“विकसित भारत की समग्र दृष्टि: ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति-मानवता, बहुभाषिक क्षमता और राष्ट्रभावना का समन्वय”
डॉ प्रमोद कुमार

भारत को सचमुच विकसित राष्ट्र बनाना केवल आर्थिक आँकड़ों, ऊँची इमारतों, तेज़ रफ्तार सड़कों या आधुनिक हथियारों से संभव नहीं है, बल्कि यह एक गहन बौद्धिक, सांस्कृतिक, नैतिक और मानवीय प्रक्रिया है। विकास का वास्तविक अर्थ तब साकार होता है जब राष्ट्र के नागरिक ज्ञान और विज्ञान से संपन्न हों, संस्कृति और मानवता से जुड़े हों, अनुसंधान और प्रौद्योगिकी में अग्रणी हों तथा स्वदेशी निर्माण और राष्ट्रभावना को अपने आचरण में उतारें। भारत जैसे प्राचीन सभ्यता वाले देश के लिए विकास की परिभाषा और भी व्यापक हो जाती है, क्योंकि यहाँ केवल भविष्य की नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की विरासत और अनुभव की जिम्मेदारी भी हमारे कंधों पर है। यदि भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनाना है तो हमें विकास के भौतिक और मानसिक दोनों आयामों को समान महत्व देना होगा।
ज्ञान और विज्ञान किसी भी राष्ट्र की बौद्धिक रीढ़ होते हैं। इतिहास साक्षी है कि जिन सभ्यताओं ने ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया, वे ही दीर्घकाल तक मानवता का मार्गदर्शन कर सकीं। भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा वेदों, उपनिषदों, बौद्ध और जैन दर्शन, नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों के माध्यम से विश्व को दिशा देती रही है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम उस परंपरा को केवल अतीत की गौरवगाथा के रूप में न देखें, बल्कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ उसका समन्वय करें। विज्ञान हमें तर्क, प्रयोग और प्रमाण की दृष्टि देता है, जबकि ज्ञान हमें विवेक, नैतिकता और उद्देश्य प्रदान करता है। जब ज्ञान और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, तभी सृजनात्मक और सतत विकास संभव होता है। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए शिक्षा प्रणाली को इस तरह रूपांतरित करना होगा कि वह केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित न रहे, बल्कि नवाचार, अनुसंधान और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करे।
संस्कृति और मानवता विकास की आत्मा हैं। कोई भी राष्ट्र यदि केवल आर्थिक रूप से समृद्ध हो, लेकिन मानवीय मूल्यों से रिक्त हो, तो उसका विकास अधूरा और अस्थायी होता है। भारतीय संस्कृति का मूल तत्व ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना है, जो संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान करती है। करुणा, सहिष्णुता, सह-अस्तित्व और अहिंसा जैसे मूल्य भारत की सांस्कृतिक चेतना के केंद्र में रहे हैं। विकसित राष्ट्र बनने की दौड़ में यदि हम इन मूल्यों को भूल जाते हैं, तो हम अपनी आत्मा से कट जाएंगे। मानवता के प्रति संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता, समावेशन और कमजोर वर्गों के प्रति उत्तरदायित्व किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति के मापक होते हैं। भारत की विविधता—भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्र और परंपराओं की विविधता—हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। इस विविधता को सम्मान और संवाद के माध्यम से एकता में पिरोना ही सच्चा राष्ट्रनिर्माण है।
अनुसंधान और प्रौद्योगिकी आज के युग में विकास के प्रमुख इंजन हैं। वैश्विक परिदृश्य में वही देश अग्रणी हैं जिन्होंने अनुसंधान को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया। भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन लंबे समय तक अनुसंधान को पर्याप्त महत्व और संसाधन नहीं मिले। अब समय आ गया है कि अनुसंधान को केवल अकादमिक आवश्यकता न मानकर राष्ट्र निर्माण का आधार बनाया जाए। स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, पर्यावरण, रक्षा, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जैव प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में स्वदेशी अनुसंधान भारत को आत्मनिर्भर और सशक्त बना सकता है। प्रौद्योगिकी का उद्देश्य केवल सुविधा और लाभ नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान होना चाहिए। जब तकनीक मानव कल्याण से जुड़ती है, तभी वह सार्थक बनती है। भारत के स्टार्टअप्स, वैज्ञानिक संस्थान और युवा शोधकर्ता यदि राष्ट्रीय जरूरतों के अनुरूप नवाचार करें, तो भारत विश्व को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि समाधान प्रदाता बन सकता है।
स्वदेशी निर्माण और आत्मनिर्भरता विकसित राष्ट्र की अनिवार्य शर्त है। इतिहास बताता है कि जो राष्ट्र अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं, वे संकट के समय असहाय हो जाते हैं। स्वदेशी का अर्थ केवल वस्तुओं का देश में निर्माण नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और आर्थिक स्वतंत्रता है। जब हम स्वदेशी उत्पादों को अपनाते हैं, तो हम न केवल अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि स्थानीय कारीगरों, किसानों, श्रमिकों और उद्यमियों को सम्मान और रोजगार भी प्रदान करते हैं। महात्मा गांधी ने स्वदेशी को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक आंदोलन के रूप में देखा था। आज के संदर्भ में स्वदेशी का अर्थ है आधुनिक तकनीक के साथ गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, वैश्विक मानकों के अनुरूप प्रतिस्पर्धा और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी। आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी साकार होगा जब स्वदेशी निर्माण को नीति, शिक्षा और उपभोग की संस्कृति का हिस्सा बनाया जाएगा।
राष्ट्रभावना किसी भी विकास यात्रा की प्रेरक शक्ति होती है। राष्ट्रभावना का अर्थ संकीर्ण राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि अपने देश, समाज और भविष्य के प्रति जिम्मेदारी की भावना है। जब नागरिक अपने कर्तव्यों को उतनी ही गंभीरता से निभाते हैं जितनी वे अपने अधिकारों की अपेक्षा करते हैं, तभी राष्ट्र मजबूत बनता है। ईमानदारी, अनुशासन, सार्वजनिक संपत्ति के प्रति सम्मान, कानून का पालन और सामाजिक उत्तरदायित्व राष्ट्रभावना के व्यावहारिक रूप हैं। यदि हम केवल सरकार या व्यवस्था को दोष देते रहें, लेकिन स्वयं अपने आचरण में परिवर्तन न लाएँ, तो विकास केवल नारा बनकर रह जाएगा। राष्ट्रभावना तब सशक्त होती है जब नागरिक यह समझते हैं कि उनका छोटा-सा योगदान भी देश की दिशा बदल सकता है।
भाषा संचार का माध्यम है और किसी भी समाज की चेतना की वाहक होती है। मातृभाषा में सोचने, समझने और अभिव्यक्त करने की क्षमता व्यक्ति को आत्मविश्वास और सृजनशीलता प्रदान करती है। मातृभाषा में शिक्षा न केवल ज्ञान को सहज बनाती है, बल्कि संस्कृति और मूल्यों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी संप्रेषित करती है। इसलिए मातृभाषा सदैव प्राथमिकता में रहनी चाहिए। भारत जैसे बहुभाषी देश में प्रत्येक भाषा अपने साथ एक विशिष्ट दृष्टिकोण और अनुभव लेकर आती है। मातृभाषाओं का संरक्षण और संवर्धन केवल भाषाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक विविधता का संरक्षण है। विकसित राष्ट्र वही होता है जो अपनी भाषाओं पर गर्व करता है, न कि उन्हें हीन भावना से देखता है।
लेकिन केवल मातृभाषा तक सीमित रहना आज के वैश्विक युग में पर्याप्त नहीं है। वैश्विक संवाद, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, व्यापार, विज्ञान और कूटनीति के लिए अन्य विकसित राष्ट्रों की भाषाओं का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। कम से कम चार अन्य विकसित देशों की भाषाओं का ज्ञान भारतीय नागरिकों को वैश्विक मंच पर अधिक प्रभावी बना सकता है। भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि उस समाज की सोच, संस्कृति और कार्यशैली को समझने की कुंजी होती है। जब हम अन्य भाषाएँ सीखते हैं, तो हम केवल संवाद नहीं करते, बल्कि दृष्टिकोण का विस्तार करते हैं। बहुभाषी नागरिक अधिक लचीले, सहिष्णु और नवाचारी होते हैं। यह क्षमता भारत को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में अग्रणी बना सकती है।
भाषाई बहुलता भारत की शक्ति बन सकती है, यदि हम इसे सही दिशा में विकसित करें। मातृभाषा में मजबूत आधार और विदेशी भाषाओं में दक्षता—यह संयोजन भारतीय युवाओं को वैश्विक नागरिक बनाते हुए भी भारतीय मूल्यों से जोड़े रख सकता है। इससे भारत न केवल ज्ञान का आयात करेगा, बल्कि ज्ञान का निर्यात भी करेगा। भारतीय विचार, दर्शन, योग, आयुर्वेद, विज्ञान और तकनीक जब बहुभाषी माध्यमों से विश्व तक पहुँचेंगे, तब भारत की सॉफ्ट पावर और प्रभावशीलता कई गुना बढ़ जाएगी।
एक भारत, श्रेष्ठ भारत और अखंड भारत की अवधारणा केवल भौगोलिक एकता की नहीं, बल्कि भावनात्मक, सांस्कृतिक और वैचारिक एकता की है। यह एकता विविधताओं के सम्मान पर आधारित होनी चाहिए, न कि उन्हें दबाने पर। जब प्रत्येक नागरिक स्वयं को राष्ट्र की मुख्यधारा का हिस्सा महसूस करता है, तब अखंडता स्वतः सुदृढ़ होती है। श्रेष्ठ भारत का अर्थ है ऐसा भारत जहाँ उत्कृष्टता जीवन के हर क्षेत्र में हो—शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन, विज्ञान, कला और मानवीय संबंधों में। विकसित और समृद्ध भारत तभी संभव है जब समृद्धि का लाभ केवल कुछ लोगों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।
विकास की यह यात्रा लंबी और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन असंभव नहीं। भारत के पास युवा जनसंख्या, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोकतांत्रिक ढांचा और अपार बौद्धिक क्षमता है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम सामूहिक रूप से सही दिशा में कार्य करें। ज्ञान और विज्ञान को जीवन का आधार बनाएं, संस्कृति और मानवता को आत्मा, अनुसंधान और प्रौद्योगिकी को साधन, स्वदेशी निर्माण को नीति और राष्ट्रभावना को प्रेरणा। जब भाषा संवाद का सेतु बने और बहुभाषी दक्षता वैश्विक अवसरों का द्वार खोले, तब भारत न केवल विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा होगा, बल्कि अपनी विशिष्ट पहचान के साथ विश्व का मार्गदर्शन करेगा।
अंततः विकसित भारत का सपना किसी एक सरकार, संस्था या पीढ़ी का नहीं, बल्कि हम सभी का साझा संकल्प है। यह संकल्प तभी साकार होगा जब विचार, आचरण और प्रयास—तीनों स्तरों पर ईमानदार परिवर्तन आएगा। भारत की शक्ति उसकी जनता है, और जनता की शक्ति उसके मूल्य, ज्ञान और कर्म में निहित है। यदि हम इस सत्य को आत्मसात कर लें, तो भारत का भविष्य न केवल उज्ज्वल, बल्कि प्रेरणादायी भी होगा। जय हिंद, जय भारत।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा



