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“शोषण-मुक्त समाज की खोज: बुद्ध की करुणा (नैतिक क्रांति) और मार्क्स का संघर्ष (वर्ग-संघर्ष) डॉ अम्बेडकर का वैचारिक चयन”

डॉ प्रमोद कुमार

डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा 1935–36 के कालखंड में रचित आत्मकथात्मक कृति “वीजा की प्रतीक्षा में” केवल एक व्यक्तिगत पीड़ा, अपमान और संघर्ष की कथा नहीं है, बल्कि वह आधुनिक भारत के सबसे गहरे सामाजिक-दार्शनिक प्रश्नों से मुठभेड़ करती हुई रचना है। इस कृति में अम्बेडकर न केवल औपनिवेशिक सत्ता की संवेदनहीनता, जातिगत अन्याय और व्यक्तिगत संघर्षों को उजागर करते हैं, बल्कि वे विश्व-विचार परंपराओं—विशेषतः बुद्ध और कार्ल मार्क्स—के बीच एक गंभीर वैचारिक संवाद भी स्थापित करते हैं। यह संवाद किसी अकादमिक तुलना भर का प्रयास नहीं है, बल्कि भारत जैसे समाज के लिए शोषण-मुक्त, समानतामूलक और मानवीय व्यवस्था की खोज का नैतिक-राजनीतिक विमर्श है। अम्बेडकर यह स्पष्ट करते हैं कि बुद्ध और मार्क्स दोनों का लक्ष्य समान है—एक ऐसा समाज जहाँ मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण न हो—परंतु उस लक्ष्य तक पहुँचने के मार्ग, साधन और नैतिक आधार एक-दूसरे से भिन्न हैं।
अम्बेडकर के लिए यह तुलना महज़ दार्शनिक अभ्यास नहीं थी। वे स्वयं जीवन भर शोषण के प्रत्यक्ष अनुभव से गुज़रे थे। जाति-आधारित अपमान, सामाजिक बहिष्कार और संस्थागत भेदभाव ने उन्हें इस प्रश्न पर बार-बार लौटने को विवश किया कि अन्यायपूर्ण व्यवस्था का उन्मूलन कैसे हो। “वीजा की प्रतीक्षा में” में उनका आत्मकथ्य इसीलिए एक व्यापक सामाजिक-वैचारिक विश्लेषण में रूपांतरित हो जाता है। वे मानते हैं कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता या आर्थिक पुनर्वितरण पर्याप्त नहीं है; जब तक मनुष्य की चेतना में नैतिकता, करुणा और समानता का बीज नहीं बोया जाता, तब तक कोई भी क्रांति टिकाऊ नहीं हो सकती। यहीं से बुद्ध और मार्क्स की तुलना का केंद्रीय सूत्र उभरता है।
कार्ल मार्क्स का चिंतन औद्योगिक पूँजीवाद की पृष्ठभूमि में विकसित हुआ, जहाँ वर्ग-संघर्ष सामाजिक परिवर्तन की मुख्य प्रेरक शक्ति के रूप में सामने आता है। मार्क्स के अनुसार समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है—दास और स्वामी, सामंत और कृषक, पूँजीपति और सर्वहारा। इस संघर्ष का समाधान क्रांति में निहित है, जहाँ शोषित वर्ग सत्ता पर कब्ज़ा कर उत्पादन के साधनों का सामूहिकीकरण करता है। इस प्रक्रिया में हिंसा, टकराव और सत्ता-परिवर्तन को ऐतिहासिक अनिवार्यता के रूप में देखा जाता है। अम्बेडकर इस विश्लेषण की तीक्ष्णता और आर्थिक अन्याय को उजागर करने की क्षमता को स्वीकार करते हैं, पर वे इस बात पर गंभीर आपत्ति उठाते हैं कि क्या केवल संघर्ष और क्रांति मनुष्य को नैतिक रूप से उन्नत बना सकती है।
इसके विपरीत, बुद्ध का दर्शन अम्बेडकर के लिए एक नैतिक-सामाजिक क्रांति का मॉडल प्रस्तुत करता है। बुद्ध भी शोषण, असमानता और पीड़ा के घोर आलोचक थे। उन्होंने वर्ण-व्यवस्था, ब्राह्मणवादी वर्चस्व और कर्मकांडीय धर्म की जड़ता को चुनौती दी। बुद्ध का संघ एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का प्रयोगशाला था, जहाँ जन्म नहीं बल्कि आचरण और विवेक के आधार पर मनुष्य का मूल्यांकन होता था। यह अपने आप में क्रांतिकारी था, पर इस क्रांति का माध्यम हिंसा नहीं बल्कि करुणा, प्रज्ञा और शील था। अम्बेडकर इस बिंदु पर विशेष बल देते हैं कि बुद्ध का मार्ग मनुष्य की आंतरिक चेतना में परिवर्तन से शुरू होता है, जिससे बाह्य सामाजिक संरचनाएँ स्वतः रूपांतरित होती हैं।
अम्बेडकर की दृष्टि में मार्क्सवाद की सबसे बड़ी सीमा यह है कि वह नैतिकता को अधिरचना मानता है—अर्थात् आर्थिक ढाँचे के बदलने पर नैतिकता स्वयं बदल जाएगी। बुद्ध इसके ठीक उलट नैतिकता को परिवर्तन का आधार मानते हैं। बुद्ध के लिए शील (नैतिक आचरण), समाधि (मानसिक अनुशासन) और प्रज्ञा (बोध) सामाजिक मुक्ति के अनिवार्य स्तंभ हैं। अम्बेडकर तर्क देते हैं कि यदि सत्ता परिवर्तन के बाद भी शासक वर्ग के मन में करुणा और नैतिक जिम्मेदारी नहीं है, तो वह नया शासक वर्ग भी पुराने शोषण को नए रूप में पुनरुत्पादित करेगा। इतिहास में कई क्रांतियाँ इसका उदाहरण हैं, जहाँ सत्ता बदली पर शोषण की प्रकृति बनी रही।
यहाँ अम्बेडकर का अनुभवजन्य विवेक निर्णायक भूमिका निभाता है। भारत में जाति-व्यवस्था केवल आर्थिक शोषण की व्यवस्था नहीं थी; वह सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक स्तर पर जड़ जमाए हुए थी। किसी व्यक्ति का जन्म ही उसके श्रम, सम्मान और अधिकार तय कर देता था। ऐसे समाज में केवल वर्ग-आधारित संघर्ष पर्याप्त नहीं हो सकता था। अम्बेडकर को लगता था कि यदि जातिगत चेतना का नैतिक विघटन नहीं हुआ, तो कोई भी आर्थिक क्रांति अधूरी रहेगी। इसलिए वे बुद्ध के धम्म को सामाजिक लोकतंत्र की आधारशिला मानते हैं—एक ऐसा लोकतंत्र जो केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित न होकर सामाजिक और नैतिक समानता की मांग करता है।
“वीजा की प्रतीक्षा में” में यह विमर्श इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि अम्बेडकर स्वयं पश्चिमी शिक्षा, मार्क्सवादी साहित्य और आधुनिक राजनीतिक सिद्धांतों से गहराई से परिचित थे। वे मार्क्सवाद को खारिज नहीं करते; बल्कि उसकी सीमाओं को रेखांकित करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि मार्क्स ने पूँजीवादी शोषण की संरचना को वैज्ञानिक ढंग से उजागर किया, पर वे यह भी कहते हैं कि भारत जैसे समाज में जहाँ शोषण की जड़ें धर्म और संस्कृति में गहराई तक धँसी हों, वहाँ केवल आर्थिक विश्लेषण अपर्याप्त है। बुद्ध का धम्म इसीलिए प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि वह मनुष्य के आचार-विचार, करुणा और सामाजिक संबंधों को समानता के आधार पर पुनर्गठित करता है।
अम्बेडकर की दृष्टि में बुद्ध और मार्क्स के बीच सबसे निर्णायक अंतर साधनों का है। मार्क्स के यहाँ साध्य की प्राप्ति के लिए साधन—चाहे वे हिंसक हों—ऐतिहासिक रूप से उचित ठहराए जा सकते हैं। बुद्ध के यहाँ साधन और साध्य में नैतिक निरंतरता अनिवार्य है। करुणा के लक्ष्य तक करुणा के साधनों से ही पहुँचा जा सकता है। यदि साधन हिंसक होंगे, तो साध्य भी हिंसा से मुक्त नहीं रह पाएगा। यह विचार अम्बेडकर के लिए केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि गहन राजनीतिक अर्थ रखता है। वे मानते हैं कि लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता; वह नागरिकों के नैतिक चरित्र से चलता है।
इस तुलना का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है—व्यक्ति की भूमिका। मार्क्सवाद में व्यक्ति ऐतिहासिक शक्तियों और वर्ग-संघर्ष की व्यापक संरचना का हिस्सा बन जाता है। बुद्ध के दर्शन में व्यक्ति केंद्रीय है—उसकी चेतना, उसका आचरण और उसकी जिम्मेदारी। अम्बेडकर को लगता है कि सामाजिक परिवर्तन के लिए व्यक्ति की नैतिक एजेंसी को नकारना आत्मघाती है। यदि व्यक्ति अपने आचरण में परिवर्तन नहीं लाता, तो कोई भी व्यवस्था टिकाऊ नहीं हो सकती। इसलिए वे बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग को सामाजिक सुधार का व्यावहारिक खाका मानते हैं।
अम्बेडकर का यह विमर्श अंततः भारत के भविष्य की ओर संकेत करता है। वे एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों पर आधारित हो—और यह त्रयी उन्हें फ्रांसीसी क्रांति से अधिक बुद्ध के धम्म में सजीव रूप में मिलती है। मार्क्स की क्रांति सत्ता का प्रश्न हल कर सकती है, पर बुद्ध की करुणा मनुष्य के मन का प्रश्न हल करती है। अम्बेडकर के लिए सच्ची मुक्ति तब संभव है जब सत्ता और मन दोनों का रूपांतरण साथ-साथ हो।
इस प्रकार “वीजा की प्रतीक्षा में” में बुद्ध और मार्क्स की तुलना किसी एक के पक्ष में दूसरे को खारिज करने का प्रयास नहीं है। यह एक विवेकपूर्ण चयन का प्रस्ताव है—जहाँ अम्बेडकर भारत की ऐतिहासिक, सामाजिक और नैतिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए बुद्ध के मार्ग को अधिक उपयुक्त मानते हैं। वे यह स्वीकार करते हैं कि शोषण-मुक्त समाज की आकांक्षा दोनों में समान है, पर वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि नैतिकता और करुणा के बिना कोई भी क्रांति अंततः मनुष्य को नया उत्पीड़क बना सकती है। बुद्ध का मार्ग संघर्ष से इनकार नहीं करता, बल्कि संघर्ष को करुणा और विवेक से अनुशासित करता है।
अन्ततः अम्बेडकर का यह चिंतन आज भी उतना ही प्रासंगिक है। जब दुनिया विभिन्न प्रकार के असमानताओं, हिंसक संघर्षों और वैचारिक ध्रुवीकरण से जूझ रही है, तब बुद्ध और मार्क्स की यह तुलना हमें यह सोचने को विवश करती है कि हम किस प्रकार का परिवर्तन चाहते हैं—केवल सत्ता का या मनुष्य का भी। अम्बेडकर का उत्तर स्पष्ट है: बिना नैतिक और करुणामय मनुष्य के कोई भी समानतामूलक समाज स्थायी नहीं हो सकता। बुद्ध का धम्म इसीलिए उनके लिए केवल धर्म नहीं, बल्कि मानव मुक्ति का सबसे मानवीय और विवेकपूर्ण मार्ग है।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा

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