामाजिक सुधारों का दुश्मन है। चित्त के शांत होने के लिए स्वास्थ्य अच्छा होना जरूरी है। पैर गर्म , पेट नरम , मस्तिष्क स्वस्थ हो वही स्वस्थ होगा। व्यक्ति का दुख पड़ोसी की प्रगति से है।
उनका कहना था कि केंद्र सरकार ने अप्रासंगिक हो चुके कानूनों को समाप्त किया है। कानून व्यक्ति को बेहतर बनाकर संविधान के अनुसार चलने की प्रेरणा देता है। क़ानून व्यक्ति की प्रताड़ना का कारण नहीं बनना चाहिए। देश में तमाम कानूनों के सरलीकरण ने लोगों की जिंदगी बदल दी है। क़ानून ऐसा नहीं होना चाहिए कि मानवता का भाव ही समाप्त हो जाए। उन्होंने कहा कि देश की राजधानी दिल्ली में आज भी हुमायूँ , तुगलक आदि आक्रांताओं के नाम पर सड़के है।ये नाम बदलने चाहिये। इसे धर्म के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। डॉ कलाम , वीर हमीद हमारे आदर्श हो सकते है पर अक्रांता देश के आदर्श नहीं हो सकते। वर्तमान सरकार ने इन नामों को बदलना आरम्भ किया है।
इस अवसर पर पूर्व कुलपति डॉo डीपी तिवारी जी, अध्यक्ष लुआक्टा डॉo मनोज पांडे जी, पूर्व विधि सलाहकार राजभवन श्री एस एस उपाध्याय जी, संस्थापक नर्वदेश्वर ग्रुप ऑफ़ इंस्टीट्यूट प्रोo नरेन्द्रमणि त्रिपाठी जी, डॉ दुर्गेश त्रिपाठी जी, डॉo वीके शुक्ला जी, सुखाड़िया विश्वविद्यालय राजस्थान के पूर्व कुलपति डॉ अमरीक सिंह, बीरबल सहनी इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ महेश जीo ठक्कर जी, डॉ शिवेंद्र त्रिपाठी जी आदि उपस्थित रहे।



