2 साल की बच्ची के पेट में निकला 1.5KG का ट्यूमर, डॉक्टर्स ने की सावधानीपूर्वक सर्जरी

बस्ती जिले के मुंडेरवा क्षेत्र के ग्राम काबरा निवासी शिवम की पुत्री अंशिका पिछले दो महीनों से पेट दर्द, भूख न लगने और उल्टी की शिकायत से परेशान थी. चिकित्सकों से संपर्क करने और जांच कराने के बाद पता चला कि उसके पेट में .5 किलो का विशाल ट्यूमर है. बच्ची का वजन भी घटकर 10 किलो तक पहुंच गया था.
शुरुआत में बच्ची को जब परेशानी हुई तो उसके माता-पिता ने स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज कराया. लेकिन राहत नहीं मिलने पर उसे केजीएमयू रेफर किया गया.यहां जांच में पता चला कि बच्ची के पेट में एक दुर्लभ ट्यूमर (लिपोब्लास्टोमा) है, जो आंतों और दाहिने गुर्दे समेत आसपास की संरचनाओं को दबा रहा था.
प्रोफेसर जिलेदार रावत की देखरेख में हुआ बच्ची का ऑपरेशन
27 अप्रैल 2026 को को बच्ची को बाल शल्य चिकित्सा विभाग में भर्ती कराया गया. फिर अंशिका ऑपरेशन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर जिलेदार रावत की देखरेख में किया गया. टीम में प्रोफेसर आनंद पांडे, डॉक्टर राहुल राय, डॉक्टर कौशल कुलकर्णी और डॉक्टर कृति पटेल शामिल रहे. एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व प्रोफेसर सतीश वर्मा ने किया.
ट्यूमर निकलने के बाद बच्ची पूरी तरह स्वस्थ
सर्जरी में मिली सफलता को लेकर प्रोफेसर जिलेदार रावत ने बताया, “लिपोब्लास्टोमा बचपन में होने वाला एक बहुत ही दुर्लभ ट्यूमर है, जो पेट, हाथों या पैरों में हो सकता है. इस बच्ची का ट्यूमर 1.5 किलोग्राम का था, जो उसके कुल वजन का 15 प्रतिशत था. सावधानीपूर्वक की गई सर्जरी से ट्यूमर पूरी तरह निकाल लिया गया.बच्ची अब पूरी तरह स्वस्थ है और आज डिस्चार्ज की जा रही है.”
माता-पिता ने केजीएमयू के डॉक्टरों का आभार जताया
प्रोफेसर आनंद पांडे ने बताया कि सीटी स्कैन से ट्यूमर की सटीक लोकेशन और प्रकृति का पता चलने के बाद ही सर्जरी की योजना बनाई गई, जिससे जटिलताओं का जोखिम कम रहा.केजीएमयू कुलपति प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद ने इस सफल सर्जरी के लिए पूरे विभाग की सराहना की और टीम को बधाई दी. माता-पिता ने केजीएमयू के डॉक्टरों का आभार जताते हुए कहा कि उनकी बेटी को नई जिंदगी मिल गई है.
3 साल के कम उम्र के बच्चों में पाया जाता है ये ट्यूमर
विशेषज्ञों का कहना है कि लिपोब्लास्टोमा सामान्यत 3 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में पाया जाता है.समय पर सही सर्जरी से यह पूरी तरह ठीक हो सकता है.केजीएमयू के बाल शल्य चिकित्सा विभाग ने ऐसे जटिल मामलों को संभालने में अपनी विशेषज्ञता साबित की है.यह सफलता न सिर्फ अंशिका और उसके परिवार के लिए खुशी का विषय है, बल्कि उन माता-पिता के लिए भी उम्मीद की किरण है, जिनके बच्चे दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे हैं.



