
आज चार राज्यों असम, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल और केंद्रशासित प्रदेश पुड्डुचेरी के चुनाव नतीजे आ रहे हैं जो अपने अंतिम निर्णायक दौर में हैं। रूझान एव॔ नतीजों को ऐतिहासिक कहा जा सकता है और यह नतीजे भारतीय लोकतंत्र की इस विशेषता की ओर भी संकेत देते हैं वह पूरी परिपक्वता और मजबूती के साथ एक स्पष्ट और क्रान्तिकारी फैसले लेने में भी सक्षम है। देश की जनता अपने मत की ताकत से बड़े बड़े सिंडिकेट और बाहुबली नेताओं को भी धराशाई कर सकने में समर्थ है चाहे वह तमिलनाडु की पिछले 60 वर्षों की द्रविड़ राजनीति का वर्चस्व हो या ममता दीदी की तृणमूल कांग्रेस का डेढ़ दशक से चला आ रहा अराजकता, दादागिरी और कट मनी का नेक्सस हो। आज आ रहे चुनाव परिणामों में असम और पुड्डुचेरी में ही सत्तारूढ दल बीजेपी और एनडीए सरकार की वापसी हो रही है।पुड्डुचेरी की 30 सदस्यीय विधान सभा में श्री रंगास्वामी जी के नेतृत्व में बीजेपी सहयोगियों के साथ 18 सीटें प्राप्त करके सरकार बनाने की राह पर है।कांग्रेस और सहयोगियों को 7 तथा अन्य को 5 सीटें मिलती दिख रही हैं।
असम में वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंता विश्व शर्मा के नेतृत्व में भाजपा 126 के सदन में 100 सीटें प्राप्त करती हुई प्रचंड बहुमत की ओर अग्रसर है और पुनः सरकार बनाएगी।2021 का चुनाव सोनोवाल जी के चेहरे पर लड़ा गया था।यह पहला चुनाव है जो हेमंता विश्व शर्मा जी का कार्यकाल पूरा होने पर उनके चेहरे और नेतृत्व के तहत भाजपा ने लड़ा। इस प्रचंड जीत का बड़ा श्रेय हेमंता जी के कुशल नेतृत्व और रणनीति के साथ साथ उनकी प्रखर हिन्दुत्ववादी और राष्ट्रवादी ईमानदार छवि को भी जाता है।प्रधानमंत्री मोदी जी का असम के प्रति विशेष लगाव और असम के विकास के लिए निरंतर प्रयासरत रहना भी इस प्रचंड जीत के लिए एक बड़ा कारण है।असम में कांग्रेस को 22 और अन्य को 4 सीटें मिलने के आसार हैं।कांग्रेस के तो मुख्यमंत्री के चेहरे और नेतृत्वकर्ता ही असम में अपना चुनाव हार गए।
पश्चिम बंगाल के चुनाव इस बार राजनीतिक दलों के लिए ही नहीं सामान्य जनमानस के लिए भी सबसे अधिक चर्चा एवं कुतूहल का विषय था। बीजेपी के लिए पश्चिम बंगाल चुनाव में इस बार अभी नहीं तो कभी नहीं की स्थिति थी।यही कारण है कि बीजेपी ने इस चुनाव में 2021 की गलतियों से सबक लेते हुए व्यक्तिगत हमले से बचने और तृणमूल कांग्रेस सरकार को महिलाओ की सुरक्षा में विफलता, मुस्लिम तुष्टीकरण, बदहाल कानून व्यवस्था, विकास विरोधी नीतियाॅ और दादागीरी एव॔ कट मनी संस्कृति के मुद्दों पर जनमानस तक पहुँच कर घेरना था।भाजपा की रणनीति जनमानस में ममता सरकार के प्रति आक्रोश जगाने और भाजपा के प्रति भरोसा जगाने में सफल हुई। इससे ही जनमानस में परिवर्तन की लहर ने गति पकड़ी।बंगाल का ही चेहरा भाजपा ने ममता के सामने खड़ा करके उनके भीतरी बाहरी,बंगाली और गैर बंगाली जैसे नेरेटिव की भी हवा निकाल दी। भाजपा ने मुस्लिम ध्रुवीकरण की ममता की नीति के जवाब में हिन्दुत्व और हिन्दू एकता के द्वारा हिन्दू ध्रुवीकरण पर जोर दिया और योगी जी एवं अन्य नेताओं ने इसे गति देने में कोई कसर नहीं रखी।चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि पश्चिम बंगाल जैसे ममता दीदी के अभेद्य किले में भाजपा द्वारा 205 सीटों पर कमल खिलाना उसकी कितनी बड़ी जीत है और तृणमूल कांग्रेस को 82 सीटों पर समेट देना ममता दीदी जैसी अराजक, तानाशाही प्रवृत्ति वाली और हर संवैधानिक संस्थान और पद से खुद को ऊपर समझने वाली नेता की कितनी बड़ी पराजय है।इस चुनाव में कांग्रेस, वामपंथियों और अन्य को भी दो दो सीटें मिली हैं। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने तो चुनाव के बीच ही भाजपा के पक्ष में हवा का रूख देखकर ममता दीदी पर भाजपा को मौका देने का ठीकरा फोड़ दिया था और अधीर रंजन चौधरी ने भी यह बात कही थी कि पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ दल के विरूद्ध लहर चल रही है। भाजपा के द्वारा पश्चिम बंगाल में भी कमल खिलाने की बात प्रधानमंत्री मोदी जी ने बिहार में जीत हासिल होने पर ही उसी दिन पार्टी कार्यालय में कही थी कि गंगा माता गंगोत्री से निकलकर बिहार के रास्ते ही गंगासागर तक जाती हैं। इस चुनाव में भी मोदी जी ने अपनी अन्तिम जनसभा में यह कहकर भाजपा सरकार पश्चिम बंगाल में बनने का भरोसा जनता को दिलाया था कि मैं शपथ ग्रहण में अवश्य आऊंगा।
भाजपा की पश्चिम बंगाल में इस प्रचंड जीत के लिए कई कारण महत्वपूर्ण हैं जिनने मिलकर ममता सरकार के विरूद्ध माहौल खड़ा किया और लोगों मे आक्रोश पैदा किया।इनमें महिलाओं की अस्मिता और सुरक्षा प्रदान करने में विफलता, मुस्लिम तुष्टीकरण और हिन्दुओं के साथ भेदभावपूर्ण रवैया,और बदहाल कानून व्यवस्था के साथ साथ तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं के द्वारा कट मनी संस्कृति, तोलाबाजी और भ्रष्टाचार से सामान्य जनमानस का शोषण जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। इन मुद्दों ने समाज के सभी लोगों को झकझोरने और परिवर्तन पर विचार करने के लिए मजबूर किया। इस सबसे अलग पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत में जनता का भयमुक्त होकर बढ़ चढ़कर मतदान में भाग लेना और रिकार्ड 93 प्रतिशत मतदान करना भी एक महत्वपूर्ण कारण रहा।मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग इसके लिए बधाई के पात्र हैं कि उनके द्वारा उठाए गए सख्त कदमों से जनमानस में चुनाव और मतदान के लिए भरोसा बढ़ा।चुनाव आयोग ने बोगस वोटिंग और उपद्रवी और अराजक तत्त्वों पर भी अंकुश लगाने तथा उन पर नकेल कसने में भी अभूतपूर्व सफलता पाई। इससे लोगों का चुनाव प्रकिया पर विश्वास और अधिक मजबूत हुआ। इसके लिए चुनाव आयोग ने सभी ऐहतियाती कदम उठाए और चुनाव को पाक और पारदर्शी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।इसके लिए चुनाव आयोग की जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम ही होगी। यदि चुनाव आयोग इतनी दृढ़संकल्पता और इच्छा शक्ति न दिखाता तो शायद भाजपा का पश्चिम बंगाल में सरकार का सपना 2021 की तरह सपना ही रह जाता। भाजपा को पश्चिम बंगाल में उत्तर बंगाल में तो रिकार्ड सफलता मिली ही और अनेक जिलों में उसे शत प्रतिशत सफलता भी मिली। दक्षिण बंगाल, ग्रेटर कोलकता, हावड़ा और भद्रलोक में भी भाजपा ममता के गढ़ में भरपूर सेंध लगाने में सफल हुई जिसका परिणाम भाजपा को इस 208 सीटों के प्रचंड बहुमत के रूप में सामने आया।ममता बनर्जी भी 15000 से अधिक मतों से अपनी भवानीपुर सीट पर भाजपा के सुवेंदु अधिकारी से हार गई।
तमिलनाडू में जो आज चुनाव परिणाम आए,वे पूरी तरह अप्रत्याशित और चौंकाने वाले रहे।सिनेस्टार विजय की पहला चुनाव लड़ रही टीवीके पार्टी ने डीएमके और एडीएमके दोनों 60 वर्षों तक सत्ता में भागीदार रहे दलों को पछाड़कर 234सदस्यीय सदन में 107 सीटें प्राप्त कर सबसे अधिक सीटें प्राप्त करने वाले राजनीतिक दल के नाते सरकार गठन करने हेतु मार्ग प्रशस्त कर लिया।अधिकांश चुनाव सर्वेक्षणों में पुनः बहुमत प्राप्त कर सरकार बनाने वाले डीएमके को 74सीटें ही मिल सकीं।एडीएमके और भाजपा वाले गठबंधन को मात्र 53 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा।विजय आसानी से डीएमके और भाजपा से दूर रहकर एडीएमके या अन्य छोटे दलों से गठबंधन कर बहुमत का जादुई आंकड़ा 118 हासिल कर सरकार गठन का दावा पेश कर सकते हैं। हकीकत मे विजय की जीत सनातन को गाली देने वाले द्रमुक राजनीतिक दल और उनकी राजनीति पर करारा प्रहार है।मुख्यमंत्री स्टालिन का भी चुनाव हार जाना उनकी पार्टी के लिए एक गहरा संकेत भी है।
केरल में चुनाव सर्वेक्षणों के अनुरूप यूडीएफ को बहुमत प्राप्त हुआ है और उसे 140 सदस्यीय सदन में 99 सीटें मिली हैं। यह अनुमानित सीटों से अधिक है जो यूडीएफ को मामूली बढ़त दिखा रहे थे। यह इस बात का सूचक है कि दस वर्षो तक सत्तारूढ रहे एलडीएफ गठबंधन के खिलाफ जनता में आक्रोश बहुत अधिक था।इसी कारण एलडीएफ को मात्र 35 सीटें ही मिल सकीं। भाजपा और सहयोगी दलों को 3 और अन्य को भी 3सीटें मिलीं। भाजपा का केरलम में खाता खुलना और मत प्रतिशत बढ़ना उसके लिए शुभ संकेत है। केरलम में यूडीएफ की विजय कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए एक ऐसी खुशी है जो असम, पश्चिम बंगाल और पुड्डुचेरी मे भाजपा से मिली पराजय पर मरहम का काम करेगी।केरलम में एलडीएफ की पराजय के साथ देश से वामपंथ का आखिरी किला भी ढह गया है।
अन्त में हम कह सकते हैं कि आज के चुनाव परिणामों में कई संकेत साफ देखे जा सकते हैं।यह परिणाम बताते है कि जनता काम करने वाले दलों और राष्ट्र की सोचने वालों को पुनः मौका देने में भी संकोच नहीं करती। इसके विपरीत छद्म धर्मनिरपेक्षता की खाल ओढ़े समाज विभाजित कर एक वर्ग के तुष्टीकरण में लगे वोटबैंक साधने वाले तृणमूल कांग्रेस और डीएमके जैसे परिवारवादी दलों को बिना उनका कद देखे सत्ताच्युत कर सड़क पर लाने में भी संकोच नहीं करती।यह भी साफ संकेत है कि अब जनता सनातन और हिन्दुत्व से नफरत करने वालों और तुष्टीकरण के लिए राष्ट्रीय हितों से समझौता करने वालों को भी पसंद नहीं करती और न ही उन्हें सत्ता पर बैठाना चाहती है।



