लेखसम्पादकीय

देश में प्रदूषण की मार लेकिन लक्ष्य पर उद्योग!!!

पराग सिंहल

देश के प्रमुख मेट्रो कहे जाने वाले शहर प्रदूषण की मार को झेलते आ रहे हैं लेकिन प्रदूषण के लिए देश के उद्योग को लक्ष्य बनाया जा रहा है जबकि वास्तविकता से मुंह मोड़ने में कोई संकोच नहीं किया जा रहा। आज देश के प्रमुख शहर जैसे दिल्ली, लखनऊ, मुम्बई, कलकत्ता, चैन्नई, बंगलौर, अहमदाबाद, जयपुर और आगरा जैसे अनेक शहर प्रदूषण की मार से कराह उठे हैं। इस प्रदूषण की समस्या पर हमारे देश की सर्वोच्च न्यायालय बहुत गंभीर नजर आता है, उच्चतम न्यायालय के समक्ष अनेकों जनहित अनेक याचिकायों पर निर्णय आ चुके हैं या फिर विचारधीन चल रहे हैं। हमारे देश के पर्यावरणविद भी बढ़ते प्रदूषण के लिए चिन्तित रहते हैं और न्यायालय पटल पर अपनी दलीलें देने से नहीं थकते या सरकारी विभागों में नित नयी-नयी नीतियों को बनाने और लागू करने का दवाब बनाते रहते हैं।

यदि हम बात करें आगरा की तो आगरा में बढ़ते प्रदूषण की मार से बचाने के लिए आगरा में स्थापित उद्योगों पर नियत्रंण के लिए केन्द्रीय एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बहुत सक्रिय ही है, इसके अतिरिक्त एनसीआर क्षेत्र के साथ विशेषकर दिल्ली में वाणिज्यिक वाहनों पर भारी प्रतिबंध लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। यहां तक कि डीजल से चलित निजी वाहनों हेतु नित तरह-तरह के प्रतिबन्ध नियम लागू हैं या होते रहते हैं। यदि बात करें केवल आगरा की तो ताजमहल को प्रदूषण से सुरक्षित रखने के लिए ताज ट्रिपोजियम जोन का गठन 1990 के आसपास कर दिया गया था, अब आगरा में नये उद्योग स्थापित करने के लिए ओरंेज और रेड जोन घोषित कर दिये गये हैं और पुराने उद्योग को भी नियमितरुप से प्रदूषण रहित रहने के लिए विभागीय दवाब बना रहता है। हां! हम मानते हैं कि देशभर के शहरों में बढ़ते द्व-पहिया वाहन, चार पहिया वाहनों के संख्या के साथ वाणिज्यिक वाहनों की बढ़ती संख्या प्रदूषण प्रमुख कारण हो सकता है। लेकिन निजी और वाणिज्यिक वाहनों की संख्या बढ़ने का कारण भी जानना होगा। मेरे विचार से देश में बढ़ते प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है ‘बढ़ती आबादी’। क्योंकि जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है वैसे-वैसे मांग- आपूर्ति बढ़ रही है। जब मांग बढ़ रही है तो उद्योग बढ़ रहे हैं। मांग के अनुरुप आपूर्ति करने के लिए वाणिज्यिक वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। जैसे-जैसे उद्योंगों के साथ वाणिज्य की संख्या बढ़ रही है, यदि मांग- आपूर्ति के अनुसार उपभोक्ताओं के बीच वितरण के लिए वाणिज्यिक वाहन दौड़ते हैं। जब देश मकी मांग के अनुरुप उद्योगों का विस्तार हो रहा है, उद्योगों में रोजगार तो बढ़ रहे हैं औरे कार्यरत कर्मचारियों की बढ़ती संख्या बढ़ रही है। ऐसे कर्मचारियों के आने-जाने के लिए वाहनों की संख्या बढ़ रही है। तब प्रदूषण नहीं बढ़ेगा!!

कोरोना लाॅकडाउन के समय का अनुभव को साझा करने का प्रयास कर रहा हूं। जब पहला कोरोना मार्च से मई के बीच सख्ती से लागू रहा था, इस दौरान सड़कों पर सभी तरह वाहन चलना प्रतिबन्धित थे और उद्योग भी बंद पड़े थे। इस प्रतिबन्ध के कारण अपै्रल और मई की गर्मी का अनुभव ही नहीं हो रहा था, यहां तक की लोग मार्च से ए.सी. चलाना तो भूल ही गये थे। स्पष्ट है कि अपै्रल से मई तक गर्मी का अनुभव हो ही नहीं रहा था अर्थात पर्यावरण में प्रदूषण का प्रभाव दिखायी नहीं पड़ रहा था, अर्थात प्रदूषण का प्रभाव शून्य था। क्यों?? केवल यह कह देना कि उद्योग एवं वाहन ही प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे तब प्रश्न उठता है कि घरों में उपयोग हो रहे गैस-रसोई, घरों में स्थापित ए.सी., फ्रिज, अन्य उपकरण के साथ कोल्ड स्टोरेज में उपयोग होने वाली गैस आर-32 एवं आर-410ए हाइड्रोफ्लोरो कार्बन भी पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं! स्पष्ट है कि केवल उद्योग और वाहनों द्वारा छोड़े गये धुएं से पर्यावरण प्रभावित नहीं हो रही है बल्कि कोल्ड-स्टोरेज और ए.सी. में ठण्डक रखने हेतु उपयोग होने वाली गैस आर-32 एवं आर-410ए हाइड्रोफ्लोरो कार्बन का उपयोग ओरजोन पर्त को भी प्रभावित कर रहा है। स्पष्ट है कि नीचे से बढ़ता प्रदूषण प्रभावित तो कर ही रहा है, उधर जहरीली गैसें सूरज के चारों ओर लिपटी ओरजोन पर्त को प्रभावित कर रही है तो वातावरण में प्रदूषण का प्रभाव तो बढ़ेगा ही, और जब प्रभाव बढ़ेगा तो व्यक्ति का स्वास्थ्य खराब होगा। आपसे प्रश्न है कि क्या हम विद्युत के बिना रह नहीं सकते!! लेकिन कभी सोचा है कि विद्युत की आपूर्ति में उपयोग हो रहे तारों से निकलने वाली गर्मी से पर्यावरण कितना प्रभावित नहीं हो रहा??

लेकिन बढ़ते प्रदूषण का सबसे बड़ा करण जो समझा में आता है ‘बढ़ती जनसंख्या’ परन्तु दुःखद है कि किसी भी पर्यावरणविद या न्यायिक मंच का ध्यान इस ओर नहीं दिया या गया ही नहीं! यह आरोप नहीं है लेकिन सत्य है क्योंकि कभी भी न्यायिक मंच पर बढ़ती ‘जनसंख्या’ जैसी समस्या को लेकर कोई जनहित याचिका के बारे में कभी नहीं सुना। अब आप स्वयं ही विचार करें कि विश्व की सबसे बड़ी जनंसख्या 140 करोड़ केवल मांग-आपूर्ति के साथ संसाधनों की सुलभ उपलब्धता को ही प्रभावित नहीं कर रहा है बल्कि पर्यावरण को भी पूरी तरह से प्रभावित कर रही है। देश के प्रत्येक शहर मांग के अनुसार आपूर्ति के लिए कितने उद्योग-धन्धे स्थापित हैं!! ग्रामीण अंचल तक में रोजमर्रा की वस्तुओं की मांग हमेशा खड़ी रहती है, उन उत्पादों की आपूर्ति के लिए कितनी बड़ी संख्या में वाहनों की प्रत्येक दिन आवाजाही हो रही है!!! अब आप स्वयं ही विचार करें कि प्रदूषण के नाम पर उद्योगों तक रोक लगा देने से आपूर्ति प्रभावित नहीं होगी! आपूर्ति प्रभावित होने महंगाई नहीं बढ़ेगी!! इस तथ्य को भी स्वीकार करना चाहिए कि सरकार यातायात के लिए उपयोग हो रहे रेल, बस और अन्य निजी वाहनों को इलेक्ट्रिक एवं सोलर पर लगातार प्रोत्साहन नहीं देती तब देश में प्रदूषण की कितनी घातक स्थिति पैदा हो जाती! परन्तु दुःखद है कि सभी मंचों से एक ही आवाज आती है कि उद्योगों और वाहनों के कारण देश में प्रदूषण बढ़ रहा है। तब मेरा प्रश्न है कि क्या प्रदूषण की मार के कारण्सा आपने अपना निजी वाहन का उपयोग करना बंद कर दिया है? लेकिन पर्यावरणविदों की मानें तो प्रदूषण घटाने के लिए सभी उद्योगों और वाहनों के साथ विद्युत आपूर्ति को भी प्रतिबन्धित कर देना चाहिए!! केवल उद्योगों पर टीकरा फोड़ देने मात्र से प्रदूषण घटाया नहीं ज सकता बल्कि धरातल पर सत्यता को स्वीकार करते हुए देश की बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण में लाने की बहुत आवश्यक है।
अतः मैं पर्यावरणविदों के साथ सभी न्यायिक मंचों का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं बढ़ती जनंसख्या को रोकने का भी मास्टरप्लान तैयार करने की आवश्यकता है, यदि अगले दस वर्षो में जनसंख्या नियंत्रण कर लेते हैं तो हम मान सकते हैं कि देश का पर्यावरण सुरक्षित रहने के आसार नजर आ सकते हैं। –

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