
देश की लोकसभा और विधान सभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण 2029 के चुनाव तक सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा लाया गया संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में दो दिनों की परिचर्चा के बाद गिर गया। इसके साथ ही लाए गए दो अन्य विधेयक परिसीमन विधेयक और केन्द्र शासित प्रदेश संशोधन विधेयक भी गिर गए। संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण इन विधेयक के पारित होने के लिए दो तिहाई सांसदों के समर्थन की जरूरत थी जिसे प्राप्त करने में सरकार असफल रही। लोकसभा में परिचर्चा के पहले दिन ही प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में विपक्ष सहित सभी सांसदों से राजनीति से ऊपर उठकर महिलाओं को लम्बे समय से टल रहे उनके हक को देने के लिए एकजुटता दिखाते हुए इन विधेयकों को समर्थन देने की अपील की। प्रधानमन्त्री ने यह भी कहा कि इन विधेयकों के लाने का एकमात्र कारण देश की आधी आबादी को उसका बहु प्रतीक्षित हक शीघ्रातिशीघ्र दिलाना है। विपक्षी दलों के नेताओं का यह सोचना गलत है कि इससे मोदी को कोई लाभ होगा। प्रधानमन्त्री मोदी ने जोर देकर कहा कि यदि विपक्ष विरोध की दलगत राजनीति में पड़कर इन विधेयक का विरोध करेगा तो उसे महिलाओं के कोपभाजन का शिकार होना पड़ेगा और इसका फायदा हमे हो सकता है परन्तु यदि विपक्ष ने इन विधेयक को पारित करने में सक्रिय सहयोग दिया तो किसी को भी इसका राजनीतिक लाभ नहीं मिलेगा। यह सत्य भी है क्योंकि इतिहास साक्षी है कि 2023 में सर्वसहमति से महिला आरक्षण विधेयक पारित किए जाने के बाद भी सत्ता पक्ष को 2024 के आम चुनाव में इसका कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिला। प्रधानमन्त्री मोदी जी ने सभी सांसदों से कहा कि हमें इस सोच से बाहर निकलना होगा कि हम कुछ दे रहे हैं और यह अहसास करना होगा कि पिछले तीस चालीस वर्षों में देश में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं और महिलाएं आज हर क्षेत्र में महती भूमिका अदा कर रही हैं और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई हैं। ऐसे में अब उनके अधिकारों से उन्हें नए नए बहानों और टालमटोल की नीति अपनाकर वंचित नहीं रखा जा सकता। माननीय गृह मंत्री अमित शाह जी ने भी परिचर्चा के अन्त में विधेयक से जुड़े सभी तकनीकी पहलुओं पर प्रकाश डाला और विपक्ष के दुष्प्रचार की हवा निकालते हुए सभी आशंकाओं का तथ्यपरक जवाब दिया। इस सबके बावजूद विपक्ष अपनी विरोध की राजनीति से ऊपर न उठ सका और इन विधेयक को सरकार की साजिश मानते हुए उसने एकजुट होकर इन विधेयक के विरोध में मतदान किया। इन विधेयक के पारित न हो पाने के कारण संसद एवं विधान सभाओं में महिलाओं को 2029 तक 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने के सरकार के एक नेक नियत से उठाए गए कदम को गहरा आघात लगा।
सोचने की बात यह है कि लोकसभा एवं विधान सभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए सभी दलों के समर्थन से 2023 में पारित किए गए नारी शक्ति वंदन अधिनियम में एक संशोधन को विपक्ष ने प्रतिष्ठा की लड़ाई क्यों बना दिया। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या विपक्ष ने 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम का समर्थन इस मजबूरी में किया था कि निकट भविष्य में 2024 में लोकसभा के आम चुनाव में वह महिला विरोधी होने के ठप्पे से बचना चाहता था। यह प्रश्न इसलिए और भी प्रासंगिक हो जाता है कि ज्यों ही सरकार ने पूरी गंभीरता के साथ अपने वादे को पूरा करने के लिए कदम उठाना प्रारंभ किया, पूरा विपक्ष सरकार की ही मंशा पर सवाल उठाते हुए सारी प्रकिया में सरकार की साजिश साबित करने के लिए एकजुट हो गया। यही नहीं सरकार के इन संविधान संशोधन विधेयक का विरोध करने के लिए उत्तर दक्षिण के मुद्दे को हवा देने और आरक्षण के भीतर भी पिछड़े एवं अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की नई मांग उठाने का प्रयास किया गया। विपक्ष का पूरा प्रयास रहा कि सरकार को आगे बढ़ने से रोका जाय और उस पर पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक विरोधी होने का आरोप चस्पा कर अपने को इन वर्ग का हितैषी साबित किया जा सके। विपक्ष का यह सरकार पर आरोप था कि वह यह संविधान संशोधन विधेयक मात्र इस उद्देश्य से लाई है कि महिला आरक्षण के बहाने वह अपनी सुविधा और हितों के अनुरूप मनमाने तरीके से परिसीमन प्रक्रिया को पूरा कर सके। लोकसभा में अन्य विपक्षी नेताओं के सुर में सुर मिलाते हुए नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी कहा कि हकीकत में यह विधेयक महिला आरक्षण पर नहीं है। इसका केन्द्र मूल परिसीमन विधेयक है और सरकार महिला आरक्षण के बहाने चुनाव की भौगोलिक संरचना को अपने पक्ष में बदलना चाहती है परन्तु हम ऐसा नहीं होने देंगे। मेरा मत है कि इन संविधान संशोधन के पारित न हो पाने का एक ही कारण है विपक्षी नेताओं और दलों का मोदी सरकार के प्रति अविश्वास और सरकार के हर कदम को सरकार एवं भाजपा की साजिश मानने की सोच। हकीकत में यह विपक्षी नेता इतने हताश हैं कि उन्हें नेक नियत से भी किए गए किसी काम में साजिश की ही बू आती है। प्रधानमन्त्री एवं सरकार ही नहीं, इन विपक्षी नेताओं को देश के न्यायालय, चुनाव आयोग या किसी भी संवैधानिक संस्था पर भी भरोसा नहीं है। ऐसे में परिसीमन आयोग को भी शंका की नजर से देखने में कोई नई बात नहीं है।
विपक्षी नेताओं ने सदन में परिचर्चा के दौरान बार बार कहा कि हम महिला आरक्षण के विरोध में नहीं हैं। हमारा विरोध सरकार द्वारा मनमाने तरीके से परिसीमन करने के लिए लाए गए विधेयक से है। जब 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम में यह प्रावधान किया गया था कि नई जनगणना 2026 के आंकड़ों के आने के बाद परिसीमन प्रक्रिया होगी और उसके बाद ही इस कानून के तहत महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा। ऐसे में सरकार जनगणना पूरी होने और जातिगत जनगणना के आंकड़े आने के पहले ही मनमाने तरीके से लोकसभा में सदस्यों की संख्या बढ़ाने और 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर सीटों का परिसीमन करने के लिए जल्दबाजी में क्यों है? श्रीमती प्रियंका गांधी और अनेक विपक्षी नेताओं ने कहा कि यदि सरकार महिला आरक्षण के विषय में इतनी ही गंभीर है तो वह 2023 में पारित अधिनियम में संशोधन कर तत्काल प्रभाव से वर्तमान 543 सीटों पर महिला आरक्षण लागू कर सकती है और पूरा विपक्ष इसका समर्थन करेगा। यद्यपि प्रधानमन्त्री मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में स्पष्ट आश्वासन दिया कि परिसीमन प्रक्रिया से किसी भी राज्य के साथ कोई अन्याय या भेदभाव नहीं होगा परन्तु विपक्ष इस बात पर अड़ा रहा कि परिसीमन को महिला आरक्षण से अलग रखा जाए। समझने की बात यह है कि आखिर सत्ता पक्ष एवं विपक्ष दोनों की मजबूरी क्या थी और दोनों की नीयत क्या थी जिसके कारण दोनों पक्ष एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी एकमत नहीं हो सके और राष्ट्र की प्रगति की दिशा में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ने में नाकाम रहे।
सरकार की यह एक बड़ी भूल मानी जाएगी कि 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किए जाने के समय विपक्ष की इसे तत्काल प्रभाव से लागू किए जाने की मांग को नजरंदाज करके इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जनगणना 2026 एवं तत्पश्चात परिसीमन की शर्त जोड़ी। अब अगर सरकार अपना रूख बदल रही है तो विपक्ष के मन में संदेह उठना स्वाभाविक है। सरकार यह मान कर चल रही थी कि वह जनगणना एवं परिसीमन प्रक्रिया 2029 के पहले पूरी कर लेगी। सरकार को पता था कि इस प्रक्रिया में चार से पांच वर्षों का समय कम से कम लगेगा। ऐसे में यदि सरकार महिला आरक्षण 2029 से देने के लिए संकल्पित थी तो उसे ऐसी बाध्यताओं से बचना चाहिए था। मुझे ऐसा लगता है कि जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में पारित किए जाने के बाद भी सरकार को 2024 के चुनाव में उसका कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिल सका तो उसकी समझ में आया कि जब तक महिला आरक्षण को हकीकत में जमीन पर लागू कर इसका लाभ महिलाओं को प्रदान नहीं किया जाएगा तब तक उसका कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिल सकता और यह महिला मतदाताओं की नजर में एक सब्जबाग ही बना रहेगा। ऐसे में सरकार ने संविधान संशोधन कर इसे लागू करने का कदम उठाने की सोची। राजनीति में बिना राजनैतिक नफा नुकसान के आकलन किए शायद ही कोई सरकार कोई बड़ा नीतिगत कदम उठाती हो। यहाँ यह भी जानना आवश्यक है कि 1976 में तत्कालीन सरकार की प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने लोकसभा एवं विधान सभाओं में सीटों की संख्या एवं परिसीमन पर आपातकाल का फायदा उठाते हुए 25 वर्षों के लिए रोक लगा दी थी। इस प्रतिबन्ध को 2001 में माननीय अटल बिहारी बाजपेई जी ने भी प्रधानमन्त्री रहते अगले 25 वर्षों के लिए 2026 तक बढ़ा दिया था। ऐसे में वर्तमान सरकार के हाथ कानूनन बंधे थे। सरकार चाहकर भी 2026 के पहले परिसीमन प्रक्रिया चालू नहीं कर सकती थी। यही कारण था कि सरकार ने अब परिसीमन के लिए विधेयक लाने का प्रस्ताव रखा। संविधान में यह व्यवस्था है कि प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन हो और लोकसभा एवं विधान सभाओं में ज़नसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या का निर्धारण कर एक मत एक मूल्य के सिद्धांत पर अमल किया जाए। 1976 में परिसीमन पर रोक का नतीजा यह हुआ कि वर्तमान में आबादी 55 करोड़ से बढ़कर 145 करोड़ हो जाने पर भी संसद और विधान सभाओं में सीटों की संख्या यथावत है। अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में या बड़े शहरों में प्रति संसदीय क्षेत्र में आने वाली जनसंख्या कई गुना बढ़ गई है। यही नहीं विभिन्न संसदीय सीटों के अन्तर्गत आने वाली जनसंख्या में भी व्यापक असंतुलन है और यह समय की मांग है कि संसद और विधान सभा में सीटों की संख्या में बढ़ोत्तरी की जाए और परिसीमन प्रक्रिया लागू कर सीटों का भौगोलिक परिसीमन इस तरह हो कि विभिन्न सीटों के बीच असंतुलन सीमित कर एक मत एक मूल्य के लक्ष्य को लागू किया जाए। संसद की क्षमता को देखते हुए सीटों की संख्या जनगणना के अनुपात में तो वृद्धि करना परिसीमन आयोग के लिए सम्भव नहीं होगा। इसी कारण सरकार सभी राज्यों की सीटों में 50 प्रतिशत की वृद्धि का प्रस्ताव लेकर आई जिससे प्रति संसदीय सीट जनसंख्या के आकार में भी कमी लाई जा सके और सभी राज्यों की सीटों में आनुपातिक वृद्धि होने से किसी भी राज्य के साथ अन्याय भी न हो। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि दोनों दिन संसद में हुई बहस के दौरान नेता प्रतिपक्ष सहित सभी विपक्षी नेताओं ने हकीकत को नजरंदाज कर परिसीमन प्रक्रिया के द्वारा दक्षिण राज्यों के हितों के साथ सरकार के द्वारा षड़यंत्र किए जाने का दुष्प्रचार किया गया। हकीकत यह है कि कांग्रेस सहित अधिकतर विपक्षी दल एवं उनके नेता देश में लाए जाने वाले किसी भी सुधार और प्रगति के विरोधी हैं और नहीं चाहते कि देश की यथास्थिति में कोई सकारात्मक बदलाव हो जबकि वर्तमान सरकार लीक से हटकर राष्ट्रहित के लिए हर समय तैयार और समर्पित दिखती है। विपक्ष का सरकार पर यह आरोप लगाया जाना कि वह अपने चुनावी हितों को साधने के लिए निर्णय लेती है, एक तरह से इस बात की स्वीकारोक्ति है कि मोदी सरकार के अधिकतर निर्णय जन भावनाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप होते हैं चाहे धारा 370 की समाप्ति हो या श्री राम मंदिर निर्माण, चाहे नोटबंदी हो या जीएसटी।
जैसा मैं कह चुका हूँ कि सभी राजनीतिक निर्णय राजनैतिक हित और अनहित का विचार करके ही लिए जाते हैं परंतु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वे देशहित में हों और जन भावनाओं के अनुरूप हों। शायद यह सही समय है कि अब 50 वर्षों के बाद संसद और विधान सभाओं में सीटों की संख्या में बढ़ोत्तरी और परिसीमन प्रक्रिया पर लगी रोक हटाई जाए। इसे एक संवैधानिक दायित्व समझकर सभी राजनीतिक दलों को इसमें सहयोग करना चाहिए। सरकार का यह प्रयास होना चाहिए कि परिसीमन प्रक्रिया के लिए सभी दलों को विश्वास में लेकर भविष्य के लिए किसी आम सहमति पर पहुंचने की दिशा में आगे बढ़ा जाए। यह सत्य है कि सीटों की संख्या एवं राज्यों के संसद में प्रतिनिधित्व के लिए एकमात्र जनसंख्या को आधार मानने से उन राज्यों को नुकसान होगा जिन्होंने प्रभावपूर्ण जनसंख्या नियंत्रण करके राष्ट्र की प्रगति में सकारात्मक सहयोग दिया है। मेरा मानना है कि सरकार को संविधान संशोधन कर सीटों के आवंटन एवं परिसीमन के लिए जनसंख्या के साथ साथ कुछ अन्य मानकों को भी शामिल किया जाना चाहिए और और इन मानकों को भी कुछ भार दिया जाना चाहिए। इससे दक्षिण के विकसित राज्यों में एक सुरक्षा की भावना जागृत हो सकेगी। जनसंख्या के साथ भौगोलिक क्षेत्र, वित्तीय अनुशासन, राष्ट्रीय औसत से राज्य की प्रति व्यक्ति आय में अंतर, आर्थिक पिछड़ापन और देश के राजकोष में राज्य का योगदान जैसे मानकों को अपनाया जा सकता है। यह जानना उचित होगा कि इनमें से अनेक मानकों का उपयोग विभिन्न वित्त आयोगों के द्वारा 1976 के बाद से राज्यों को केन्द्रीय अनुदान एवं करों में हिस्सेदारी के लिए किया जाता रहा है। इससे देश के संघीय ढांचे को भी बल मिलेगा और राज्यों के बीच अनावश्यक तनाव भी कम होगा। विपक्षी दल एवं उनके नेताओं को भी समझना होगा कि वह हर अवसर पर सरकार का विरोध कर और संवैधानिक संस्थानों और प्रक्रियाओं पर सवाल उठाकर न तो अपना ही हित कर रहे हैं और न ही देश का। देश की उन्नति से जुड़े हुए मुद्दों पर तो उन्हें सरकार के साथ खड़े होकर रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभानी ही चाहिए। सरकार यदि सभी राज्यों के साथ समान भाव रखते हुए सभी राज्यों की सीटों में आनुपातिक वृद्धि कर महिला आरक्षण लागू करना चाह रही थी तो यह सभी के हित में था। परिसीमन प्रक्रिया सरकार का संवैधानिक उत्तरदायित्व है और जब भी हो यह काम सरकार के द्वारा गठित आयोग ही करेगा। ऐसे में विपक्षी नेताओं का परिसीमन पर ही सवाल खड़े करना ओछी राजनीति ही कही जाएगी। महिला आरक्षण में पिछड़ो के लिए आरक्षण में आरक्षण पर यही कहा जा सकता है कि अभी तो देश में केवल एससी और एसटी के लिए ही सीटें आरक्षित की जाती हैं। ए। ऐसे में यह नई मांग मुद्दे को लटकाने और भटकाने के अलावा कुछ नहीं है। यदि विपक्ष पिछड़े वर्ग के आरक्षण के लिए इतना ही गंभीर था तो उसे यह मुद्दा 2023 में ही उठाना चाहिए था। माननीय अखिलेश यादव द्वारा मुस्लिम महिलाओं को भी आरक्षण में आरक्षण का तर्क तो और अधिक हास्यास्पद एवं तुष्टीकरण से प्रेरित है क्योंकि देश के संविधान में धर्म आधारित आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। प्रधानमन्त्री मोदी ने लोकसभा में सही ही कहा कि आप लटकाने भटकाने की नीति से बाज आएं और एक बार महिलाओं को आरक्षण देने में सहयोग करें। आगे का रास्ता महिलाओं को निर्णय में भागीदार बनाकर स्वतः लेने दें। प्रधानमन्त्री मोदी जी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा कि हम पर्याप्त संख्याबल नहीं जुटा सके परन्तु हम हारे नहीं हैं और ना ही हताश हैं। उन्होंने कहा कि हमारा महिलाओं को उनका हक जल्दी से जल्दी देने का संघर्ष जारी रहेगा। जो लोग मोदी को समझते हैं और उनकी संघर्ष क्षमता से वाकिफ हैं, उन्हें अब भी पूरा भरोसा है कि मोदी सरकार इस झटके से उबरकर महिलाओं को 2029 में ही संसद एवं विधान सभाओं में आरक्षण प्रदान करने के लिए कोई सार्थक कदम अवश्य उठाएगी।



