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रविवार, 11 अक्टूबर 2026
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मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी पड़ रही भारी, हर साल एक लाख लोगों की मौत

आगरा। मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी व्यक्ति को भीतर ही भीतर तोड़ सकती है। कई लोग वर्षों तक मानसिक तनाव, अवसाद, बेचैनी और पारिवारिक संघर्षों से जूझते रहते हैं, लेकिन अपनी परेशानी किसी से साझा नहीं कर पात…

मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी पड़ रही भारी, हर साल एक लाख लोगों की मौत
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2026 पर आगरा में आयोजित संगोष्ठी में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता का संदेश देते डॉ. चिनू अग्रवाल।

आगरा। मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी व्यक्ति को भीतर ही भीतर तोड़ सकती है। कई लोग वर्षों तक मानसिक तनाव, अवसाद, बेचैनी और पारिवारिक संघर्षों से जूझते रहते हैं, लेकिन अपनी परेशानी किसी से साझा नहीं कर पाते। इसके कारण उनकी नींद, भूख, भावनात्मक स्थिति और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगती है। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर यही चुप्पी समस्या को गंभीर बना सकती है। जरूरत इस बात की है कि मानसिक परेशानियों को कमजोरी या शर्म का विषय मानने के बजाय उन्हें समझा जाए और समय रहते विशेषज्ञों से परामर्श लिया जाए।

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2026 के अवसर पर शनिवार को आगरा के विमल विहार, सिकंदरा-बोदला रोड स्थित फीलिंग माइंड्स संस्था के कार्यालय में आयोजित संगोष्ठी में मनोवैज्ञानिक एवं मनोचिकित्सक डॉ. चिनू अग्रवाल ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने लोगों से अपनी मानसिक परेशानियों को छिपाने के बजाय साझा करने की अपील की।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. प्रतीक अग्रवाल उपस्थित रहे।

मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी व्यक्ति और परिवार दोनों को करती है प्रभावित

फीलिंग माइंड्स के निदेशक तथा आईएसएमएचएए (अंतरराष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य पक्षसमर्थन एवं कार्रवाई संस्था) के अध्यक्ष डॉ. चिनू अग्रवाल ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करने की कीमत व्यक्ति के साथ-साथ उसके पूरे परिवार को भी चुकानी पड़ सकती है।

उन्होंने बताया कि मानसिक परेशानी से गुजर रहे व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव, नींद और भूख में कमी, बेचैनी, चिड़चिड़ापन तथा लगातार उदासी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इसके बावजूद कई बार परिवार और आसपास के लोग उसकी स्थिति को समझ नहीं पाते। ऐसे में व्यक्ति अकेले ही संघर्ष करता रहता है और उसकी समस्या समय के साथ गंभीर हो सकती है।

उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना, परेशानियों को समझना और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञों की सहायता लेना बेहद जरूरी है।

पारिवारिक संबंधों में तनाव भी बन सकता है मानसिक परेशानी का कारण

डॉ. चिनू अग्रवाल ने कहा कि उनके अनुसार, 30 प्रतिशत से अधिक आत्महत्याओं के पीछे पारिवारिक संबंधों से जुड़ी समस्याएं होती हैं। रिश्तों में तनाव, आपसी मतभेद, संवाद की कमी और लंबे समय तक चलने वाले पारिवारिक विवाद व्यक्ति की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं।

उन्होंने बताया कि कई बार लोग अपने संबंधों में चल रहे संघर्ष को लंबे समय तक सहते रहते हैं, लेकिन किसी से मदद नहीं मांगते। ऐसी परिस्थितियों में समय रहते संवाद स्थापित करना, एक-दूसरे की भावनाओं को समझना और मनोवैज्ञानिक परामर्श लेना महत्वपूर्ण हो जाता है।

पारिवारिक विवाद सुलझाने में मनोवैज्ञानिक परामर्श की अहम भूमिका

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि सकारात्मक बदलाव यह है कि अब धीरे-धीरे लोगों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। पारिवारिक विवादों को सुलझाने और आपसी संबंधों को बेहतर बनाने के लिए लोग मनोवैज्ञानिकों की सहायता ले रहे हैं।

पति-पत्नी के बीच संवाद की कमी, बार-बार होने वाले विवाद और भावनात्मक दूरी जैसी समस्याओं के समाधान के लिए दंपती परामर्श की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती जा रही है।

उन्होंने कहा कि समय रहते विशेषज्ञों से परामर्श लेने से लोगों को एक-दूसरे की भावनाओं को समझने, समस्याओं पर खुलकर चर्चा करने और संबंधों को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

महिलाओं के मानसिक संघर्ष को समझना भी जरूरी

कार्यक्रम में महिलाओं की भावनात्मक स्थिति और उनके मानसिक संघर्ष को समझने पर भी जोर दिया गया।

डॉ. चिनू अग्रवाल ने कहा कि परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए महिलाएं कई बार अपनी भावनाओं, इच्छाओं और परेशानियों को पीछे रख देती हैं। घर, बच्चों, रिश्तों और अन्य जिम्मेदारियों के बीच उनका अपना मानसिक संघर्ष अनदेखा रह जाता है।

उन्होंने कहा कि परिवार के सदस्यों को महिलाओं की भावनाओं को समझना चाहिए और उन्हें अपनी परेशानियां साझा करने के लिए उचित अवसर देना चाहिए। परिवार में भावनात्मक सहयोग और आपसी समझ मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मानसिक बीमारी से जुड़े भ्रम दूर करने की जरूरत

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि समाज में मन और मस्तिष्क से जुड़ी समस्याओं को लेकर आज भी अनेक भ्रम मौजूद हैं। लोग मनोचिकित्सा और मनोवैज्ञानिक परामर्श के बीच के अंतर को ठीक से नहीं समझते। इसके कारण कई बार वे सही समय पर उचित सहायता नहीं ले पाते।

उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने और आवश्यकता पड़ने पर प्रशिक्षित विशेषज्ञों से परामर्श लेने की जरूरत पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि मानसिक परेशानियों को स्वीकार करना कमजोरी नहीं है। अपनी भावनाओं को साझा करना और उचित सहायता लेना समस्या को समझने तथा उससे निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य के प्रत्यक्ष अनुभव रखने वाले लोगों की आवाज को प्राथमिकता

कार्यक्रम का केंद्रीय विषय “प्रत्यक्ष अनुभव रखने वाले लोगों को केंद्र में लाना” रहा। इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का प्रत्यक्ष अनुभव रखने वाले लोगों की आवाज, अनुभवों और जरूरतों को प्राथमिकता देना था।

कार्यक्रम का प्रमुख संदेश “केवल उनके लिए नहीं, बल्कि उनके साथ मिलकर निर्माण करना” रहा। इस संदेश के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रयासों में उन लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया, जिन्होंने स्वयं इन चुनौतियों का अनुभव किया है।

संगोष्ठी में यह संदेश दिया गया कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए लोगों को अपनी बात कहने का अवसर देना, उनकी भावनाओं को समझना और जरूरत के समय उचित सहायता उपलब्ध कराना आवश्यक है।

मानसिक स्वास्थ्य जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए मानसिक तनाव, लगातार उदासी, बेचैनी या पारिवारिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों की बात सुनना, उनके प्रति संवेदनशील रहना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों की मदद लेना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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Dheeraj singh · Editorial Associate

धीरज सिंह कारोबार, बाज़ार और टेक्नोलॉजी बीट के पत्रकार हैं। शेयर बाज़ार, अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप और गैजेट्स पर सरल भाषा में विश्लेषण देना उनकी खासियत है। जटिल आर्थिक मुद्दों को वे आम पाठक के लिए…

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