
भारत बहुवर्णी विशेषताओं का देश है। मात्र भाषा, संस्कृति, खानपान, जलवायु आदि ही नहीं बल्कि यहां की राजनीति भी बहुवर्णी है। ‘अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग’ को पूर्णतः चरितार्थ होते देखना है तो भारतीय राजनीति पर दृष्टिपात करना समीचीन होगा। स्वतंत्रता को भले ही आज 78 वर्ष बीत गए हों, लेकिन राजनीति आज तक देश को उन्नति की ओर ले जाने वाला सम्यक दृष्टिकोण नहीं रख सकी है।
स्वतंत्रता के पश्चात राजनेताओं को चिंता रही तो बस समाज की मुख्य धारा से दूर रह रहे लोगों को जोड़ने की। इसके लिए आरक्षण, भाषाई विवाद, अल्पसंख्यकों के लिए विशेष सुविधाएं, धारा 370 इत्यादि की व्यवस्था की गई। अब इससे कितने लोग समाज की मुख्य धारा में जुड़े और उन्होंने देश की उन्नति में क्या योगदान दिया, यह एक वृहद शोध का विषय हो सकता है। हां, राष्ट्र को ‘गुड़ का पूआ’ समझने की मानसिकता अवश्य विकसित होती गई। वामपंथी विचारधारा ने इस गुण के पूए पर मेवे छिड़कने का कार्य किया। स्वाभाविक है कि इन कार्यों से देश की उन्नति न होनी थी, ना हुई। देश का नन्हा सा कोष अवश्य खाली होता रहा और बढ़ती जनसंख्या के बोझ से प्राकृतिक संसाधन नष्ट हुए वह अलग।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह चिंता ही नहीं वरन चिंतन का भी विषय है कि विशेष सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों एवं समुदायों से ही राष्ट्रद्रोह के स्वर क्यों उठते रहे हैं? कारण है भारत में दी जाने वाली धर्मनिरपेक्षता की शिक्षा। इतिहास, समाजशास्त्र क्या शिक्षा के किसी भी क्षेत्र में देख लीजिए भारत को अंधविश्वासी, रूढ़िवादी और कुरीतियों का घर बताए जाने की होड़ रही है। यदि और गहराई में जाएं तो यह दुराग्रही दृष्टिकोण भारत नहीं वरन सनातन धर्म के प्रति दिखाई पड़ता है। अब पुनः राजनीति की ओर मुड़ते हैं।
राजनीति में सनातन विरोधी लहर कब और कहां से शुरू हुई, कहां नहीं जा सकता। हां, नेहरू द्वारा पोषित धर्मनिरपेक्षता, दक्षिण भारत में उभरे हिंदी विरोध, वामपंथी राजनीति और शोषित वर्ग का रहनुमा बनने की राजनीतिक दलों की होड़ में इसकी स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती है। सनातन के प्रति वैमनस्य इस सीमा तक बढ़ा कि पीढ़ियों पहले स्वेच्छा से धर्मांतरण करने वाले भी इसके पीछे सनातन धर्म को जिम्मेदार ठहराने लगे। यहां एक तथ्य ध्यातव्य है कि सनातन के धुर विरोधियों में से एक भी राजनेता का सनातनी मान्यता से कोई संबंध नहीं दिखता। चाहे वामपंथी राजनीति हो या अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण की राजनीति, पूंजीपतियों की पक्षधर उपभोक्तावादी राजनीति हो या समाज में विष घोलने वाली समाजवादी राजनीति, प्रारंभ से ही सभी के निशाने पर सनातन धर्म रहा।
अत्यंत आश्चर्यजनक है कि मुट्ठी भर लोगों को केंद्र में रखकर राजनीति करने वाले दल बहुसंख्यक सनातनियों को स्वतंत्रता के बाद से ही अनदेखा करते आ रहे हैं। कारण जानने के लिए हमें स्वतंत्रता संग्राम की भूमिका देखनी होगी। महात्मा गांधी ने देश को स्वतंत्र करते समय जाति- पाँति की दीवार खड़ी करने के लिए परोक्ष रूप से सनातन धर्म को उत्तरदाई ठहराया और इसी नींव पर स्वाधीनता आंदोलन की इमारत खड़ी की। आज गांधी को गालियां देने वाले राजनीतिक दल भी अपनी राजनीति चलाने के लिए इसी ‘गांधी सूत्र’ का प्रयोग कर रहे हैं। क्या एक बार भी इन राजनेताओं ने ठहरकर सोचा कि देश में समानता की बात करके वह जिस जाति- पांति की विदाई का दम भर रहे हैं, उस जाति प्रमाण पत्र को सरकारी कार्यालय में ही बनाया जाता है। कोई भी विदेशी समाजशास्त्री इसे शायद सबसे बड़ा चुटकुला कहेगा कि भारत में जाति व्यवस्था का विरोध करने वाले राजनीतिक दल ही आरक्षण के एकमात्र पोषक हैं।
कारण स्पष्ट है। बहुसंख्यक सनातनी ना तो अपनी शक्ति को पहचान पा रहे हैं और ना ही अपनी आवाज उठा रहे हैं। यहां तक कि सनातनी आस्था का केंद्र गंगा, गाय, हिमालय, मंदिर आदि सभी का व्यवसायीकरण होते, उनको क्षति पहुंचते सभी सनातनी देख रहे हैं किंतु आधुनिकता का नशा इस सीमा तक मन मस्तिष्क पर छाया है कि सनातनी लोग कुछ बोल तक नहीं रहे। एक तरफ प्रदूषण की हाय-हाय है, दूसरी तरफ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की धरती से लाल जल निकल रहा है क्योंकि गो वध के बाद सारा रक्त भूमि के भीतर पहुंचा जा रहा है। गो मांस के अवशेष संपूर्ण वातावरण को दुर्गंध एवं रोगों से भर रहे हैं। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि समलैंगिकता पर बिल पास करते समय सभी राजनीतिक दल एक हो जाते हैं और गाय की रक्षा के पक्ष में किसी राजनेता का हाथ तक नहीं उठता। अधिसंख्य हिंदू भी मात्र इतने में ही जीवन धन्य समझ रहे हैं कि मंदिर बन गया। गाय, जो अनादि काल से सनातन के केंद्र में है, की रक्षार्थ कोई सनातनी चर्चा तक नहीं करता।
ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बार-बार गौ रक्षा की बात उठाते हैं किंतु सनातनी विचारधारा के धुर विरोधी राजनेता मंदिर बन जाने का एहसान जनता पर लादकर ध्यान बंटा देते हैं। आज शिक्षित जनता का भी अपनी जड़ों, अपने इतिहास, अपने संस्कारों की ओर ध्यान न देकर मात्र आधुनिकता की दौड़ में अंधे होकर भागना चिंतनीय है। यदि ध्यान से देखें तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का यह गौ रक्षा आंदोलन केवल एक आंदोलन नहीं है, यह राजनीति के नए अध्याय की भूमिका है। सो रहे सनातनियों को झकझोर कर जगाने का क्रांतिकारी प्रयास है, देश की विचारधारा को एक नवीन दिशा में मोड़ने का भगीरथ प्रयत्न है, जिससे सनातनी राजनीति रूपी गंगा की धारा निश्चित ही निकलेगी। इधर आद्य शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित चारों पीठों के शंकराचार्यों की सनातनी जनता के बीच अति सक्रियता बता रही है कि सनातनी राजनीति का प्रारंभ होकर रहेगा। लंबे समय से सनातनी विचारधारा को अंधविश्वासी, रूढ़िवादी, पिछड़ा और न जाने क्या-क्या कहकर हाशिए पर डाल दिया गया, आज वह पुनः अंगड़ाई लेती दिखाई दे रही है। शिक्षित वर्ग के बीच उनकी लोकप्रियता सरस्वती की धारा के समान दृष्टिगोचर भले ही ना हो किंतु महाराष्ट्र में गौ माता को राज्य माता घोषित किया जाना तथा उत्तर प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के तमाम गांव से गौ माता के पक्ष में स्वर उठना और उन्हें ग्राम माता घोषित करना, यहां तक कि देश के प्रमुख व्यक्तित्वों का स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से समय-समय पर दिशा निर्देश प्राप्त करना यह बता रहा है कि राजनीति की गाड़ी का गियर शीघ्र ही बदलने जा रहा है।



