लेख

“जनता मालिक, प्रतिनिधि सेवक: लोकतंत्र में वास्तविक VIP कौन?”

डॉ प्रमोद कुमार

लोकतंत्र से तात्पर्य जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन और इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। लोकतंत्र की संपूर्ण व्यवस्था इस सिद्धांत पर आधारित है कि शासन जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए होता है। संविधान, संसद, विधानसभाएं, न्यायपालिका, प्रशासन तथा जनप्रतिनिधि—सभी संस्थाएं जनता की इच्छा और जनादेश से अपनी वैधता प्राप्त करती हैं। ऐसे में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि लोकतंत्र में वास्तविक VIP (Very Important Person) कौन है—जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि या स्वयं जनता? यह प्रश्न केवल राजनीतिक विमर्श का विषय नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा, उसके चरित्र और उसके व्यावहारिक स्वरूप को समझने का आधार भी है।

सैद्धांतिक दृष्टि से इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत स्पष्ट है। लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है और जनप्रतिनिधि उसके सेवक होते हैं। भारत के संविधान की प्रस्तावना “हम भारत के लोग” शब्दों से प्रारंभ होती है, जो यह स्पष्ट करती है कि देश की समस्त राजनीतिक शक्ति और संवैधानिक वैधता का मूल स्रोत जनता है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक, मंत्री और अन्य जनप्रतिनिधि जनता द्वारा प्रदत्त अधिकारों के आधार पर अपने पदों पर आसीन होते हैं। वे जनता के स्वामी नहीं, बल्कि जनता के विश्वासपात्र और प्रतिनिधि हैं। किंतु व्यवहारिक स्तर पर स्थिति कई बार इसके विपरीत दिखाई देती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को सर्वोच्च माना जाता है, परंतु अनेक अवसरों पर ऐसा प्रतीत होता है कि जनप्रतिनिधि स्वयं को जनता से अधिक महत्वपूर्ण और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के रूप में देखने लगते हैं। यही वह स्थिति है जहां VIP संस्कृति जन्म लेती है और लोकतंत्र की मूल भावना से टकराव प्रारंभ हो जाता है।

आज भारत सहित विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों में VIP संस्कृति पर बहस चल रही है। VIP संस्कृति का अर्थ केवल विशेष सुरक्षा प्राप्त होना नहीं है, बल्कि उससे जुड़ी वह मानसिकता है जिसमें कुछ व्यक्तियों को सामान्य नागरिकों से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है और उनके लिए विशेष सुविधाएं, विशेष मार्ग, विशेष व्यवस्थाएं तथा विशेष व्यवहार सुनिश्चित किया जाता है। यह स्थिति तब और अधिक चिंताजनक हो जाती है जब इन व्यवस्थाओं का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव आम नागरिकों के जीवन पर पड़ने लगता है। विशेष रूप से यातायात व्यवस्था में इसका प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है।

हम अक्सर देखते हैं कि किसी मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, उच्चाधिकारी या अन्य विशिष्ट व्यक्ति के आवागमन के समय सड़कों को खाली करा दिया जाता है। कई बार यातायात को कुछ मिनटों के लिए रोका जाता है, तो कई बार लंबी अवधि तक सड़कें अवरुद्ध रहती हैं। हजारों वाहन रुक जाते हैं, नागरिक घंटों तक जाम में फंसे रहते हैं और अनेक आवश्यक कार्य बाधित हो जाते हैं। ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि लोकतंत्र में अधिक महत्वपूर्ण कौन है—वह जनप्रतिनिधि जिसे जनता ने चुना है या वह जनता जिसने उसे चुना है?

यातायात अवरोध केवल असुविधा का विषय नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा प्रश्न भी है। कल्पना कीजिए कि किसी अस्पताल में गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को ले जा रही एम्बुलेंस VIP मूवमेंट के कारण जाम में फंस जाए। किसी छात्र की महत्वपूर्ण परीक्षा हो और वह समय पर परीक्षा केंद्र न पहुंच पाए। किसी श्रमिक की दिनभर की मजदूरी केवल इसलिए नष्ट हो जाए क्योंकि वह समय पर कार्यस्थल तक नहीं पहुंच सका। किसी व्यापारी का महत्वपूर्ण व्यावसायिक अवसर छूट जाए या किसी मरीज की चिकित्सकीय स्थिति और गंभीर हो जाए। ऐसी परिस्थितियों में आम नागरिकों को होने वाली पीड़ा केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं रह जाती, बल्कि यह लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न बन जाती है।

लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक का समय समान रूप से मूल्यवान होना चाहिए। एक किसान, मजदूर, शिक्षक, छात्र, व्यापारी, चिकित्सक या कर्मचारी का समय उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी मंत्री या अधिकारी का। किंतु जब VIP संस्कृति के कारण हजारों लोगों को रोककर कुछ व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है, तब यह संदेश जाता है कि कुछ लोगों का समय अधिक मूल्यवान है और बाकी लोगों का कम। यह सोच लोकतंत्र की उस मूल अवधारणा के विरुद्ध है जो सभी नागरिकों को समान सम्मान और समान अधिकार प्रदान करती है।

वास्तव में जनप्रतिनिधि का अर्थ ही है जनता का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति। वह जनता का सेवक है, शासक नहीं। लोकतांत्रिक राजनीति का मूल उद्देश्य सत्ता का उपभोग नहीं, बल्कि जनसेवा है। महात्मा गांधी ने सार्वजनिक जीवन में सादगी, विनम्रता और सेवा को सर्वोच्च महत्व दिया था। उनका मानना था कि सत्ता का वास्तविक उद्देश्य लोगों की भलाई सुनिश्चित करना है, न कि विशेषाधिकारों का आनंद लेना। इसी प्रकार आधुनिक लोकतांत्रिक विचारधारा भी यही कहती है कि जनप्रतिनिधि जनता के बीच रहकर उनकी समस्याओं को समझे और उनके समाधान के लिए कार्य करे। यदि प्रतिनिधि स्वयं को जनता से ऊपर समझने लगे, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होने लगती है।

लोकतंत्र और राजतंत्र के बीच सबसे बड़ा अंतर भी इसी बिंदु पर आधारित है। राजतंत्र में राजा सर्वोच्च होता है और जनता उसकी प्रजा होती है। वहां शासन ऊपर से नीचे की ओर चलता है। इसके विपरीत लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है और शासन की शक्ति नीचे से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और समय आने पर उन्हें बदल भी सकती है। किंतु जब लोकतंत्र में VIP संस्कृति अत्यधिक प्रभावी हो जाती है, तब व्यवहारिक रूप से राजतांत्रिक मानसिकता के कुछ तत्व पुनः दिखाई देने लगते हैं। विशेषाधिकारों का प्रदर्शन, जनता से दूरी, सत्ता का दिखावा और अत्यधिक सुरक्षा घेरा कई बार लोकतांत्रिक संस्कृति के विपरीत संदेश देते हैं।

यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि सभी सुरक्षा व्यवस्थाएं अनावश्यक नहीं होतीं। कई जनप्रतिनिधियों को वास्तविक सुरक्षा खतरे हो सकते हैं। संवैधानिक पदों की गरिमा और राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से कुछ विशेष व्यवस्थाएं आवश्यक हो सकती हैं। समस्या सुरक्षा से नहीं, बल्कि उसके स्वरूप और प्रभाव से उत्पन्न होती है। यदि सुरक्षा व्यवस्था जनता के जीवन को अत्यधिक प्रभावित करने लगे, तो उसके स्वरूप की समीक्षा आवश्यक हो जाती है। लोकतांत्रिक दृष्टिकोण यह कहता है कि सुरक्षा और जनसुविधा के बीच संतुलन होना चाहिए। सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, लेकिन आम नागरिकों को न्यूनतम असुविधा हो। विशेष रूप से एम्बुलेंस, अग्निशमन सेवा और अन्य आपातकालीन वाहनों को किसी भी स्थिति में नहीं रोका जाना चाहिए।

विकसित लोकतंत्रों के अनुभव भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। अनेक देशों में जनप्रतिनिधि अपेक्षाकृत सरल जीवनशैली अपनाते हैं। वहां सार्वजनिक जीवन में सादगी और जवाबदेही को महत्व दिया जाता है। कई देशों में नेताओं के काफिले छोटे होते हैं और यातायात अवरोध को न्यूनतम रखा जाता है। वहां यह समझ विकसित की गई है कि जनता की सुविधा लोकतंत्र की प्राथमिकता होनी चाहिए। यह व्यवस्था इसलिए सफल है क्योंकि वहां राजनीतिक नेतृत्व स्वयं को जनता का सेवक मानने की संस्कृति को महत्व देता है।

VIP संस्कृति का प्रभाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी होता है। जब नागरिक बार-बार यह देखते हैं कि कुछ लोगों के लिए नियम अलग हैं और बाकी लोगों के लिए अलग, तब उनके मन में व्यवस्था के प्रति असमानता की भावना उत्पन्न होती है। इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास कमजोर हो सकता है। लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि नागरिक सम्मान की संस्कृति भी है। यदि नागरिक स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगें, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

आज का नागरिक पहले की तुलना में अधिक जागरूक और सूचनासंपन्न है। डिजिटल युग में लोग अपने अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अधिक सचेत हुए हैं। सोशल मीडिया और आधुनिक संचार माध्यमों ने नागरिकों को अपनी आवाज उठाने का अवसर प्रदान किया है। इसलिए अब लोग यह प्रश्न पूछने लगे हैं कि यदि जनता ही सत्ता का स्रोत है तो उसे ही सबसे अधिक कष्ट क्यों उठाना पड़े? यदि जनप्रतिनिधि जनता के सेवक हैं तो फिर उनके लिए जनता को क्यों रोका जाए? यदि संविधान सभी नागरिकों को समान मानता है तो व्यवहार में असमानता क्यों दिखाई देती है? ये प्रश्न लोकतंत्र के लिए चुनौती नहीं, बल्कि उसे और अधिक उत्तरदायी बनाने की दिशा में आवश्यक हस्तक्षेप हैं।

लोकतंत्र का नैतिक पक्ष भी इस विमर्श में अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र का आधार समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व जैसे मूल्यों पर टिका हुआ है। इन मूल्यों का अर्थ केवल कानूनी समानता नहीं, बल्कि सामाजिक और व्यवहारिक समानता भी है। जब कोई जनप्रतिनिधि स्वयं को जनता से ऊपर मानता है या व्यवस्था उसे ऐसा प्रदर्शित करती है, तब लोकतांत्रिक नैतिकता कमजोर पड़ती है। इसके विपरीत जब कोई नेता जनता के बीच सामान्य नागरिक की तरह व्यवहार करता है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है और नागरिकों का विश्वास बढ़ता है।

समाधान VIP संस्कृति को पूरी तरह समाप्त करने में नहीं, बल्कि उसे लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप पुनर्गठित करने में निहित है। सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक हो सकती है, किंतु उसे जनहित और जनसुविधा के साथ संतुलित किया जाना चाहिए। यातायात अवरोध को न्यूनतम किया जाए, काफिलों का आकार सीमित रखा जाए, तकनीक आधारित यातायात प्रबंधन विकसित किया जाए और आपातकालीन सेवाओं को पूर्ण प्राथमिकता दी जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व में सेवा, सादगी और जवाबदेही की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए।

अंततः लोकतंत्र का मूल सत्य यही है कि जनता ही सत्ता की वास्तविक स्वामिनी है। जनप्रतिनिधि जनता के विश्वास से शक्ति प्राप्त करते हैं और उसी के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इसलिए लोकतंत्र में वास्तविक VIP जनता ही है। जनप्रतिनिधियों का सम्मान आवश्यक है, किंतु वह सम्मान सेवा और उत्तरदायित्व के आधार पर होना चाहिए, विशेषाधिकार और श्रेष्ठताबोध के आधार पर नहीं। एक स्वस्थ और परिपक्व लोकतंत्र वही है जहां जनता को बाधा नहीं, प्राथमिकता मिले; जहां सत्ता का प्रदर्शन नहीं, सेवा का आदर्श दिखाई दे; और जहां जनप्रतिनिधि स्वयं को जनता का मालिक नहीं, बल्कि उसका उत्तरदायी सेवक समझें। लोकतंत्र की सफलता इसी में निहित है कि वह इस मूल सत्य को केवल संविधान के पन्नों तक सीमित न रखे, बल्कि उसे व्यवहार और प्रशासनिक संस्कृति का अभिन्न अंग बनाए। अतः लोकतंत्र की आत्मा यही कहती है कि जनप्रतिनिधि जनता के सेवक हैं और जनता ही लोकतंत्र की वास्तविक VIP है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि वह इस मूल सत्य को व्यवहार में कितना उतार पाती है और व्यवस्था को चलाने वाली सरकारें इस बात पर कितना अमल करती है। एक श्रेष्ठ और स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज व राष्ट्र के लिए जनता प्रथम का ध्येय होना ही लोकतंत्र की सच्ची सफलता है।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा

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