
स्वामी विवेकानंद भारतीय चिंतन-परंपरा के ऐसे विराट व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने अध्यात्म को एकांत साधना और व्यक्तिगत मोक्ष की सीमाओं से निकालकर समाज, मानवता और राष्ट्र के व्यापक धरातल पर प्रतिष्ठित किया। उनका जीवन और विचार इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि सच्ची आध्यात्मिकता पलायन नहीं, बल्कि सक्रिय सहभागिता है; वह आत्मा की शांति के साथ-साथ समाज के दुःखों के प्रति संवेदनशील उत्तरदायित्व की मांग करती है। विवेकानंद के दर्शन में सेवा, करुणा और मानव-कल्याण कोई गौण विषय नहीं, बल्कि अध्यात्म की केन्द्रीय धुरी हैं। उन्होंने जिस सेवा-चेतना का प्रतिपादन किया, उसने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को एक नया सामाजिक आयाम प्रदान किया और उसे आधुनिक युग की चुनौतियों से साक्षात्कार करने योग्य बनाया।
उन्नीसवीं शताब्दी का भारत सामाजिक, आर्थिक और मानसिक दासता से ग्रस्त था। एक ओर औपनिवेशिक शोषण ने देश की आत्मा को कुंठित कर दिया था, तो दूसरी ओर धार्मिक कर्मकांड, जातिवाद और अंधविश्वास ने समाज को जकड़ रखा था। ऐसे समय में विवेकानंद का उदय केवल एक संन्यासी के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक चिंतक और मानवतावादी दार्शनिक के रूप में हुआ। उन्होंने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से आत्मानुभूति और करुणा का पाठ सीखा, किंतु उसे समाज से काटकर नहीं रखा। विवेकानंद के लिए आत्मज्ञान तभी सार्थक था, जब वह मानव-दुःख के निवारण में रूपांतरित हो।
विवेकानंद की आध्यात्मिकता का मूल आधार वेदांत था, विशेषतः अद्वैत वेदांत, जो समस्त सृष्टि में एक ही ब्रह्म की सत्ता को स्वीकार करता है। यदि सबमें एक ही आत्मा विद्यमान है, तो किसी भी मनुष्य का अपमान, शोषण या उपेक्षा स्वयं अपनी आत्मा का अपमान है। इसी तर्क से विवेकानंद ने सेवा को पूजा और करुणा को साधना का रूप दिया। उनका प्रसिद्ध कथन कि “जिस ईश्वर को तुम मंदिरों में खोजते हो, वह भूखे के पेट में और पीड़ित की कराह में विद्यमान है,” भारतीय समाज के लिए एक वैचारिक झटका था। इस कथन ने धर्म के पारंपरिक ढांचे को तोड़ा और उसे मानवीय धरातल पर पुनर्स्थापित किया।
विवेकानंद के सेवा-दर्शन का सबसे प्रभावशाली रूप ‘दरिद्र नारायण’ की अवधारणा में दिखाई देता है। उन्होंने समाज के सबसे वंचित, गरीब और शोषित वर्ग को नारायण, अर्थात ईश्वर, के रूप में देखने का आग्रह किया। यह दृष्टि केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि सम्मान और समानता की भावना से प्रेरित थी। उनके लिए गरीब कोई दया का पात्र नहीं, बल्कि सेवा का अवसर और आत्म-साक्षात्कार का माध्यम था। इस प्रकार सेवा केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना बन जाती है, जिसमें सेवक और सेवित का भेद मिटने लगता है।
विवेकानंद ने धर्म को निष्क्रियता और पलायन से मुक्त किया। वे उस प्रकार की आध्यात्मिकता के कटु आलोचक थे, जो व्यक्ति को संसार से विमुख कर देती है और सामाजिक अन्याय के प्रति मौन साध लेती है। उनके अनुसार वह धर्म, जो भूखे को रोटी न दे सके और अशिक्षित को ज्ञान न दे सके, निरर्थक है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पहले मनुष्य बनो, फिर धार्मिक बनो। यह कथन उनके मानववादी दृष्टिकोण को उजागर करता है, जिसमें मानव-कल्याण सर्वोपरि है और धर्म उसका साधन मात्र।
उनकी सेवा-चेतना केवल भावनात्मक अपील तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसने संस्थागत रूप भी ग्रहण किया। रामकृष्ण मिशन की स्थापना इसी विचार का प्रतिफल है। यह संस्था शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा-राहत और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में सक्रिय होकर विवेकानंद के दर्शन को व्यवहार में उतारती है। रामकृष्ण मिशन का आदर्श वाक्य—“आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च”—व्यक्ति की आत्म-मुक्ति और जगत के कल्याण के समन्वय को अभिव्यक्त करता है। यह सूत्र विवेकानंद की उस सोच को मूर्त रूप देता है, जिसमें व्यक्तिगत साधना और सामाजिक सेवा एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।
विवेकानंद की करुणा-दृष्टि केवल भारत तक सीमित नहीं थी। शिकागो के विश्व धर्म संसद में उनके भाषण ने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि भारतीय अध्यात्म संकीर्णता नहीं, बल्कि सार्वभौमिक मानवता का पक्षधर है। उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता, आपसी सम्मान और वैश्विक भाईचारे की बात की, किंतु साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इन आदर्शों की वास्तविकता तब तक अधूरी है, जब तक वे मानव-सेवा में परिणत न हों। उनके लिए करुणा एक वैश्विक मूल्य थी, जो सीमाओं, जातियों और धर्मों से परे मानव को मानव से जोड़ती है।
विवेकानंद की सेवा-चेतना में युवाओं की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। वे युवाओं को देश की सोई हुई शक्ति मानते थे और उनसे आह्वान करते थे कि वे अपने जीवन को केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं तक सीमित न रखें। उनका संदेश था कि युवा शक्ति का वास्तविक उपयोग समाज की पीड़ा को दूर करने में है। सेवा के माध्यम से ही युवा अपने चरित्र का निर्माण कर सकते हैं और राष्ट्र के पुनर्निर्माण में सहभागी बन सकते हैं। इस प्रकार विवेकानंद की आध्यात्मिकता निष्क्रिय साधकों की नहीं, बल्कि कर्मशील युवाओं की आध्यात्मिकता है।
उनकी करुणा सामाजिक न्याय की चेतना से भी जुड़ी हुई थी। वे जाति-व्यवस्था, अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव के प्रबल आलोचक थे। उन्होंने देखा कि कैसे धर्म के नाम पर मानव को मानव से अलग किया गया है। इसलिए उन्होंने ऐसे धर्म की वकालत की, जो समानता, गरिमा और मानवाधिकारों का समर्थक हो। उनकी दृष्टि में सेवा का अर्थ केवल तात्कालिक सहायता नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक संरचना का निर्माण है, जिसमें शोषण और अन्याय के लिए कोई स्थान न हो।
विवेकानंद के लिए शिक्षा भी सेवा का एक महत्त्वपूर्ण रूप थी। वे मानते थे कि अज्ञान सबसे बड़ा अभिशाप है और शिक्षा ही वह साधन है, जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर और समाज को सशक्त बना सकती है। उनकी शिक्षा-दृष्टि में करुणा निहित थी, क्योंकि वह समाज के वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने का माध्यम थी। इस प्रकार शिक्षा, सेवा और आध्यात्मिकता उनके विचारों में एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई थीं।
विवेकानंद की सेवा-आधारित आध्यात्मिकता आधुनिक भारत के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। आज जब उपभोक्तावाद, स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा ने मानवीय संबंधों को कमजोर कर दिया है, विवेकानंद का संदेश हमें स्मरण कराता है कि सच्चा विकास केवल आर्थिक प्रगति में नहीं, बल्कि करुणा और मानवीय मूल्यों के विस्तार में निहित है। उनकी दृष्टि में समाज का मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि वह अपने सबसे कमजोर सदस्य के साथ कैसा व्यवहार करता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि विवेकानंद की सेवा-चेतना आत्मविस्मृति की नहीं, बल्कि आत्मबोध की प्रक्रिया है। सेवा करते हुए व्यक्ति अपने अहंकार का त्याग करता है और व्यापक आत्मा से जुड़ता है। इस अर्थ में सेवा स्वयं साधक को भी रूपांतरित करती है। यह द्विमुखी प्रक्रिया है, जिसमें सेवित को सहारा मिलता है और सेवक को आध्यात्मिक ऊँचाई प्राप्त होती है। यही कारण है कि विवेकानंद सेवा को साधना का सर्वोच्च रूप मानते हैं।
विवेकानंद ने भारतीय अध्यात्म को जिस प्रकार सामाजिक यथार्थ से जोड़ा, वह उन्हें परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु बनाता है। वे परंपरा से प्रेरणा लेते हैं, किंतु जड़ता को अस्वीकार करते हैं। उनका अध्यात्म जीवन-विरोधी नहीं, बल्कि जीवन-पोषक है। वह दुःख से मुँह मोड़ने के बजाय उसे दूर करने का साहस देता है। यही साहस उनकी सेवा-चेतना का मूल है।
अंततः स्वामी विवेकानंद का दर्शन हमें यह सिखाता है कि आध्यात्मिकता का वास्तविक मूल्य तभी है, जब वह समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाए। सेवा-चेतना के माध्यम से उन्होंने अध्यात्म को मंदिरों और आश्रमों की सीमाओं से निकालकर जीवन के हर क्षेत्र में स्थापित किया। उनकी करुणा केवल भावना नहीं, बल्कि क्रियाशील संकल्प है। यही कारण है कि विवेकानंद आज भी प्रासंगिक हैं—एक ऐसे विचारक के रूप में, जिन्होंने मानव-सेवा को ईश्वर-सेवा और समाज-रूपांतरण को आध्यात्मिक साधना का अनिवार्य अंग बना दिया।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा



