“महादेव गोविंद रानाडे: सामाजिक सुधार, स्त्री-उत्थान और आधुनिक भारत के नैतिक पुनर्निर्माण के अग्रदूत”
डॉ प्रमोद कुमार

महादेव गोविंद रानाडे भारतीय नवजागरण के उन विराट व्यक्तित्वों में से थे जिनके चिंतन और कर्म ने उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय समाज को आत्मालोचन, सुधार और नैतिक पुनर्निर्माण की दिशा में प्रेरित किया। 1842 में नासिक में जन्मे रानाडे का जीवन उस संक्रमणकाल का प्रतिनिधित्व करता है जब परंपरा और आधुनिकता, धर्म और विवेक, समाज और राज्य—इन सभी के बीच नए संतुलन की खोज की जा रही थी। वे केवल एक समाज सुधारक या न्यायाधीश भर नहीं थे, बल्कि वे भारतीय समाज की अंत:चेतना को जगाने वाले ऐसे विचारक थे जिन्होंने सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध तर्क, करुणा और संवैधानिक नैतिकता के आधार पर संघर्ष किया। उनका व्यक्तित्व संयम, उदारता और विवेक का संगम था, जो उग्रता के बजाय क्रमिक सुधार में विश्वास करता था।
रानाडे के चिंतन का केंद्रीय बिंदु मानव गरिमा था। उन्होंने समाज की जड़ता को धर्म की आड़ में चलने वाली कुप्रथाओं के रूप में पहचाना और यह स्थापित किया कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मानवता का कल्याण है, न कि सामाजिक अन्याय का संरक्षण। बाल विवाह, विधवाओं के साथ अमानवीय व्यवहार और स्त्रियों की शिक्षा से वंचना—ये सभी उनके लिए केवल सामाजिक समस्याएँ नहीं थीं, बल्कि नैतिक विफलताएँ थीं। इसी दृष्टि से उन्होंने 1861 में विधवा विवाह संघ के संस्थापक सदस्यों में स्थान ग्रहण किया और विधवा पुनर्विवाह को सामाजिक स्वीकृति दिलाने के लिए निर्भीक होकर कार्य किया। उस समय जब विधवाओं का जीवन कठोर नियमों और अपमान से घिरा था, रानाडे का पक्ष मानवीय करुणा और सामाजिक न्याय का पक्ष था।
स्त्री-उत्थान के संदर्भ में रानाडे का दृष्टिकोण अत्यंत प्रगतिशील था। वे स्त्री को केवल परिवार की परिधि में सीमित मानने की सोच के विरोधी थे। उनके लिए स्त्री शिक्षा समाज के नैतिक और बौद्धिक उत्थान की अनिवार्य शर्त थी। उनका विश्वास था कि शिक्षित स्त्री न केवल अपने जीवन को गरिमामय बना सकती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी विवेकशील और नैतिक नागरिक बना सकती है। इसी कारण उन्होंने स्त्री शिक्षा के प्रसार के लिए निरंतर प्रयास किए और सामाजिक मंचों पर इसके समर्थन में सशक्त तर्क प्रस्तुत किए। उनके जीवन में यह विश्वास केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक कर्मों में भी परिलक्षित हुआ।
रानाडे प्रार्थना समाज के सक्रिय सदस्य थे, जहाँ उन्होंने धार्मिक सुधार को सामाजिक सुधार से जोड़ा। प्रार्थना समाज का उद्देश्य ईश्वर-भक्ति को नैतिक जीवन से जोड़ना और कर्मकांडों के स्थान पर विवेक, नैतिकता और सामाजिक दायित्व को महत्व देना था। रानाडे ने यहाँ यह स्पष्ट किया कि धर्म का अर्थ समाज से विमुख होना नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाना है। उनके अनुसार सच्ची भक्ति वही है जो अन्याय के विरुद्ध खड़ी हो और दुर्बलों के पक्ष में बोलने का साहस रखे। इस प्रकार उन्होंने धार्मिक चेतना को मानवीय संवेदना से जोड़ा।
1870 में पूना सार्वजनिक सभा के माध्यम से रानाडे ने जनता और सरकार के बीच संवाद स्थापित करने का ऐतिहासिक प्रयास किया। यह सभा भारतीय नागरिक समाज के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी, जहाँ जनहित के मुद्दों पर विचार-विमर्श होता था और सरकार तक जनमत पहुँचाया जाता था। रानाडे का विश्वास था कि सुशासन के लिए जनता की भागीदारी आवश्यक है और बिना संवाद के शासन जनविरोधी हो सकता है। इस मंच के माध्यम से उन्होंने संवैधानिक तरीकों से सुधार की परंपरा को सुदृढ़ किया और यह दिखाया कि आलोचना और सहयोग साथ-साथ चल सकते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में भी रानाडे का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। डक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना में उनकी भूमिका यह दर्शाती है कि वे शिक्षा को केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण और नागरिक चेतना का आधार मानते थे। उनके लिए शिक्षा का उद्देश्य स्वतंत्र चिंतन, सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक साहस का विकास था। वे मानते थे कि विदेशी शासन की परिस्थितियों में भी यदि भारतीय समाज को सशक्त बनना है तो उसे आधुनिक शिक्षा के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना होगा। यही संतुलन उनके शैक्षिक दृष्टिकोण की विशेषता थी।
1887 में भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन की स्थापना रानाडे के सामाजिक चिंतन का संगठित रूप थी। इस सम्मेलन के माध्यम से उन्होंने सामाजिक सुधारों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है जब तक समाज आंतरिक रूप से न्यायपूर्ण और समतामूलक न बने। सामाजिक सम्मेलन में बाल विवाह निषेध, स्त्री शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और जातिगत भेदभाव जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई। रानाडे ने यहाँ यह स्पष्ट किया कि समाज सुधार कोई विदेशी विचार नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा के भीतर निहित मानवीय मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा है।
1893 में बांबे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति ने रानाडे को विधि और न्याय के क्षेत्र में भी व्यापक प्रभाव का अवसर दिया। न्यायाधीश के रूप में उनका आचरण निष्पक्षता, संवेदनशीलता और संवैधानिक नैतिकता का उदाहरण था। वे कानून को केवल दंड का उपकरण नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का साधन मानते थे। उनके निर्णयों और विधिक दृष्टिकोण में मानवीय पक्ष स्पष्ट रूप से झलकता था। इस भूमिका में भी उन्होंने समाज सुधारक के रूप में अपनी प्रतिबद्धता को बनाए रखा।
रानाडे की विचारधारा की एक प्रमुख विशेषता उनका क्रमिक सुधार में विश्वास था। वे उग्र क्रांति या अचानक परिवर्तन के पक्षधर नहीं थे। उनका मानना था कि समाज की जड़ें गहरी होती हैं और स्थायी परिवर्तन संवाद, शिक्षा और नैतिक समझ के माध्यम से ही संभव है। इस दृष्टि से वे उदारवादी थे, किंतु उनका उदारवाद नैतिक दृढ़ता से युक्त था। वे अन्याय के प्रति समझौता नहीं करते थे, बल्कि विवेकपूर्ण ढंग से उसका प्रतिकार करते थे।
आधुनिक भारत के नैतिक पुनर्निर्माण में रानाडे की भूमिका इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने राष्ट्र-निर्माण को केवल राजनीतिक परियोजना नहीं माना। उनके लिए राष्ट्र का अर्थ था—नैतिक नागरिकों का समुदाय, जहाँ स्त्री-पुरुष, धनी-निर्धन, ऊँच-नीच के भेद के बिना मानवीय गरिमा का सम्मान हो। उन्होंने यह स्थापित किया कि सामाजिक सुधार और राजनीतिक चेतना एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना सामाजिक न्याय के स्वतंत्रता खोखली है और बिना नैतिकता के प्रगति दिशाहीन।
रानाडे का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा सुधारक वही है जो विचार और कर्म, आदर्श और व्यवहार के बीच सेतु बनाता है। उन्होंने व्यक्तिगत आचरण में भी वही मूल्य अपनाए जिनका वे सार्वजनिक जीवन में प्रचार करते थे। यही कारण है कि उनका प्रभाव उनके समय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आगे की पीढ़ियों के समाज सुधारकों, शिक्षाविदों और राष्ट्रनिर्माताओं को प्रेरित करता रहा।
आज के संदर्भ में महादेव गोविंद रानाडे की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। जब समाज फिर से अनेक प्रकार की असमानताओं, रूढ़ियों और नैतिक संकटों से जूझ रहा है, तब रानाडे का विवेकपूर्ण, मानवीय और संवैधानिक सुधारवाद हमें संतुलित मार्ग दिखाता है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि नैतिक साहस, बौद्धिक स्पष्टता और सामाजिक करुणा के माध्यम से ही किसी समाज का वास्तविक उत्थान संभव है। इस दृष्टि से रानाडे न केवल अपने युग के अग्रदूत थे, बल्कि आधुनिक भारत के नैतिक पुनर्निर्माण के स्थायी प्रकाशस्तंभ भी हैं।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा


